सुसंस्कृति परिहार
आजकल दो रुदन काफी चर्चित हैं । एक टिकैत का और दूजे हमारे साहिब जी का ।होना भी चाहिए । आंदोलन पर लगे झूठे दाग से परेशान किसान मोर्चा प्रमुख राकेश टिकैत को जब उस जगह से हटाने फोर्स पहुंची तो जमीन बैठे टिकैत मंच पर पहुंचे और अपनी बात धारदार अश्रुप्रवाह में कही मैं यहां से नहीं हटूंगा । यहां का पानी भी नहीं पियूंगा और ज्यादा ज़ोर किया तो यही नहीं आत्महत्या कर लूंगा ।यह बात चित्रसहित तमाम मीडिया के जरिए गांव गांव पहुंची ।तो यकायक वे आसमान पर पहुंच गए ।देर रात में ही सैंकड़ों टे्क्टर भारी भीड़ के साथ पानी लेकर पहुंच गए ।पूरी मीडिया ठगी रह गई ।उसने सोचा था ये आंसू पराभव के देख आंदोलन तितर-बितर हो जाएगा ।इन आंसुओं ने परिवर्तन की बाढ़ ला दी । सरकार भी सकते में । उधर साजिश भी पकड़ी गई और इधर टिकैत का रुदन आंदोलन का इतिहास बन गया ।
पता नहीं साहिब ने इन आंसुओं से नया कुछ सीखा था या नहीं पर टिकैत के आंसुओं से प्रेरणा जरूर ली गई लगती है वरना इतने धारदार आंसू कैसे आते ?वे रोए और जम के । मसला भी कोई बड़ा नहीं था ।गुलाम नबी आजाद और अन्य तीन साथियों की राज्यसभा से बिदाई का मौका था ।जो चलता रहता है ।वे अटल जी अरुणजेटली, सुषमा स्वराज, गोपीनाथ मुंडे जैसे लोगों की जीवन से बिदाई पर नहीं रोए ना भावुक हुए फिर क्या था जो उन्हें रुला गया । दरअसल कश्मीर के मुख्यमंत्री के नाते उन्होंने कुछ गुजराती भाईयों को सुरक्षित गुजरात पहुंचाया था ।बराबर ख़बर उस समय गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी से साझा की थीं ।वह अचानक याद आ गया सो रो दिए ।अरे भाई यह तो सामान्य शिष्टाचार है ।ऐसा तो शत्रु राष्ट भी करता है ।पर कश्मीर जैसे आतंकी क्षेत्र से मुसलमान मुख्यमंत्री का सहयोग उनकी नज़रों में महत्वपूर्ण था । क्योंकि मन में नफरत का भाव था । हालांकि वे सदन में कई बार छोटे मुद्दों पर भावुक हो चुके हैं लेकिन बड़े बज्रपात उन्हें कभी रुला नहीं पाते गुजरात नरसंहार हो।पुलबामा में सैनिकों की मौत हो ,मौबलिंचिंग की तड़फती मौत हो, केदारनाथ और उत्तराखंड त्रासदी हो वे नहीं रो पाते ।
आज़ाद की बिदाई पर रुदन यह बात भी बेबात नहीं हुई ।मकसद साफ़ साफ़ नज़र आ रहा है कि वे उन्हें कांग्रेस से अपने खेमे में लाने की पुरजोर कोशिश में हैं क्योंकि आजकल कांग्रेस चुनाव को लेकर गुलाम नबी ने कई सवाल उठाए हैं ।ये आंसू व्यर्थ नहीं जाने चाहिए । अनमोल है । उधर बंगाल में भी चुनाव करीब हैं । वहां मुस्लिमों की बहुतायत है उन्हें भी तो साधना है ।गुलाम नबी यदि कांग्रेस से आज़ाद हो जाते हैं तो कश्मीर की सियासत में भी उपयोगी साबित होंगे ।देखना यह है कि आंसुओं की यह राजनीति कितनी कामयाब होती है। एक बात तो पक्की है कि हमारे साहिब और उनका जोड़ीदार दोनों इन कलाओं में पारंगत हैं क्यों ना हो उनका लक्ष्य भारत में एकला राज कायम करना है । राजनीति और प्यार में कहते हैं ।सौ ख़ून माफ रहते हैं ।साम दाम दंड भेद की राजनीति का सबसे कारगर इस्तेमाल भाजपा ने ही किया है ।उनकी शिक्षा-दीक्षा बहुत मज़बूत है ।
राकेश टिकैत के आंसू यदि आंदोलन को ताकत देने की सामर्थ्य रखते हैं तो अपने साहब भी कम नहीं है इतने बड़े देश के हैं एक नहीं कई कई गुलामों को कांग्रेस से आज़ाद करा सकते हैं ।ना आंसू रुकेंगे और ना कांग्रेसी आने का प्रवाह ।एक असंतुष्ट कमल छाप कांग्रेसी फिर भी ख़वाब देखता है कि कांग्रेसियों का बहुमत होते ही भाजपाइयों को पटकनी दे देंगे ।कौन समझाए उन्हें कि पटकनी देने के पहले हुनर तो सीख लो । बहरहाल हम दुआएं करते हैं कि हमारे साहिब के सभी नाटक सफ़ल रहें । लेकिन टिकैत के आंसुओ का भी ख्याल रखें। आंसुओं का भाईचारा कायम करें । कोई पुरानी यारी संकटमोचन बन सकती है । । रुदन अकारथ नहीं जाना चाहिए । ये सिसकन बहती अश्रुधार आखिरकार ऐरे गैरे की तो नहीं है जो जब चाहे झरती रहती हैं ।जनाब ये हमारे साहिब के आंसू हैं कहीं ना कहीं कुछ ग़म तो होगा ही । टिकैत के आंसुओ पर उमड़ी भीड़ और अन्तर्राष्ट्रीय ख्याति में उन्हें पिछड़ने का ग़म तो नहीं है जो अचानक गु़लाम नबी के बहाने फूट पड़ा । कुछ तो है मर्म समझकर साहिब को तसल्ली बख्शें अभी 2024 काफ़ी दूर है
।आमीन ।ख़ुदा ख़ैर करे ।

