वरुण गांधी
भारत में खुदरा निवेशकों ने पिछले तीन हफ्तों में 15 लाख करोड़ रुपये एक झटके में गंवा दिए। इस नुकसान की वजह कमोडिटी की कीमतों में वृद्धि, सुस्त अर्थव्यवस्था और यूक्रेन संकट है। इन निवेशकों में कई ने पहली बार बाजार में अपनी बचत को उत्साह के साथ लगाया था पर उन्हें निराशा हाथ लगी। साथ ही यह भी दिखा कि देश में खासतौर पर खुदरा निवेशकों के बीच बाजार की अस्थिरता को लेकर समझ कम है। सामाजिक सुरक्षा की कमी जैसा मुद्दा तो खैर है ही। ऐसी सूरत में हमें देखना-समझना होगा कि हमारे युवा निवेशक कैसे निवेश करते हैं। इनमें से कई अपनी बचत को म्युचुअल फंड और इक्विटी में लगाते हैं, जबकि अन्य आकर्षक बचत योजनाओं का रुख करते हैं जिनमें धोखाधड़ी की आशंका रहती है।
पेटीएम का मामला
इक्विटी को ही लें तो इस दौरान सूचीबद्ध शीर्ष कॉरपोरेट ने भी अपनी चमक गंवाई है। नई फर्म आदर्श रूप से आईपीओ के जरिए खुदरा निवेशकों को मोटी कमाई की पेशकश करती हैं। पर ऐसी फर्म अब सार्वजनिक निर्गम के अधिक मूल्य निर्धारण के लिए कुख्यात हैं। इनमें पेटीएम (वन97 कम्युनिकेशंस लिमिटेड) का मामला तो खासा चर्चित रहा। इसके शेयर की कीमत लगातार गिर रही है, जो आईपीओ मूल्य से काफी कम है।
इस बीच, बाजार को लेकर दिखे उत्साह ने कॉरपोरेट गवर्नेंस की चुनौतियों को खासतौर पर छिपाया है। एनएसई में देखी गई अनियमितताओं (गैर-प्रासंगिक व्यक्ति से व्यापार योजना, बोर्ड मीटिंग अजेंडा जैसे अहम मामलों पर एनएसई के पूर्व प्रमुख का ईमेल के जरिए इनपुट लेना) ने एक गहरी संस्थागत सड़ांध को उजागर किया है। इस दौरान, सेबी ने अपने पहले के अनिवार्य रुख को वापस लिया है, जिसमें शीर्ष 500 सूचीबद्ध फर्मों में अध्यक्ष और एमडी की भूमिका को अलग करने की बात कही गई थी। देश की शीर्ष 500 फर्मों में से 300 प्रमोटर-संचालित हैं। ऐसे में ये फर्म आमतौर पर दोनों भूमिकाओं को साथ निभाने का चलन जारी रखेंगी, जिसमें बोर्ड की जिम्मेदारियों और दिन-प्रतिदिन के दायित्वों के बीच हितों का स्वाभाविक टकराव होता है। हालिया एबीजे शिपयार्ड घोटाले में 28 बैंकों के 22,842 करोड़ रुपये के कर्ज का डूबना दिखाता है कि बैंकिंग एनपीए का संकट गहराता जा रहा है। सूचीबद्ध फर्मों से इस्तीफा देने वाले स्वतंत्र निदेशकों की बढ़ी संख्या दिखाती है कि कई फर्में धोखाधड़ी में लिप्त हैं।
इस बीच क्रिप्टो-मुद्रा ने नई चुनौती पेश की है। बिटकनेक्ट के संस्थापक सतीश कुंभाणी 2.4 बिलियन डॉलर की वैश्विक पोंजी योजना को व्यवस्थित करने के बाद और न्यूयॉर्क में संयुक्त राज्य जूरी द्वारा आरोपी ठहराए जाने के बाद भारत से भाग गए। अगस्त, 2017 से नोएडा में 15,000 करोड़ रुपये का बाइक बॉट घोटाला हुआ। इसमें उत्तर प्रदेश के निवासी संजय भाटी ने एक साधारण योजना के माध्यम से 2,00,000 से अधिक निवेशकों के साथ 15,000 करोड़ रुपये से अधिक का धोखा किया। इसके तहत एक साधारण बाइक के लिए 62,100 रुपए निवेश करने को उकसाया गया था। इसके बदले उनसे सालाना 1.17 लाख रुपये के मुनाफे का वादा किया गया था।
कहने को तो देश में आम भारतीय निवेशकों को धोखाधड़ी से बचाने के लिए नियामकीय ढांचा है, पर यह निष्प्रभावी है। मौजूदा सूरतेहाल में निवेशक जागरूकता में सुधार करने और चिटफंड योजनाओं की समीक्षा करने के लिए एक संस्थागत प्रणाली विकसित करने की दरकार है। इस तरह की प्रणाली आदर्श रूप से योजना को पहले से सत्यापित करेगी और भुगतान एकत्र करने के लिए एक मध्यस्थ मंच के रूप में काम करेगी। हमें आम भारतीय के लिए भी यह सत्यापित करने के लिए एक तंत्र की आवश्यकता है कि कोई योजना उनके लिए युक्तिसंगत है कि नहीं। आधार, यूपीआई और जीएसटी के बीच एकीकरण ऐसी प्रणाली को पुख्ता करने में मदद कर सकता है।
अपना पैसा बैंक खातों में रखना पसंद करने वाले निवेशकों के लिए भी स्थिति बहुत अच्छी नहीं है। धोखाधड़ी के मामलों में वहां भी वृद्धि हुई है। आरबीआई का आंकड़ा है कि देश में अप्रैल 2021 से सितंबर 2021 के बीच 36,342 करोड़ रुपये के 4,071 बैंकिंग धोखाधड़ी के मामले सामने आए हैं। इनमें इंटरनेट और कार्ड से जुड़े लेनदेन के मामले 34.6 फीसद थे। ‘धनी’ ऐप के हालिया मामले को ही लें, जहां सैकड़ों भारतीयों के नाम पर बेहिसाब ऋण मिले। घोटालेबाजों ने ऋण की सुरक्षा के लिए पैन और आधार कार्ड के विवरण का उपयोग किया। इस समस्या के समाधान के लिए पीएसयू बैंकों को महत्वपूर्ण स्वायत्तता प्रदान करने और आरबीआई के सख्त केवाईसी मानदंडों को अनिवार्य करने की जरूरत है। यह भी कि हमें व्यावसायिक हितों वाले लोगों के बैंकों (सहकारिता सहित) के बोर्ड में शामिल होने पर सख्त प्रतिबंध लगाना चाहिए।
दिलचस्प है कि जिन लोगों ने सेवानिवृत्ति के लिए सरकार पर भरोसा रखा है, असुरक्षा वे भी महसूस कर रहे हैं। कर्मचारी भविष्य निधि संगठन (ईपीएफओ) खातों से अवैध धन निकासी के मामले पिछले एक साल से खासा बढ़ गए हैं। इस बाबत आई रिपोर्ट दिखाती है कि कैसे ईपीएफओ कर्मचारियों ने फर्जी दस्तावेज और मोबाइल नंबरों के जरिए बंद कंपनियों से कथित तौर पर पैसे निकाले हैं। सीबीआई ने ऐसे मामलों में 18.97 करोड़ रुपये के घोटाले के आरोप में ईपीएफओ के 18 अधिकारियों को पकड़ा है। जाहिर है, ईपीएफओ के कामकाज में पारदर्शिता लाने और कर्मचारियों की हित रक्षा के लिए इसे संस्थागत तौर पर सुदृढ़ बनाने की जरूरत है।
संस्थागत उपाय
गबन और धोखे के ऐसे तमाम मामलों को देखते हुए खुदरा निवेशकों की हिफाजत के लिए ठोस पहल जरूरी है। निवेशकों की जागरूकता और उनकी सुरक्षा के लिए संस्थागत उपायों का दायरा और तंत्र फिलहाल खासा कमजोर है। हमें बुनियादी तौर पर आधुनिक बैंकिंग ढांचे की जरूरत है, जो इस तरह के धोखों को रोकने में कारगर हो। खुदरा निवेशकों को सुरक्षा की आवश्यकता है और राज्य को इसे प्राथमिकता के साथ मुहैया कराना चाहिए।

