शैलेन्द्र चौहान
कभी एक नैतिक उक्ति बड़े आत्मविश्वास के साथ दोहराई जाती थी—“धन खो जाए तो कुछ नहीं खोया, स्वास्थ्य खो जाए तो कुछ खोया, और चरित्र खो जाए तो सब कुछ खो दिया।” यह वाक्य केवल नैतिक शिक्षा का सूत्र नहीं था; वह एक ऐसे सामाजिक-सांस्कृतिक मूल्यक्रम का संकेत था जिसमें मनुष्य की गरिमा, विश्वसनीयता और नैतिक पूँजी को आर्थिक पूँजी से ऊपर रखा जाता था। किंतु समकालीन समय में ऐसा प्रतीत होता है कि यह मूल्य-क्रम उलट गया है। आज यह धारणा प्रबल होती जा रही है कि “बिना धन कुछ भी नहीं है”; स्वास्थ्य आवश्यक है, किंतु वह भी अक्सर धन अर्जन की क्षमता से जुड़ा हुआ है; और चरित्र—वह तो मानो सार्वजनिक विमर्श से लगभग अनुपस्थित हो गया है। इस परिवर्तन को केवल नैतिक पतन कहकर टाल देना पर्याप्त नहीं होगा। इसके पीछे आधुनिक पूँजीवादी समाज, उपभोक्तावादी संस्कृति, प्रतिस्पर्धात्मक अर्थव्यवस्था और मीडिया-निर्मित आकांक्षाओं की जटिल संरचनाएँ सक्रिय हैं।
प्रथम दृष्टया यह समझना आवश्यक है कि पारंपरिक समाज में “चरित्र” का अर्थ क्या था। चरित्र केवल व्यक्तिगत सद्गुणों—सत्यवादिता, संयम, विश्वसनीयता—का नाम नहीं था; वह सामाजिक पूँजी भी था। छोटे समुदायों में व्यक्ति की प्रतिष्ठा उसके नैतिक आचरण पर निर्भर करती थी। आर्थिक लेन-देन भी भरोसे पर आधारित होते थे। वहाँ चरित्र का क्षरण केवल निजी नहीं, सामुदायिक संकट माना जाता था। इसलिए यह स्वाभाविक था कि चरित्र को सर्वोच्च मूल्य के रूप में स्थापित किया जाए। स्वास्थ्य को भी इसलिए महत्व दिया गया कि वह जीवन-क्रिया का आधार है; और धन को इसलिए गौण माना गया कि वह साधन है, साध्य नहीं।
किन्तु आधुनिकता के साथ सामाजिक संरचनाएँ बदलीं। औद्योगीकरण और नगरीकरण ने समुदायों को विखंडित किया। व्यक्ति अब घनिष्ठ समुदायों का सदस्य कम और विशाल, अनाम बाजार का उपभोक्ता और उत्पादक अधिक है। यहाँ प्रतिष्ठा का आधार नैतिकता नहीं, बल्कि उपलब्धि और उपभोग बन गया। समाजशास्त्री मैक्स वेबर ने पूँजीवादी नैतिकता में “कार्य-सफलता” और “आर्थिक अर्जन” को नैतिक मूल्य का रूप लेते हुए देखा था। समय के साथ यह नैतिकता अधिक भौतिकवादी और उपभोक्तावादी रूप में विकसित हुई, जहाँ सफलता का मापदंड आय, संपत्ति और दृश्य वैभव बन गया।
इस परिवर्तन में मीडिया और विज्ञापन उद्योग की भी महत्त्वपूर्ण भूमिका है। आधुनिक मनुष्य का मानस लगातार उन छवियों से घिरा है जो सफलता को महँगी कारों, आलीशान घरों, ब्रांडेड वस्त्रों और विदेशी यात्राओं से जोड़ती हैं। यहाँ चरित्र अदृश्य है, स्वास्थ्य भी तभी तक महत्त्वपूर्ण है जब तक वह आकर्षक देह और कार्य-क्षमता का प्रतीक बना रहे। धन ही वह शक्ति है जो इन सभी प्रतीकों को सुलभ बनाती है। इस प्रकार धन स्वयं में एक सार्वभौमिक प्रतीक बन जाता है—प्रतिष्ठा, स्वतंत्रता, सुरक्षा और सुख का।
स्वास्थ्य के संदर्भ में भी दृष्टिकोण बदला है। पारंपरिक समाज में स्वास्थ्य जीवन की नैसर्गिक अवस्था था; आज वह एक “प्रोजेक्ट” बन गया है। जिम, डाइट प्लान, सप्लीमेंट, हेल्थ इंश्योरेंस—सब कुछ बाजार से जुड़ा है। स्वास्थ्य भी एक निवेश है, ताकि व्यक्ति अधिक समय तक उत्पादक बना रहे। यहाँ स्वास्थ्य का मूल्य भी अंततः आर्थिक संरचना से जुड़ जाता है। एक विडंबना यह है कि जिस समाज में स्वास्थ्य को महत्त्व दिया जाता है, वहीं जीवन-शैली ऐसी है जो तनाव, अवसाद और रोगों को बढ़ाती है।
चरित्र के अवमूल्यन की अनुभूति इसलिए तीव्र है क्योंकि सार्वजनिक जीवन में अनेक उदाहरण ऐसे दिखाई देते हैं जहाँ आर्थिक सफलता नैतिक प्रश्नों को ढँक देती है। घोटालों में लिप्त व्यक्ति भी यदि आर्थिक रूप से शक्तिशाली हैं तो सामाजिक स्वीकृति प्राप्त कर लेते हैं। राजनीति, कॉर्पोरेट जगत और मनोरंजन उद्योग में “परिणाम” अक्सर “प्रक्रिया” पर भारी पड़ जाता है। इस परिघटना को फ्रांसीसी चिंतक पियरे बोरदियो की अवधारणा से समझा जा सकता है—आर्थिक पूँजी अन्य पूँजियों (सांस्कृतिक, सामाजिक, प्रतीकात्मक) को प्रभावित और नियंत्रित करती है। जब आर्थिक पूँजी का वर्चस्व बढ़ता है तो नैतिक पूँजी का स्थान संकुचित हो जाता है।
परंतु क्या वास्तव में चरित्र का मूल्य समाप्त हो गया है, या वह केवल रूपांतरित हुआ है? यह प्रश्न गंभीर है। आधुनिक संस्थाएँ—कानून, अनुबंध, पारदर्शिता तंत्र—चरित्र की जगह लेने का प्रयास करती हैं। जहाँ पहले भरोसा व्यक्ति पर था, अब भरोसा प्रणाली पर है। इस परिवर्तन ने व्यक्तिगत नैतिकता की आवश्यकता को कम नहीं किया, बल्कि उसे अप्रत्यक्ष बना दिया। उदाहरण के लिए, कॉर्पोरेट जगत में “एथिक्स” और “कॉम्प्लायंस” के विभाग स्थापित किए जाते हैं; विश्वविद्यालयों में अकादमिक ईमानदारी पर बल दिया जाता है; सार्वजनिक जीवन में पारदर्शिता की माँग उठती है। यह दर्शाता है कि चरित्र का प्रश्न अभी भी प्रासंगिक है, किंतु उसका विमर्श नैतिक उपदेश से हटकर संस्थागत ढाँचों में स्थानांतरित हो गया है।
फिर भी यह सत्य है कि आर्थिक असमानता और असुरक्षा के वातावरण में धन सर्वोपरि प्रतीत होता है। बेरोजगारी, महँगाई और सामाजिक प्रतिस्पर्धा ने जीवन को ऐसा बना दिया है जहाँ आर्थिक सुरक्षा के बिना सम्मानजनक जीवन कठिन है। इस संदर्भ में “बिना धन कुछ भी नहीं” का कथन केवल लालच का नहीं, बल्कि भय और असुरक्षा का भी परिणाम है। जब स्वास्थ्य-सेवा, शिक्षा और आवास सब कुछ बाजार पर निर्भर हो, तब धन जीवन की मूलभूत शर्त बन जाता है।
यहाँ नैतिक दुविधा उत्पन्न होती है। यदि धन जीवन की आवश्यकताओं की पूर्ति का साधन है, तो उसका महत्त्व स्वीकार्य है; किंतु जब वह स्वयं जीवन का अंतिम लक्ष्य बन जाता है, तब चरित्र और स्वास्थ्य दोनों संकट में पड़ते हैं। धनार्जन की अंधी दौड़ व्यक्ति को ऐसे निर्णयों की ओर ले जा सकती है जो नैतिक समझौते की मांग करते हैं। तनावपूर्ण जीवन-शैली स्वास्थ्य को क्षीण करती है। परिणामतः वह संतुलन टूट जाता है जिसकी कल्पना पारंपरिक उक्ति में की गई थी।
अतः यह कहना अधिक समीचीन होगा कि मूल्य-क्रम का उलट जाना एक जटिल सामाजिक-आर्थिक प्रक्रिया का परिणाम है। आधुनिक समाज ने धन को इसलिए केंद्रीय बनाया क्योंकि वह अवसर, सुरक्षा और प्रतिष्ठा का माध्यम है। किंतु इससे यह निष्कर्ष नहीं निकलता कि चरित्र और स्वास्थ्य अप्रासंगिक हो गए हैं। बल्कि वे नए रूपों में, नए संघर्षों के साथ उपस्थित हैं। चुनौती यह है कि हम धन को साधन के रूप में स्वीकार करें, साध्य के रूप में नहीं; स्वास्थ्य को केवल उत्पादकता का उपकरण नहीं, जीवन-आनंद का आधार मानें; और चरित्र को उपदेश की वस्तु नहीं, बल्कि व्यक्तिगत और सामाजिक विश्वास की अनिवार्य शर्त समझें।
समकालीन मनुष्य के सामने यही बौद्धिक और नैतिक प्रश्न है—क्या वह धन की अनिवार्यता को स्वीकार करते हुए भी उसके वर्चस्व से मुक्त रह सकता है? क्या वह ऐसे सामाजिक ढाँचे की कल्पना कर सकता है जहाँ आर्थिक प्रगति के साथ नैतिक विश्वसनीयता और स्वास्थ्य-संतुलन भी समान रूप से प्रतिष्ठित हों? यदि यह संभव नहीं हुआ, तो “धन की सर्वोच्चता अंततः उसी समाज को खोखला कर देती है जिसने उसे सर्वोपरि घोषित किया था; क्योंकि जब विश्वास टूटता है तो बाजार भी टिकाऊ नहीं रहता और जब स्वास्थ्य चुकता है तो संपत्ति भी अर्थहीन हो जाती है। तब मनुष्य पुनः खोजता है—वही चरित्र, जिसे उसने कभी ‘अप्रासंगिक’ मान लिया था।”
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