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कल पता चलेगा, महिलाओं को दस हजार रुपये का दांव चला या रोजगार का वायदा गेम चेंजर बना

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लाल बहादुर सिंह

तमाम गुमनाम एक्जिट पोल के माध्यम से एनडीए की जीत का माहौल बना दिया गया है। बिहार चुनाव में ऊंट किस करवट बैठेगा इसे लेकर अटकलबाजियों का बाजार गर्म है।

इस बात की आम चर्चा है कि ऊपर से आपसी तालमेल के बावजूद एनडीए के घटकों में अंदरूनी कलह चरम पर रही। नीतीश कुमार और उनका समर्थक आधार इस बात से बुरी तरह नाराज है कि भाजपा लोजपा आदि के साथ मिलकर उन्हें निपटाने और स्वयं अपना मुख्यमंत्री बनाने के मिशन पर काम कर रही है।

लोजपा को किस तरह पिछली बार नीतीश का कद कम करने के लिए इस्तेमाल किया गया इसे लोग भूले नहीं हैं। इसलिए नीतीश के कट्टर समर्थक आधार का एक हिस्से ने भाजपा और लोजपा को वोट न दिया हो तो आश्चर्य नहीं होगा। इसी तरह प्रतिक्रिया में और भाजपा की योजनानुसार भाजपा और लोजपा के एक हिस्से ने नीतीश को वोट न दिया हो तो अचरज नहीं होगा।

उत्तर प्रदेश की तरह बाबा साहब के बनाए संविधान की अवमानना के खिलाफ दलितों में भी व्यापक आक्रोश है। इसके अलावा अति पिछड़ों के लिए कांग्रेस ने भी बाकायदा वायदों का अलग घोषणापत्र जारी किया था। उधर टिकट बंटवारे में भी महागठबंधन ने अतिपिछड़ों को अच्छा प्रतिनिधित्व दिया है। इसलिए नीतीश का अति पिछड़ा वोट बैंक अब पहले जैसा एकमुश्त उनके साथ नहीं रहने वाला नहीं है। उसमें महागठबंधन की सेंध लगना तय है।

ठीक यही बात दलितों महादलितों के लिए भी सच है। जहां दलित पासवान समुदाय के लोगों का जेडीयू को वोट मिलना संदेह के दायरे में है। दूसरी ओर कांग्रेस ने एक महादलित को अपनी पार्टी का प्रदेश अध्यक्ष बना रखा है। संविधान और आरक्षण बचाने और बढ़ाने पर कांग्रेस का जो जोर है उसके फलस्वरूप इन मतों में भी महागठबंधन की घुसपैठ तय मानी जा रही है।

वैसे तो पिछड़े कुशवाहा समुदाय के स्वयंभू नेता उपेंद्र कुशवाहा एनडीए के साथ हैं लेकिन उनकी अपने समुदाय पर कोई खास पकड़ नहीं है। पिछले दिनों काराकाट में वे स्वयं लोकसभा चुनाव भाकपा माले के राजा राम सिंह से हार गए। भाजपा ने  कुशवाहा समुदाय को लुभाने के लिए सारी ताकत लगा रखी है। न सिर्फ सम्राट चौधरी को उपमुख्यमंत्री बनाए हुए है बल्कि रैलियों में अमित शाह उन्हें और बड़ा आदमी यानि परोक्ष रूप से मुख्यमंत्री बनाने का वायदा कर रहे हैं।

बहरहाल महागठबंधन ने भी तमाम कुशवाहा प्रत्याशियों को उम्मीदवार बनाकर एनडीए को जबरदस्त टक्कर दे रखी है अतिपिछड़े समुदाय के मुकेश साहनी को उपमुख्यमंत्री बनाने का वायदा करके नीतीश के अतिपिछड़े किले में भी महागठबंधन ने सेंधमारी कर दी है।

सामंतवाद विरोधी संघर्षों के माध्यम से महादलित मुसहर समुदाय तथा पिछड़े कुशवाहा समुदाय के बीच महागठबंधन के घटक भाकपा माले की पहले से मजबूत पकड़ रही है।

सर्वोपरि युवाओं के बीच महागठबंधन के पक्ष में जबरदस्त लहर है। रोजगार चुनाव का सबसे बड़ा मुद्दा बना है और तेजस्वी की उपमुख्यमंत्री के रूप में नौकरियां देने की साख है। इसलिए युवाओं को उम्मीद है कि अगर तेजस्वी की सरकार बनती है तो वे हर घर से एक आदमी को सरकारी नौकरी देने के वायदे को पूरा करेंगे।

इसके विपरीत एनडीए का इस मामले में रिकॉर्ड बेहद खराब है। न सिर्फ मोदी ने दो करोड़ रोजगार का वायदा करके धोखा दिया बल्कि उनके दाहिने हाथ अमित शाह ने इसे एक चुनावी जुमला करार दिया। नीतीश के 20 साल के राज में रोजगार सृजन का कोई प्रयास नहीं हुआ।

अमित शाह ने पिछले दिनों बयान दिया कि बिहार में जमीन ही नहीं है कि उद्योग धंधे खोले जा सकते! लगभग उसी समय खबर आई कि सरकार ने अडानी को एक रूपए प्रति एकड़ की दर से हजारों एकड़ जमीन दी है। नीतीश कहते ही रहे हैं कि नौकरियों के लिए पैसा कहां से आयेगा? अलबत्ता नौकरियों के लिए छात्र जब जब सड़क पर उतरे उन्हें पुलिस की लाठी गोली झेलनी पड़ी।

इन सब कारणों से बिहार के युवाओं ने रोजगार और नौकरी की बात करने वाले को वोट देने का मन बनाया था। इसमें युवाओं की विराट बहुसंख्या तो तेजस्वी और गठबंधन की सरकार चाहती है। लेकिन इन्हीं मुद्दों को उठाने के कारण कुछ युवा प्रशांत किशोर को भी पसंद कर रहे हैं। हालांकि उनमें से अधिकांश यह जानते हैं कि प्रशांत के पास कोई ठोस सामाजिक आधार नहीं है और वे सरकार नहीं बना सकते। इसलिए आशा की जानी चाहिए कि अंततः वे भी महागठबंधन के पक्ष में ही मतदान किए होंगे। इसलिए जातियों धर्मों के पार रोजगार के लिए युवाओं का मतदान इस चुनाव में महागठबंधन के लिए तुरुप का पत्ता साबित हो सकता है।

यह देखना सुखद है कि इस चुनाव में मोदी शाह योगी की लाख कोशिशों के बाद भी उनका सांप्रदायिक एजेंडा नहीं चला। घुसपैठियों के मुद्दे को उछालकर भाजपा ने सांप्रदायिक एजेंडा को हवा देने की कोशिश की लेकिन जब चुनाव आयोग ने एक तरह से कह दिया कि वहां कोई घुसपैठिए नहीं मिले तो भाजपा के साम्प्रदायिक अभियान की हवा निकल गई ।

कुल मिलाकर चुनाव रोजी रोटी और लोगों के जीवन के ठोस सवालों पर हुआ। युवाओं के अतिरिक्त जो दूसरा वोट बैंक मजबूती से उभरा है वह है महिला वोट बैंक। जहां नीतीश कुमार ने लंबे समय से कल्टीवेट किए गए अपने इस वोट बैंक को धार देने के लिए एकमुश्त दस हजार रु उनके खाते में डाल दिए। देश के इस गरीब प्रदेश में जाहिर है यह चुनावी घूस सर चढ़ कर बोल रही है। लेकिन एक तो यह सभी महिलाओं को नहीं मिला है और जिनको नहीं मिला है वे नीतीश के पक्ष में बहुत उत्साहित नहीं हैं।दूसरे, महिलाओं के लिए भी दस हजार रु की तुलना में उनके परिवार के लिए सरकारी नौकरी अधिक महत्वपूर्ण है।

उधर तेजस्वी ने भी सभी महिलाओं को तीस हजार सालाना देने और जीविका दीदियों को तीस हजार वेतन के साथ स्थाई सरकारी नौकरी देने का वायदा किया है। देखना होगा कि महिलाएं अंततः किस पैटर्न पर मतदान की हैं। तेजस्वी ने सभी संविदा कर्मियों को स्थाई करने तथा पुरानी पेंशन स्कीम लागू करने का भी ऐलान किया है। इसका भी गठबंधन को फायदा मिलना तय है।

दलित गरीब भूमिहीनों को शहर और गांव दोनों जगह आवासीय जमीन देने का वायदा भी महागठबंधन ने किया है इसके अलावा बंद्योपाध्याय आयोग की संस्तुतियां लागू करने का वचन दिया गया है,जाहिर है भूमिहीन मजदूरों और बंटाईदार किसानों पर इन मांगों का असर पड़ना तय है।

माइक्रो फाइनेंस कंपनियों की लूट पर रोक लगाने और उनका ऋण माफ करने का महागठबंधन ने वायदा किया है। अब विपक्ष को अपनी पूरी ताकत निष्पक्ष मतगणना पर लगानी होगी विशेषकर कम अंतर वाली सीटों पर। कहना न होगा कि यह चुनाव बिहार ही नहीं दिल्ली की केंद्र सरकार के भविष्य पर भी असर डाल सकता है।

(लेखक इलाहाबाद विश्वविद्यालय छात्रसंघ के पूर्व अध्यक्ष हैं।)

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