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दशकों पहले जो गलती लेबनान ने की थी आज हम उस गलती को बुलावा दे रहें हैं

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लेबनान पश्चिम एशिया में स्थित एक बहुत खूबसूरत देश था, लेबनान की राजधानी बेरूत 1970 के दशक में समृद्ध शहरो में से एक थी जिसे मध्यपूर्व का पेरिस भी कहा जाता था। अपने इतिहास, पर्यटन, लेबनानी व्यंजन और प्राकृतिक सौंदर्य के लिए प्रसिद्ध ये देश 1943 में फ्रांस से आजाद हुआ। यहां के लोगो ने अपने देश के लिए जी तोड़ मेहनत की और अपने देशों को समृद्ध देशों में शामिल करने में सफ़ल हुए। लेकिन आज स्थिति ये है की लेबनान की 80% जनसंख्या गरीबी रेखा नीचे पहुंच गईं है लेबनानी पाउंड 90% गिर चुकी हैं। लेकिन क्या हुआ ऐसा कि दशकों पहले जो देश दुनिया के समृद्ध देशों में सुमार था आज वो देश गर्थ में हैं और लोग अपना देश ही छोड़ने के लिए मजबूर हैं।

आईए पहले जानते है लेबनान की डेमोग्राफी के बारे में ये एक ऐसा देश हैं जहां आधिकारिक रूप से 18 पंथ रहतेk हैं इनमें से 31.9 % सुन्नी मुस्लिम, 31% शिया मुस्लिम, 30% मेरोनाईट ईसाई और बाकि अन्य छोट छोट पंथ है। सब कुछ सही चल रहा था लेकिन एक समय ऐसा आया सरकार ने एक ऐसी व्यवस्था लाई जिसमें धर्म और राजनीति की सीधे हिस्सेदारी तय करदी जिसे कॉन्फेशनलिज्म कहा गया।

     जनसँख्या की औसत के आधार पर सभी बड़े पद जैसे क्रिश्चनस के लिए राष्ट्रपति, सुन्नी मुस्लिम के लिए प्रधानमंत्री, शिया के लिए स्पीकर का पद आरक्षित कर दिया। यहां तक कि देश के सांसद में संख्या, तमाम संसाधन, सरकारी गैर सरकारी पदों एवं व्यवस्थाओं पर भी प्रतिशत के आधार पर भागीदारी तय कर दी गईं। अब हुआ ये कि लेबनान में एक समय के बाद जातिय संघर्ष शुरू हो गया संसद से ना कोई पोलिसी ना कानून पास हो पाते थे, क्योंकि सभी के लिए अपना धार्मिक तुष्टिकरण प्राथमिक था। 

      लेबानन में अपनी धार्मिक संख्या बढ़ाने के लिए लोग पड़ोसी देश पिलस्तीन, इजरायल, सीरिया से लोगो को बसाने लगे। लेबनान में गृह युद्ध शुरू हो गया 1970 से 1995 तक लेबनान धू धू कर जलता रहा, सरकारी संपतिया तबाह कर दी गईं, ईसाईयों को देश से भगा दिया गया और आज स्थिति सामने है।

ये था इतिहास, ये हैं एक सीखा लेकिन हम इस इतिहास से मुंह मोड़ रहें है और दशकों पहले जो गलती लेबनान ने की थी आज हम उस गलती को बुलावा दे रहें हैं। आज देश के नेता जातिय जनगणना (Cast Census) की मांग करके जातीय राजनीति का आगाज़ करना चाहते हैं जिसमें उनका उद्देश केवल तुष्टीकरण और राजनीतिक महत्वाकांक्षा हैं। आज जातिगत जनगणना की मांग है, कल जातियों के आधार पर पार्टियां तैयार होगी, फिर है क्षेत्रों में भागीदारी की मांग होंगी, जातिगत द्वेष बड़ेगा और देश के सामने कैसी चुनौतियां खड़ी होंगी हम कल्पना भी नहीं कर सकते।

         हमने देखा है कैसे समाज के एक वर्ग का नेता बन कर और तिलक तराजु और तलवार जूता मारो इनको चार का नारा देकर मुख्यमंत्रि बनते हुए और अपना उल्लू सीधा करते हुए दशकों तक राज करना। और कोई पूछे कि उन हरिजनों, दलितों, शोषितों के लिए क्या किया तो जवाब कुछ नहीं। 

       आज़ादी के 75 साल बाद हमने छुआछूत जैसे कुप्रथाओं को समाप्त कर किसी जातिय, धार्मिक, लैंगिक पहचान के साथ नहीं बल्कि एक देश के रूप में तरक्की की और आज शीर्ष पर पहुंचने को हैं। हमे कृतज्ञ होना चाहिए महात्मा गांधी का जो अंबेडकर द्वारा ST/SC के लिए पृथक निर्वाचन (Seprate Electorate) की मांग पर आमरण अनशन पर बैठ गए थे और पूना पैक्ट साइन किया नही तो आज हो सकता है की हम जातिय संघर्ष के कारण गृह युद्ध झेल रहें होते। 

     एक छोटा सा निर्णय, एक नीति भी भविष्य में क्या प्रभाव डाल सकती है ये कोई नही जानता इसी लिए हमे हमारे निर्णय सोच समझ कर लेने चाहिए। आज हम अपनी जाति, धर्म, संप्रदाय, भाषा और स्थानीय पहचान की जगह राष्ट्रीय पहचान के रूप में तरक्की कर रहें हैं।  हमने सर्वोदय की बात की है हमने सर्वे भवंतु सुखिना: की बात की है हमने कहा धर्म की जय हो अधर्म का विनाश हो प्राणियों में सद्भावना हो विश्व का कल्याण हों।

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