भीलवाड़ा से भजन लाल की “मौखिक मसाज़”शुरू!🙋♂️
*✍️सुरेन्द्र चतुर्वेदी*
*राजस्थान में इस बार कमाल हो रहा है। राज्य में हो रहे अवैध खनन को रोकने के लिए सरकार वो कर रही है जो अब तक ईमानदारी से कर लिया जाता तो अवैध खनन औंधे मुंह गिर पड़ा होता। भीलवाड़ा से सरकार ने अरावली व अन्य क्षेत्र में लंबे अर्से से हो रहे अवैध खनन पर अंकुश लगाने के लिए महाप्रहार अभियान शुरू किया है।राजस्व, पुलिस,खनिज,वन व परिवहन विभागों के अधिकारियों ने एक संयुक्त सेना का निर्माण किया है और यलगार कर दिया गया है। पंद्रह उपखंडों में 75 सूरमा भोपालियों को इसके लिए तैनात किया गया है। ड्रोन और सी सी टी वी की मदद ली जा रही है। और भी न जाने कितने बड़े इंतज़ाम किए गए हैं। यहाँ मज़ेदार बात यह है कि कल तक जिन विभागों के हाथ चौथ वसूली से सने हुए थे अब डिटर्जेंट से हाथ धो कर अपने आकाओं की बैंड बजाने में लगा दिए गए हैं। जो राजनेता खनन माफियाओं की सरपरस्ती कर रहे थे उनका क्या योगदान रहेगा❓यह फ़िलहाल मुख्यमंत्री जी ने साफ़ नहीं किया है ।*❌
*कल तक खनन के साझीदार, आज संरक्षण के ठेकेदार बनते नज़र आ रहे हैं। कल तक जिन विभागों के दस्तख़तों से पहाड़ कटते थे, जिनकी आँखों के सामने नदियाँ छलनी होती थीं, और जिनकी मौन-स्वीकृति से खनन माफ़िया ट्रक भर-भर कर संपदा लूटता था आज वही विभाग अचानक खनन रोकने के सबसे बड़े योद्धा बनकर मैदान में उतार दिया गया है। वाह! सत्ता की यही तो करामात है! यही तो चरित्र है! रातोंरात अपराध का साझीदार, भोर होते ही नैतिकता का पहरेदार! वाह सरकार वाह!*👌
*कल तक फ़ाइलें सरकाई जाती थीं, एनओसी की स्याही सूखने से पहले जेसीबी गरजती थीं, और नियमों की किताब धूल खाती थी। आज वही नियम छाती ठोककर पढ़े जा रहे हैं। कल तक “सब कुछ क़ानून के दायरे में” था; आज वही काम “पर्यावरण के ख़िलाफ़” घोषित हो गया। सवाल यह नहीं कि खनन गलत है—सवाल यह है कि गलत तब क्यों नहीं था जब हिस्सेदारी बँट रही थी❓😳*
*अचानक आई यह सामूहिक आत्मशुद्धि किस चमत्कार का परिणाम है❓क्या धरती ने आज ही कराहना शुरू किया❓ क्या अरावली आज ही टूट रही है❓या फिर ऊपर से कोई सिग्नल आया है—“अब रोकना है”❓ अगर खनन सचमुच जन-विरोधी और पर्यावरण-विरोधी था, तो वर्षों तक यह किसके संरक्षण में फला-फूला❓ किस विभाग की नाक के नीचे, किस थाने की चौखट पर, किस दफ़्तर की फ़ाइल में❓*😣
*आज छापे पड़ रहे हैं, नोटिस जारी हो रहे हैं, बयान दिए जा रहे हैं! मानो अपराध किसी और ग्रह पर हुआ हो। जिन अफ़सरों ने कल तक रास्ते साफ़ किए, वे आज कैमरों के सामने रास्ते बंद करवा रहे हैं। यह प्रशासनिक सक्रियता नहीं, यह राजनीतिक सुविधा है। जब तक लाभ था, तब तक चुप्पी; जब असहजता बढ़ी, तब नैतिकता।*🙄
*सत्य का तथ्य यह है कि अवैध खनन कोई रातों-रात पैदा हुई बीमारी नहीं। यह लंबे समय से पनपाई गई व्यवस्था है। परमिट, परिवहन, पुलिस, राजस्व, वन—सबके बीच मौन समझौते की देन। और अब जब सवाल उठे हैं, तब वही तंत्र अपनी ही परछाईं से लड़ता दिख रहा है।*🤨
*यदि सरकार वाक़ई गंभीर है, तो रोक सिर्फ़ जेसीबी की नहीं होनी चाहिए! सिस्टम की होनी चाहिए ! पिछली अनुमति देने वालों की जवाबदेही तय हो। जिन अफ़सरों कर्मचारियों की आँखों के सामने नियम टूटे, उन पर कार्रवाई हो। वरना यह पूरा अभियान भी वही होगा—आज का शोर, कल की खामोशी ! क्योंकि जनता सब देख रही है। उसे पता है कल तक जो खनन करवा रहे थे, आज वही खनन रोकने का ढोल पीट रहे हैं। और यह ढोल, सच कहें तो, काफ़ी खोखला है।*😯

