मुनेश त्यागी
पहले किसानों ने देश की जनता और किसानों को बचाने के लिए एक वर्ष से ज्यादा धरना देकर आंदोलन किया था जिसमें 700 से ज्यादा किसान शहीद हुए थे। अब 28 29 मार्च 2022 को पूरे देश का मजदूर वर्ग यानी 90 फ़ीसदी से ज्यादा मजदूर वर्ग देशव्यापी हड़ताल पर जाने को मजबूर हुआ है। हड़ताल पर जाने वाले मजदूर और कर्मचारी संगठन पिछले काफी अर्से से सरकार की जन विरोधी, मजदूर विरोधी और कर्मचारी विरोधी नीतियों का विरोध कर रहे हैं और इन तमाम मजदूर, कर्मचारी वर्ग विरोधी नीतियों और कानूनों को वापस लेने की मांग कर रहे हैं।
सरकार ने सारे के सारे मजदूर कानूनों को समाप्त करने का मन बना लिया है। उसने चार संहिताऐं बनाई हैं। गजब की बात है कि इन श्रम कानूनों को बनाने के वक्त सरकार ने राष्ट्रव्यापी हड़ताल पर जाने वाले श्रमिक संगठनों के प्रतिनिधियों से बातचीत करने की कोई भी कोशिश नहीं की। सरकार ने एक और अद्भुत कारनामा किया है वह यह कि पुराने कानूनों में जो खामियां थी उन पर मजदूर वर्ग मजदूर वर्ग की यूनियनों या श्रम कानून विशेषज्ञों से कोई बातचीत न करके इन खामियों को दूर करने की कोई कोशिश नहीं की है।
पुराने कानूनों में अधिकांश कानून श्रमिक और कर्मचारियों के हितों में थे और श्रमिकों के सामने आने वाली परेशानियों को दूर रखने की ताकत और प्रावधान रखते थे श्रमिकों के सामने उन कानूनों को समय से और पूर्ण रुप से लागू न करने की समस्या थी अगर उनका पुराने कानूनों को समय से लागू करा दिया जाता तो भारत के 99% श्रमिकों का भला हो जाता। उनमें मुख्य कानून औद्योगिक विवाद अधिनियम, कारखाना अधिनियम, ग्रेच्युटी एक्ट, बोनस एक्ट, भविष्य निधि अधिनियम, वेतन भुगतान अधिनियम, न्यूनतम वेतन अधिनियम, समय से वेतन भुगतान अधिनियम, प्रमोशन एवं सेल्स कर्मचारी अधिनियम, एम्पलाइज कंपनसेशन एक्ट, स्टैंडिंग ऑर्डर्स अधिनियम आदि कानून मजदूर फ्रेंडली हैं और इनमें से 99% श्रमिकों की समस्याओं का हल हो जाता है।
इन कानूनों को समय से लागू करना था और इनके पालन में आ रही कमियों को दूर करना था। मगर सरकार ने ऐसा करने का कोई कदम नहीं उठाया और अपने आप ही पूंजीपतियों और धन्ना सेठों के दबाव में इन समस्त श्रम कानूनों को रद्द करके चार श्रम संहिताओं को मजदूरों के ऊपर लाद दिया है जो मजदूरों की समस्याओं का प्रभावी हल नहीं निकालती उल्टे मजदूरों के गले में नई फांसी के फंदे डाल रही होंगी, उनके सारे अधिकार छीन नहीं होंगी और उन्हें नए सिरे से गुलाम बना रही होंगी।
सरकार की नीतियां बिल्कुल श्रमिक और कर्मचारी विरोधी हैं, स्थाई नौकरी खत्म कर दी गई हैं, मजदूरों का ठेके पर रखने का प्रावधान किया गया है, यूनियन बनाने के अधिकार को लगभग असंभव बना दिया गया है, ओवरटाइम वेतन का खात्मा कर दिया गया है, एक दिन के काम की अवधि 12 घंटे की होगी, जिसमें 4 घंटे का कोई ओवरटाइम नहीं मिलेगा, महिलाओं को रात्रि की पाली में काम करना होगा जो महिलाओं की सुरक्षा की समस्या पैदा करेगा, ग्रेच्युटी एक्ट लगभग निष्प्रभावी हो जाएगा और आंदोलन को कुचलने के लिए पुलिस बल का प्रयोग किया जाएगा।
सरकार ने इन चारों संहिताओं को लागू करने की बाबत यूनियन और मजदूर कर्मचारी नेताओं का या कानूनी विशेषज्ञों से कोई बातचीत नहीं की है। सरकार एक तरफ से पूरे धन्ना सेठों और पूंजीपति वर्ग को लाभ पहुंचाने के लिए इन कानूनों को लाई है। इससे केवल शोषण, जुल्म अन्याय और मुनाफा बढ़ेगा इसे केवल शोषण और अन्याय करने वाले धन्ना सेठों और पूंजीपतियों को फायदा होगा। इसमें मजदूर वर्ग का लगभग कोई फायदा होने वाला नहीं है। उनको केवल नयी गुलामी की बेड़ियां जरूर पहनाई जा रही होंगीं। ये कानून कतई भी देश की जनता, मजदूरों और कर्मचारियों के हित में नहीं है इनका विरोध करना और इन को लागू करने से रोकना पूरी तरह से देश हित में है।
इस राष्ट्रव्यापी हड़ताल में मजदूर वर्ग के लगभग अधिकांश कर्मचारी संगठन शामिल हैं जैसे इंटक, एटक, एचएमएस, सीटू, ऐफ्टू, टीयूसी, सेवा, यूटीयूसी, राज्य कर्मचारी, रेलवे, बीमा, बैंक फेडरेशन, रेलवे ठेका मजदूर यूनियन आदि सैकड़ों यूनियनें शामिल हैं। इस आंदोलन को कांग्रेस, समाजवादी, वामपंथी सभी विचारों की यूनियन शामिल हैं और केवल r.s.s. से संबंधित बीएमएस यूनियन इसमें शामिल नहीं है।
इस आंदोलन की मुख्य मांगे इस प्रकार हैं,,,,
चार श्रम संहितायें खत्म करो, न्यूनतम वेतन लागू करो, निजी करण की मुहिम खत्म करो, ठेकेदारी प्रथा को खत्म करो, पुरानी पेंशन बहाल करो, फसलों का एमएसपी किसानों को दो, सभी श्रमिकों और कर्मचारियों लिए न्यूनतम वेतन 26000 रू प्रति माह करो, सभी को रोजगार की गारंटी दो, बेरोजगारों को ₹5000 प्रति माह बेकारी भत्ता दो, मनरेगा में 300 दिन का और ₹600 प्रतिदिन का वेतन लागू करो, पेट्रोल और डीजल की बढ़ती हुई कीमतों पर रोक लगाओ, सभी वृद्धजनों, विधवाओं और दिव्यांगों की पेंशन में बढ़ोतरी करो, मजदूर आंदोलन को कुचलने में पुलिस हस्तक्षेप बंद करो, निर्माण श्रमिकों को पेंशन और समय से वेतन भुगतान का प्रबंध करो।

