डॉ. विकास मानव
क़ुरान की देशना में तीन मूलभूत गुण हैं जो एक जीवन साधक के हृदय में होने चाहिए। ये सूफ़ीवाद के तीन स्तंभ हैं।
*1. विनम्रता :*
विनम्रता का अर्थ साधारण विनम्रता नहीं है। आमतौर पर जो लोग विनम्र दिखते हैं, वे वास्तव में अहंकारहीन नहीं होते। वे एक नए प्रकार का अहंकार पालते हैं—विनम्र होने का अहंकार। वे सोचते हैं, “मैं बहुत विनम्र हूँ। मुझसे अधिक विनम्र कोई नहीं है।”
यह तुलना जारी रहती है। अहंकार नहीं बदला, केवल उसका रूप बदल गया है, वह अधिक सूक्ष्म हो गया है। पहले अहंकार बहुत स्थूल था—जब आप अपनी संपत्ति का घमंड करते हैं, वह बहुत स्थूल होता है। एक दिन आप धन का त्याग कर देते हैं, और फिर आप यह दावा करने लगते हैं कि “मैंने सब कुछ त्याग दिया है।”
यह बहुत सूक्ष्म है, लेकिन घमंड जारी रहता है। पहले आप कहते थे, “मैं कोई हूँ,” और हज़ार तरीकों से यह साबित करने की कोशिश करते थे कि आप कोई हैं। फिर एक दिन, जब आप उसकी निरर्थकता को समझते हैं, तो आप विपरीत दिशा में मुड़ते हैं और कहते हैं, “मैं कोई नहीं हूँ।” लेकिन “मैं हूँ” का दावा अब भी बना हुआ है।
पहले यह “कोई होने” का दावा था, अब “कोई न होने” का दावा है। अहंकार वहीं का वहीं है, बस उसका रूप बदल गया है।
सच्ची विनम्रता तब आती है जब कोई अहंकार के सभी रूपों को समझ लेता है और अहंकार पूरी तरह विलीन हो जाता है। फिर कोई दावा नहीं रहता, यहाँ तक कि विनम्र होने का भी नहीं। जब कोई दावा ही नहीं बचता, तभी विनम्रता होती है।
*2. दानशीलता :*
दानशीलता का अर्थ है साझा करना, देने का आनंद। यह केवल इतना नहीं है कि आप किसी को कुछ दें और फिर अच्छा महसूस करें कि आपने कुछ दिया, या यह महसूस करें कि आपने जिस व्यक्ति को दिया है, उस पर कोई उपकार किया है। यदि ऐसा होता है, तो यह दान नहीं है।
सच्ची दानशीलता तब होती है जब आप बिना किसी भावना के देते हैं कि आप किसी पर कोई उपकार कर रहे हैं। आप इसलिए देते हैं क्योंकि आपके पास बहुत अधिक है—फिर और क्या किया जा सकता है?
दान के संबंध में, आपके लिए सबसे पहले यह देखना जरुरी होता है कि आप किसे और क्यों दे रहे हैं? क्या उससे अधिक पात्रता किसी में नहीं है? दान असहाय अथवा निराश्रित को दिया जाना संगत है. या जो निजी तौर पर यक़ीनन इनके लिए खुद को खपा रहे हैं. जो धनकुबेर या एनजीओ के रूप में नहीं, आप जैसों के सहयोग से सक्रिय हैं. उनको दान दिया जाना संगत है.
मंदिर, मस्जिद, पूंजीपतियों के ट्रस्ट, सत्ता के कोष वेगैरह को आप दान नहीं देते, रिश्वत देते हैं. प्रसिद्धि या पुण्य कुछ भी पाने की लालसा से किया गया दान आपको कोई मुकाम नहीं देता. आपका काम तमाम जरूर करता है.
फूल खिलता है और उसकी सुगंध हवाओं में फैल जाती है—फूल और क्या कर सकता है? दीपक जलता है और अपना प्रकाश बिखेरता है—वह और क्या कर सकता है? बादल जल से भर जाता है और वर्षा करता है—वह और क्या कर सकता है? तो आप जो कर सकते हैं, वो तो करें ही.
जब देने की प्रेरणा आपके भीतर की समृद्धि और परिपूर्णता से आती है, तभी वह सच्ची दानशीलता होती है। तब आप यह सोचकर परेशान नहीं होते कि बदले में क्या मिलेगा—यह मुद्दा ही नहीं रहता। अस्तित्व पर यकीन रखकर देंगें तो वह बेशक आपकी सोच से अधिक आपको देगा.
*3. सत्यनिष्ठा :*
सत्यनिष्ठा का अर्थ है प्रामाणिकता—कोई दिखावा नहीं करना, बल्कि वही होना जो आप वास्तव में हैं। इसका अर्थ केवल सत्य बोलना नहीं है, बल्कि सत्य होना है।
सिर्फ सत्य बोलना आधा मार्ग है; सत्य होना ही वास्तविक बात है। लोग कई बार सत्य तभी बोलते हैं जब वह उनके लिए हानिकारक नहीं होता। और यदि कभी सत्य किसी और के लिए हानिकारक हो सकता है, तो वे सत्य बोलने में बहुत ज़िद्दी हो जाते हैं। लेकिन जब सत्य उनके अपने लिए हानिकारक हो सकता है, तब वे उसे छोड़ देते हैं, तब सत्य उनके लिए कोई महत्व नहीं रखता।
सत्यनिष्ठा का अर्थ है—जो भी सत्य है, वही होना, बिना परिणाम की चिंता किए, और सत्य के लिए सब कुछ दाँव पर लगाने की हिम्मत रखना।
क्योंकि यदि सत्य सुरक्षित है, तो सब कुछ सुरक्षित है। और यदि सत्य खो जाता है, तो सब कुछ खो जाता है।

