Site icon अग्नि आलोक

सूब्रतो चटर्जी की तीन कविताएं

Share

समुद्र से आगे एक दुनिया है
उस दुनिया में अनगिनत कहानियां हैं
उन कहानियों में मेरी भी एक कहानी है.

किसी दिन
कोई पगली बयार
खोल देगी बंद पन्नों को
और एक उड़ती हुई मधुमक्खी
बैठ जाएगी मेरे शहद भरे अनछुए शब्दों पर
और उड़ा ले जाएगी अपने डंक में भरकर
सारा का सारा शहद.

इसलिए मधुछत्ते तक पहुंचना आसान नहीं है
लाखों डंकों से निपटना पड़ता है.

जो पहुंचे हैं शहद के ख़ज़ाने तक
वे अपने अपने समय में
कभी जात निकाला
कभी गांव निकाला
और कभी देश निकाला किए गए.

हरेक तड़ीपार क्रिमिनल नहीं होता
और खुद को लोहे की ज़ंजीरों से बांधने की जद्दोजहद
क़ानून नहीं होता.

ठीक जैसे
असमय मृत्यु का कारण नहीं होता
सिवा इसके कि जैविक आयु के मुंह पर
यह एक तमाचा है
और हमें इसी बात का अफ़सोस रहता है
उसी तरह
मेरे देश निकाले में तुम्हें कई अपवाद दिख सकते हैं
लेकिन
मैं हमेशा से ही उस समुद्र की तलाश में रहा हूं
जिसके पार एक दुनिया है
और जहां पर मेरी एक कहानी
किसी किताब में क़ैद है दोस्त.

2

और इसी तरह आदमी
धीरे धीरे बीमार हो जाता है
और बीमार आदमी को
कुछ अच्छा नहीं लगता
इसलिये कोई फ़र्क़ भी नहीं पड़ता
कि उसके इर्द गिर्द सारे पेड़
काटे जा चुके हैं
सारी इमारतें ढाई जा चुकी है
सारे नदी नालों का पानी
ज़ब्त किया जा चुका है
बिकने के लिये
हवा, रंग और आसमान का
बंटवारा हो चुका है

दरों के नाम पर बची हैं कुछ दीवारें
जिन्हें टेक बनाकर बीमार आदमी
पड़ा रहता है बेहिस
लेकिन मक्खियां बीमार नहीं हैं
मक्खियां भिनभिनाती हैं
बीमार आदमी के कीचड़ उगलते

आंखों की पपड़ियों पर
अधखुले होंठों से टपकते लार पर
गंदे नाक और पीब ठूंसे कान पर
मक्खियां डंक मारती हैं
बीमार आदमी में हलचल लाने के लिये
मैंने भी देखा है
बीमार लोगों को
लाश की तरह पानी पर उथले हुए
फूल कर भारी होते हुए
और आख़िर में
बह जाते हुए
पूजा के बासी फूलों की तरह.

3

मत जाओ
तुम्हारे जाने से
तुम्हारे पीछे रह जाती है
धुंध
और ढेर सारा कोहरा.

Exit mobile version