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आज की मीरा : अमरकण्टक की सिद्धसाध्वी पगली माँ

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 दिव्यांशी मिश्रा

      _अमरकण्टक से सात किमी दूर जब आप कपिल धारा जाते हैं तो कपिल मुनि आश्रम की पुलिया से पहले ही पहाड़ी पर एक आश्रम है जिसे अधिकांश लोग पगली माँ के आश्रम से पहचानते हैं। अगर आप पुल के रास्ते से आश्रम नहीं जाना चाहेंगे तो नर्मदा का जल लांघकर सीढ़ियों का रास्ता पकड़कर आश्रम पहुँचना होगा । कभी एक झोंपड़ी नुमा रहा यह आश्रम अब पक्का बन चुका है और भक्तगण आज भी इसका विस्तार कराए जा रहे हैं।_

        यहाँ माँ का निजी कक्ष और निजी मंदिर एक बड़े हाल में है। रसोई भी है। भक्तों और अतिथियों के लिए ठहरने की व्यवस्था और एक गौ शाला है। सब कुछ बहुत अनौपचारिक और अव्यवस्थित। यह ही माँ का स्वभाव है। 

     _ये  पगली माँ ही हैं  नर्मदा की साध्वी मीरा माँ। जिनकी हर साँस और रोम रोम में माँ नर्मदा ही बसती हैं। जल पीना है तो माँ नर्मदा का और सूक्ष्म भोजन करना है तो माँ नर्मदा का ही। भजन भाव सब माँ नर्मदा के लिए ही। लोग इन्हें साक्षात माँ नर्मदा के रूप में ही देखते हैं और पूजते हैं।आशीर्वाद लेते हैं।_

        बचपन से ही माँ नर्मदा में ऐसी रची बसीं कि लोग इन्हें पगली माँ के नाम से ही सम्बोधित करने लगे और तब से आज भी कर रहे हैं। माँ छोटी उम्र में ही नर्मदा के किनारे आकर इस दुर्गम जंगल में आकर बस गयीं थीं और तबसे नर्मदा की ही बनकर रह गयीं – लोग अब उन्हें ही माँ नर्मदा के रूप में देखने लगे हैं। मीरा माँ का जन्म स्थान जबलपुर –  मंडला मार्ग में घुघवा  है।ऐसी जानकारी इनके शिष्य देते हैं।

         माँ की उम्र का असली ज्ञान नहीं पर उनका शरीर जीर्ण क्षीण हो रहा है। आँगन में ही अपने आसन  में  बेतरतीब साड़ी लपेटे बुदबुदाती रहती हैं।खुले या बंद आँखें कर  कोई दर्शन करती रहती हैं। खुश होती रहती हैं ! दुखी भी होती हैं। और कभी कभी ऊँचे स्वर में अपनी बात भी कहती मिलती हैं।

       _कहने को तो माँ  यहाँ शुरू से अकेली ही रह रही हैं पर अभी एक दो सेवक सेविकाएँ साथ है। उनकी इस मंडली में इनके अलावा जो माँ के सबसे प्रिय साथी हैं वे हैं आठ दस श्वान ( कुत्ते ) जो उन्हें हमेशा घेरे खड़े , बैठे , सोते रहते हैं। उन्हें माई के आसान पर भी बैठने और माई के शरीर से चिपकने और दुलार करने की पूरी छूट है।_

       माँ इन्हें अपने बच्चों जैसा लाड़ और प्यार करती हैं। भोजन , दूध   , फल , बिस्किट, नमकीन सब माँ अपने हाथों से खिलाती हैं। उनके भक्त कहते हैं वे माई के “भैरव “ स्वरूप हैं। आगंतुक भक्तगण इनके लिए स्वयं भी बिस्किट लाते हैं। माँ किसका चढ़ावा और किसकी भेंट और दक्षिणा स्वीकार करेंगी यह माँ को  कोई दैवीय शक्ति सुझाती है इसीलिए वे कई बार इसे स्वीकारने और अस्वीकारने से पूर्व आँखें बंद कर ध्यान भी लगाती हैं। सच्चा मन और सच्ची कमाई ही माँ को स्वीकार्य है। 

         _माई बहुत कम बोलती हैं।उनकी बोली गोंडी बोली के निकट है।  तब भी लोग अपने प्रश्न और शंका समाधान करते ही रहते हैं। कहीं माँ चुप रह जाती हैं। मन होता है तो कुछ कह देती हैं। कोई अनुकूल समाधान भी सुझा देती हैं। माई का थोड़ा भी इशारा मिल जाता है तो आगंतुक तृप्त भाव से लौट जाता है। कई लोगों को भगा भी देती हैं और कुछ को खरी और सच्ची बात कह देती हैं तो वे खुद ही वहाँ से ग़ायब हो जाते हैं।_

      अभी श्रावण माह में तो बहुत खांसी थी – अस्वस्थ थी। ढ़िंढोरी से आए एक समूह से वे तब भी ख़ूब बतियाती रहीं। समूह ने माई के निजी मंदिर में माँ नर्मदा की आरती की फिर माँ की आरती की , प्रसाद चढ़ाया , गाँव से भंडार के लिए लायी राशन सामग्री चढ़ायी। माँ गाँव के अनेक परिवारों और नर्मदा तट के वहाँ के साधुओं आदि के समाचार लेती रहीं जैसे वे वहाँ ही रहती आयी हों।

       _फिर बोली जाओ रसोई में प्रसादी बनाकर और पाकर जाना !एक दो प्रश्नों पर आशीर्वाद और समाधान दिया और एक दो की बात पर चुप बनी रहीं जैसे सुना ही नहीं हो। माँ का एक दो शब्दों का छोटा सा उत्तर भी इस सभी श्रद्धालुओं के लिए बड़े वरदान से कम नहीं था और वे ऐसे प्रसन्न लौट रहे थे मानो उनकी लाटरी लग गयी हो। आश्रम में नर्मदा जयंती , नवरात्रि , आदि उत्सव और कन्या भोज के अनेक कार्यक्रम उनके भक्त गण आयोजित करते रहते है।_

        माँ अन्नपूर्णा स्वरूपा यह रेवा माँ अपने यहाँ के भंडारे और भंडार से पूर्ण निर्लिप्त रहती हैं। उनके दिए और फलित आशीर्वाद की भक्तगण ही चुपचाप चर्चा करते हैं. मीरा माँ तो इन सबसे दूर रहकर पगली माँ ही बनी रहती हैं।

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