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योग के साथ सहिष्णुता का प्रशिक्षण*

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शशिकांत गुप्ते

योग को सयोंग के तराजू में तोल कर एक बाबा ने योग को तिज़ारत में तब्दील कर दिया।यह बाजरवाद का प्रत्यक्ष उदाहरण है। प्रायः बाजारवाद में सक्रियता सलग्न लोगों को लाला संबोधित किया जाता है।लेखक इस आलोचना में नही पड़ना चाहता है।
सामान्य तौर पर योग शारीरिक कसरत है।व्यायाम करने से शरीर स्वस्थ्य रहता है।
बाजारवादी मानसिकता ने योग के साथ विभिन्न दवाइयों का उत्पादन भी जरूरी कर दिया है? वैसे योग के साथ दवाइयों का सेवन करना पड़ता है या नहीं यह बहस का विषय है?
अपना देश धार्मिक आस्था का देश है।इसीलिए बाबा शब्द का उच्चारण आदर सूचक है।वैसे बाबा प्रपितामह को अर्थात पिताजी के दादाजी को संबोधित करतें हैं।मतलब पिताजी के पिताजी के भी पिताजी को बाबा कहतें हैं।
धार्मिक क्षेत्र में पवित्र रंग के वस्त्र धारण करने वाले को बाबा कहतें हैं।वर्तमान में बाबाओं की भरमार है।बाबा लोग भविष्यवाणी करने की भी क्षमता रखतें हैं।
योग की तिज़ारत करने वाले बाबा ने भी अनुमान लगया था कि देश में कालाधन समाप्त हो जाएगा?एक लीटर पेट्रोल दस दस रुपयों के मात्र तीन नोट खर्च करने पर प्राप्त होगा?
बाबा को जैसे ही अपने अनुमान का भान हुआ,बाबा ने अपनी गलती को सुधार दिया।यही तो प्रामाणिकता का प्रमाण है।
बाबा को एहसास हो गया कि, जिस तरह शरीर की ऊर्जा अन्न जल है। वैसे ही सरकार की ऊर्जा धन है।सरकार चलाने के लिए धन अनिवार्य है।
बाबा स्वयं तेल बेंचते हैं।तिल्ली से तेल कैसे निकाला जाता है, यह तेल उत्पादक ही जान सकता है।
पूर्व में तेल निकालने का घाना होता था।घाने को बैल चलाते थे।
यहाँ स्पष्ट समझना चाहिए कि, तेल का घाना बैल चलातें थे सांड नहीं?
बाबा ने सियासत में अर्थशास्त्र के महत्व को समझाते हुए महंगे ईंधन की वकालत की है।आमजन को बाबा की बात को गम्भीरता से समझते महंगाई को सहन करना चाहिए?
वर्तमान में एक एक रुपया सफेद है।बाबा के कथनानुसार कालाधन सफेद हो ही गया होगा।अब इंतजार है विदेशी बैको में जमा काला धन वापस लाने का?
यदि नहीं लाया गया तो बाबा पुनः अपने स्वविवेक से कोई सशक्त कारण बता ही देंगे।
बाबा ने नित्यपयोग की सारी उत्पादों का बाजार शुरू कर ही दिया है।हर एक वस्तु की शुध्दता पर संदेह करना मतलब सत्य को नकारने जैसा है।
बाबा के मधुर वचन की तरह बाबा के यहाँ की मधुमख्खियाँ भी शुद्ध शहद ही प्रदान करती है।
बाजारवाद के साथ शुद्धता और प्रामाणिकता जैसे शब्दों का प्रयोग विज्ञापनों में सिमट के रह गया है।

शशिकांत गुप्ते इंदौर

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