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*इवीएम के ज़रिए मोदी को शुद्ध, ब्राह्मणवादी, मनुवादी राजतंत्र चाहिए*

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मुख्य चुनाव आयुक्त को लोकतंत्र की रक्षा के लिए शुद्ध निर्वाचन सूची चाहिए. संघ को विकसित भारत बनाने के लिए शुद्ध हिंदुओं की नस्ल चाहिए. मोदी को राजतंत्र स्थापित करने के लिए विपक्ष मुक्त शुद्ध सत्ता चाहिए. सोचता हूं कि जिस देश में अब शुद्ध पानी मयस्सर नहीं है, वहां इतनी शुद्धता हरेक चीज़ में कहां से आएगी ? तो शुरू करते हैं पहले शुद्ध वोटर लिस्ट से.

2022 के यूपी विधानसभा चुनाव के समय हरेक बूथ पर यादवों और मुसलमानों के नाम वोटर लिस्ट से काट कर इसी शुद्धता की तरफ बढ़ाया गया पहला कदम था. चूंकि यह जातिवादी और सांप्रदायिक दृष्टिकोण से किया गया प्रयास था, इसलिए इसकी काफ़ी आलोचना भी हुई और इससे यूपी विपक्ष मुक्त राज्य भी नहीं बना.

रही सही कसर यूपी के लोकसभा चुनावों के नतीजों ने पूरी कर दी, जिसमें बिना प्रशासनिक हस्तक्षेप के शुद्ध हिंदुत्ववादी दल को सात या आठ सीटों से ज़्यादा नहीं मिलतीं. अब वर्ग संघर्ष को नकारने वाले धुर दक्षिणपंथी शुद्धतावादी ताक़तों को मालूम चला कि समाज का आर्थिक वर्गीकरण भी एक सच्चाई है.

बिहार में जाति जनगणना के बाद यह स्पष्ट हो गया कि वहां ग़रीबी हरेक जाति की संपत्ति है इसलिए हरेक जाति के ग़रीब शुद्धतावादी हिंदुत्व के पैरोकार पार्टी से दूर जाने लगी. हज़ारों जागरण और भंडारों पर पैसे लुटा कर भी शुद्ध क्रिमिनल लोगों के गिरोह को बिहार की जनता को सांप्रदायिक लाइन पर विभाजित करना संभव नहीं हुआ. अब विशुद्ध क्रिमिनल लोगों के गिरोह के पास मार्क्स बाबा के शरण में जाने के अलावा और कोई रास्ता नहीं बचा था.

सिर्फ़ कुछ विशेष जातियों के वोटरों के नाम काटने से शुद्ध विपक्ष रहित बिहार नहीं बनेगा. इसके लिए ज़रूरी है कि एक विशेष आर्थिक रूप से कमज़ोर वर्ग के वोटरों के नाम लिस्ट से काग़ज़ के बहाने गायब कर दिया जाए. इसलिए ऐसे काग़ज़ मांगो जो कि बिहार के अधिकांश वोटरों के पास हो ही नहीं.

इससे यह सुनिश्चित हो सकेगा कि गरीब और मेहनतकश जनता के वोट के अधिकार को छीन लिया जाए और अब मैच सिर्फ़ आर्थिक तौर शैक्षणिक रूप से ताकतवर लोगों के बीच होगा. अब चूंकि इस वर्ग के ज़्यादातर लोग शुद्धतावादी हैं, इसलिए इनके सर्वाधिक मत शुद्ध हिंदुत्ववादी पार्टी को जाता है. शुद्धिकरण की प्रक्रिया बहुत सामान्य विज्ञान है.

आपको शुद्ध धातु चाहिए तो उसके खनिज से बाक़ी तत्वों को अलग करना पड़ेगा. उदाहरणार्थ यूरेनियम अगर शुद्ध चाहिए तो उसके खनिज रूप से नब्बे प्रतिशत अशुद्धियों को बाहर निकालना होगा. जो बचेगा उससे एटम बम बना लिया जाएगा. यानि संपूर्ण विनाश के हथियार बिना शुद्धिकरण की प्रक्रिया से गुज़रे नहीं बन सकता है.

इसी तरह बिना शुद्ध हिंदुओं के संघ और भाजपा की विकसित भारत का सपना नहीं पूरा होगा. मतलब उन्हें ऐसे हिंदुओं की ज़रूरत है जो कि किसी अन्य धर्म का नाम सुनकर ही भड़क उठें और उन धर्मों के अनुयायियों को मारने पीटने पर उतारू हो जाएं. ऐसे शुद्ध हिंदू भाजपा को छोड़कर किसी भी अन्य पार्टी के अनुयायियों के लिए भी यही भावना रखें.

अब इस दलगत और सांप्रदायिक मानसिकता से उपर उठ कर हिंदुओं को समाज के सबसे कमज़ोर वर्गों के प्रति भी यही भावना रखनी होगी. यह घृणा की विशुद्धता ही है जो कि शुद्ध हिंदू बनने की पहली और अंतिम शर्त है. इसलिए संविधान से सबसे पहले समाजवाद और धर्मनिरपेक्षता शब्दों को हटाने की ज़रूरत है. शुद्ध घृणा और शोषण आधारित समाज बनाने के लिए इन अशुद्धियों को यथाशीघ्र दूर करने की ज़रूरत है.

हम भारत के लोग का मतलब हम भाजपा के वोटर जिस दिन हो जाएगा, उस दिन चुनाव आयुक्त को शुद्ध वोटर लिस्ट भी मिल जाएगा. अब इस शुद्ध वोटर लिस्ट, शुद्ध या परिष्कृत इवीएम के ज़रिए मोदी को शुद्ध, ब्राह्मणवादी, मनुवादी राजतंत्र को स्थापित करने का अवसर मिल जाएगा.

मेरा आपसे देश हित में यह आग्रह है कि आप सभी देश में चल रहे इस शुद्धिकरण की प्रक्रिया में अपना अमूल्य योगदान दें और देश को दुनिया के सबसे समृद्ध यूरेनियम बनने में मदद करें ! जबतक सबका साथ नहीं होगा तब तक सबका विकास कैसे होगा !? जब तक देश की नब्बे प्रतिशत आबादी ग़रीबी रेखा के नीचे इस शुद्धिकरण की प्रक्रिया के द्वारा नहीं धकेल दी जाएगी, तब तक बची हुई दस प्रतिशत आबादी को विकसित भारत कैसे मिलेगा !? जानम समझा करो !

‘मांग के खइब, मसीत में सोइब’ कहने वाले के द्वारा रचे गए ग्रंथ को पूजने वाले हिंदी पट्टी के लोगों को भीख मांगने से परहेज़ कब से होने लगा ? दरअसल आपके नायकों का चुनाव आपकी राजनीतिक और आर्थिक, सामाजिक सोच का द्योतक होता है . चे को हीरो मानने वाले अन्याय के विरूद्ध लड़ेंगे और राम को राजा मानने वाले ग़ुलामी के पक्ष में लड़ेंगे, यह सामान्य ज्ञान है. जब आप जीवन के कठोर धरातल पर अपनी सोच को किसी मिथक के हाथों बंधक बना कर आगे बढ़ते हैं तब आप हारने के लिए अभिशप्त हैं.

पिछले कई दशकों से भारत के एक बड़े हिस्से में सांस्कृतिक राष्ट्रवाद का बुख़ार चढ़ा हुआ है. इसके पीछे वही प्रतिगामी सोच है जो रामराज्य की परिकल्पना को साकार करने के नाम पर पूंजीवादी व्यवस्था की सबसे घृणित चेहरा, यानि फासीवाद को स्थापित करने की दिशा में बढ़ गया. सुनने में भले ही बुरा लगे लेकिन सच तो यह है कि गांधी जी भी रामराज्य की बात बिना सोचे समझे करते थे.

फिर भी गांधी जी का अभिप्राय एक समता मूलक देश और समाज स्थापित करने की थी. मोदी और भाजपा ने समता मूलक समाज के बदले सामाजिक समरसता का नारा दिया. सामाजिक समरसता का मतलब होता है शोषकों और शोषितों के बीच समरसता के तहत सहअस्तित्व. फासीवाद की असल जड़ यहीं पर छुपी हुई है.

शिकार और शिकारी के बीच कोई प्रेम संभव नहीं है. फ़ासिस्ट लोगों के सामने वर्ग संघर्ष को रोकने के लिए इससे बेहतर कोई राजनीति भी नहीं है जो कि आपको समझा दें कि आपका हत्यारा दरअसल आपका शुभचिंतक है. राजा है तो प्रजा चाहिए और जहां पर नागरिक हैं वहां प्रजा नहीं हो सकता है. इसलिए लोकतंत्र को प्रजातंत्र से दूर करने की कोशिश हरेक स्तर पर की जाती है. नागरिकों के अधिकारों को छीन कर उनको प्रजा बनाने की कोशिश की जाती है.

इसी तरह से एक पुलिस इंस्पेक्टर को असीमित अधिकार देकर macro level पर क़ानून बना कर नागरिकों को प्रजा बनाने की कोशिश की जाती है और हमारे देश के मुख्य न्यायाधीश सरकार की ऐसी फासीवादी निर्णयों को खुला समर्थन देते हैं.

ऐसे हालात में जनता की ज़िम्मेदारी है कि वह अपनी नागरिकता के लिए लड़ाई में उतरे, जो कि सड़क पर ज़िंदगी बिताने और भीख मांग कर खाने वाले लोगों को आदर्श मान कर नहीं किया जा सकता है.

   

    

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