शशिकांत गुप्ते
उम्मीद पर दुनिया कायम है। इस कहावत का जब भी स्मरण होता है,तब यह कहावत भी याद आ जाती है, भरोसे की भैंस पाड़ा जनती है
दोनों कहावतें, मनुष्य के लिए स्वार्थ प्रेरित है। वैसे भी यह कहा ही जाता है कि,सभी प्राणियों में मनुष्य जैसा स्वार्थी प्राणी अन्य कोई नहीं है।
दूसरी कहावत में मनुष्य के स्वार्थ का प्रत्यक्ष प्रमाण है। एक ओर मनुष्य, पुरुष प्रधान मानसिकता से ग्रस्त है,दूसरी ओर यदि भैंस ने नर शिशु (पाड़ा) को जन्म दिए तो मनुष्य निम्न कहावत को याद करने लगता है। उम्मीदों पर पानी फिरना
उम्मीद पर दुनिया कायम है,इस कहावत में उम्मीद जगाने वाले की नीयत पर बहस करना जरूरी है।
लगभग दस वर्ष पूर्व देश की जनता को बहुत जोर शोर से वादों में शब्द रूपी पंद्रहलाख देने की उम्मीद जगाई थी। दो करोड़ रोजगार प्रतिवर्ष मिलने वाले थे।घोषणा करने वालों की स्वार्थपूर्ति होने पर सारे वादें, जुमले में परिवर्तित हो गए। इस तरह जनता की उम्मीद पर पानी फिर गया।
उम्मीद एक मनोवैज्ञानिक शब्द है। उम्मीद शब्द का इस्तेमाल भी मनोवैज्ञानिक रूप से ही किया जाता है।
इस शब्द का प्रयोग प्रायः ठग विद्या में निपुण लोग ही करते हैं। ये ठग लोग लच्छेदार भाषा में प्रलोभन देकर भोले लोगों में उम्मीद जगाते हैं। झूठे आश्वासनों के झांसे में आकर लोग उम्मीद लगाए रहतें हैं,और होने वाले लाभ की प्रतीक्षा में अपना सर्वस्व लूटा देते हैं।
उम्मीद जगाकर लूटने वालों की फितरत शायर अख़्तर नज़्मी
के इस शेर को पढ़ने पर स्पष्ट होती है।
वो ज़हर देता तो सब की निगाह में आ जाता
सो ये किया कि मुझे वक़्त पे दवाएँ न दीं
वक्त पर दवाई देना तो दूर,कुछ शातिर लोग,मर्ज की जांच ही नहीं करवाते हैं।
पहले नाडी वैद्य सिर्फ नब्ज देख कर मर्ज का पता लगा लेते थे और मरीज को दवा भी किफायती भाव देना अपना फर्ज समझते थे
आज तो मनोविज्ञान का सहारा लेकर लोगों के जज़्बातो से खेलते हैं।
इस संदर्भ में शायर जावेद अख़्तर ने क्या खूब कहा है।
तख़्त की ख़्वाहिश लूट की लालच कमज़ोरों पर ज़ुल्म का शौक़
लेकिन उन का फ़रमाना है मैं इन को जज़्बात लिखूँ
शशिकांत गुप्ते इंदौर

