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हेट स्पीच पर रोक के लिए नेताओं को संवैधानिक मूल्यों के पाठ को नए सिरे से पढ़ना होगा

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विराग गुप्ता
हेट स्पीच पर सुप्रीम कोर्ट ने कई बार मौखिक आलोचना की, लेकिन कुछ दिनों पहले लिखित आदेश पारित करके जजों ने इसे लेकर सख्त संदेश दिया। यह आदेश अंतरिम है। यानी सरकारों के जवाब और वकीलों की जिरह के बाद फाइनल जजमेंट पारित होगा। यूं तो आदेश सख्त है, फिर भी इसमें कुछ कमजोरियां हैं।

तीन अहम बिंदु
अब हेट स्पीच वालों के खिलाफ यूएपीए के इस्तेमाल की गैरजरूरी मांग आगे बढ़ी तो स्थिति बिगड़ सकती है। इसलिए हेट स्पीच के नासूर के सटीक इलाज से पहले, तीन अहम पहलुओं की पड़ताल जरूरी है।

हेट स्पीच के खिलाफ बनी आईटी एक्ट की धारा 66-ए के सुप्रीम कोर्ट से निरस्त होने के बावजूद सरकारें इसके तहत मामले दर्ज कर रहीं थीं। सियासी मामलों में बुलडोजर चलाने वाली पुलिस अब हेट स्पीच के मामलों में मनमाफिक तौर पर मौन और मुखर है। इसलिए हेट स्पीच के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट से नई गाइड्लाइन या फैसले से पहले पुराने मामलों का संदर्भ समझना जरूरी है। एनसीआरबी के आंकड़ों के अनुसार सन 2014 में धारा 153 ए के तहत 323 और 153 बी के तहत कुल 13 मामले दर्ज हुए। जबकि 2020 में इनकी संख्या 1804 और 82 थी। दोनों कानूनों के तहत दर्ज अपराधों में पांच से छह गुना बढ़ोतरी हुई, जबकि इन मामलों में सजा की दर सिर्फ 15 से 20 फीसदी रही।

भयावह तस्वीर
फिर भी, ये मामले हेट स्पीच की भयावह तस्वीर को उजागर नहीं करते। स्मार्टफोन और सोशल मीडिया के विस्तार के साथ हेट स्पीच का मर्ज दिन दूना रात चौगुना बढ़ रहा है। पिछले 16 महीने में भारत में वट्सऐप ने 2.4 करोड़ खातों पर बैन लगाया। इंटरनेट कंपनियां, नेताओं की चुनावी राजनीति और सभी दलों से जुड़े आईटी सेल इस खेल में लगे हुए हैं। सोशल मीडिया, टीवी डिबेट और वट्सऐप के दौर में हेट स्पीच ने समाज को बांट दिया है। इस भयावह तस्वीर की छोटी सी झलक सुप्रीम कोर्ट जजों के अंतरिम आदेश में दिखती है। हेट स्पीच पर प्रभावी रोक के लिए नेताओं को चुनावी राजनीतिक फायदे से आगे बढ़कर संवैधानिक मूल्यों के सम्मान के पाठ को नए सिरे से पढ़ना होगा।

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