25जून 1975 से1977में कराए गए लोकसभा चुनावों के पहले तक तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी द्वारा घोषित आंतरिक आपातकाल के दौर को”लोकतंत्र की हत्या दिवस”नाम देकर इतिहास के उन काले दिनों को याद करने और कांग्रेस को लोकतंत्र की हत्या के गुनाहगार के रूप में प्रचारित करने वाली वर्तमान संघी भाजपाई हुकूमत और उनके चाटुकार अंधभक्तों में क्या इतनी हिम्मत है कि वे भाजपा के तत्कालीन जनसंघ संस्करण के शीर्ष नेता लालकृष्ण आडवाणी व अटलबिहारी बाजपेयी एवं आरएसएस के तत्कालीन सरसंघचालक श्री बाळासाहेब देवरस द्वारा उन काले दिनों में लोकतंत्र की हत्या करने वाली इंदिरा गांधी के सामने घुटने टेक देने के, या यूं कहें कि लोकतंत्र की हत्या के सामने घुटने टेक देने के अपराध के लिए ,अपने इन शीर्ष नेताओं की भी वैसी ही भर्त्सना कर सकें जैसी वे श्रीमती गांधी की भर्त्सना कर रहे हैं?
अपने इस लेख को मैं सिर्फ लालकृष्ण आडवाणी की’घुटने टेक’शर्मनाक भूमिका तक ही सीमित कर रहा हूँ।देवरसजी और बाजपेयीजी की ‘घुटने टेक’शर्मनाक भूमिका पर मैं अगले लेखों में लिखूंगा। –-विनोद कोचर】

याद कीजिये कि 1975-77के आपातकाल के भुक्तभोगी और वरिष्ठ भाजपा नेता श्री लालकृष्ण आडवाणी ने 2015में,आपातकाल की वापसी की संभावना जताकर जहाँ विपक्ष को मोदी सरकार पर हमला करने का एक नया हथियार दे दिया था,वहीँ ये कहकर उन्होंने लोकतंत्र के सिपाहियों को कुछ गंभीर किस्म की बहस के लिए भी ललकारा था कि:-
“1975-77के बाद ऐसा कुछ नहीं किया गया,जिससे यह आश्वासन मिले कि नागरिक अधिकारों को दोबारा निलंबित नहीं किया जायेगा या उनका दमन नहीं किया जायेगा”|
तब, वरिष्ठ पत्रकार और लेखक श्री कंचन गुप्ता को आडवाणी की ये आवाज़ महान समाजवादी नेता और चिंतक मधु लिमये की आवाज़ जैसी लग रही थी।
मेरी सबसे बड़ी पहली खुशनसीबी ये रही कि 1975-77में,मैं मधुजी के साथ करीब 14 महीनों तक नरसिंहगढ़(म.प्र.)की जेल में रहा था।
मेरी दूसरी खुशनसीबी ये भी रही कि गहन अध्ययन,चिंतन,मनन और कलम की ताकत के बल पर,जेल के भीतर से ही,मधुजी द्वारा,आपातकाल के विरुद्ध छेड़ी गई अहिंसक जंग में,मधुजी के निजी सहायक के रूप में,मैंने भी लोकतंत्र के यज्ञ में अपनी सेवाओं की यत्किंचित आहुति अर्पित की थी।
मुझे बड़े अफ़सोस के साथ,सप्रमाण,ये कहना पड़ रहा है कि,आपातकाल के भुक्तभोगी,अटलजी और आडवाणीजी जैसे जनसंघ(अब भाजपा)के आधारस्तंभों ने भी,काश! ,मधुजी के साथ कदम से कदम मिलाकर,
जेल में रहते हुए भी,आपातकाल के ख़िलाफ़ लड़ाई लड़ी होती!
ऐसा करने की बजाय,उस समय आडवाणीजी ने क्या किया,ये बताने के लिये मैं हिन्दुस्थान के नौजवान सपूतों को अपनी जेलडायरी में दिनांक 4अप्रैल 1976 को लिखी एक याद की याद दिलाना चाहता हूं जो इस तरह है:-
“मधुजी और शरदजी ने लोकसभा की सदस्यता से त्यागपत्र दे दिया है|
” उत्तरप्रदेश,बिहार और मध्यप्रदेश की जेलों से,और जेलों के बाहर से भी,वर्तमान परिस्थिति में इन दोनों संसद सदस्यों द्वारा उठाये गये इस कदम की सराहना में,बधाई के सन्देश लगातार आते जा रहे हैं|
“सभी दलों के कार्यकर्ताओं के मन में,इन स्तीफों के कारण कैसे विचार पैदा हो रहे हैं,इसकी एक साफ झलक,इन बधाई संदेशों में दिखाई दे रही है|
“एक जैसा विचार सभी दलों के कार्यकर्ताओं के मन में उठ रहा है|
” वो विचार है कि जब देश में लोकतंत्र का खातमा हो चुका है तो फिर प्रतिपक्ष को लोकतंत्र के नाटक में सहयोग देने की क्या जरुरत है?
“कितना अच्छा होता यदि समूचा प्रतिपक्ष18मार्च के बाद लोकसभा से स्तीफा देकर दुनिया को ये जतला देता कि श्रीमती गांधी के लोकतंत्र के नाटक के रंगमंच के रूप में जिस लोकसभा का इस्तेमाल किया जा रहा है,उसका वे बहिष्कार कर रहे हैं|
“अगर वे ऐसा करते तो देश के वातावरण में चेतना की लहर नहीं,एक तूफान उठ खड़ा होता|प्रतिपक्ष से प्यार करने वाली देश की जनता एक अंगड़ाई लेकर उठ खड़ी होती|
“लेकिन ये देश का बड़ा भारी दुर्भाग्य है कि मधुजी के सुझाये गये मार्ग पर चलने की बजाय प्रतिपक्ष के अन्य नेता इस नकली लोकसभा से जुड़े रहने में ही देश का भला(?) समझते हैं|
“कार्यकर्ताओं को उन नेताओं का रास्ता नहीं,मधुजी का रास्ता पसंद है-ये बात उनके पत्रों में अभिव्यक्त भावनाओं से साफ साफ जाहिर हो रही है|
“भोपाल नगर के एक जनसंघ कार्यकर्त्ता श्री शोभानी का पत्र तो और भी जादा क्रन्तिकारी पत्र है|
” मधुजी के द्वारा लोकसभा की सदस्यता से इस्तीफा दे देने के समाचार ने श्री शोभानी को कितना आल्हादित और कितना आंदोलित किया है,इसकी साफ साफ झलक श्री शोभानी के पत्र से मिलती है।
“श्री शोभानी भोपाल में17साल से वकालत कर रहे हैं| जनसंघ के कार्यकर्त्ता हैं|
मधुजी और शोभानी जी एक दूसरे से बिलकुल ही अपरिचित हैं| फिर भी श्री शोभानी ने मधुजी को लिखा कि उनका कदम,सही समय में सही दिशा में उठाया गया ऐतिहासिक कदम है|
“उन्हों ने तो यहां तक लिख डाला कि देश से लोकतंत्र का जनाजा उठ चुका है|अब लोकतंत्र में आस्था रखने वाले प्रतिपक्ष को सिर्फ लोकसभा ही नहीं, विधानसभाओं, नगरपालिकाओं,जनपद पंचायतों, ग्रामपंचायतों और सहकारी संस्थाओं जैसी सभी प्रातिनिधिक संस्थाओं से अपना सम्बन्ध तोड़ लेना चाहिये ताकि दुनिया ये जान जाये कि हिन्दुस्थान में श्रीमती गांधी ने लोकतंत्र की हत्या कर डाली है और लोकतंत्र की नक़ाब ओढ़कर सर्वाधिक शक्तिशाली तानाशाह के रूप में अपने पैर जमा लिये हैं|प्रतिपक्ष को अपनी कथनी से नहीं,करनी से,अपनी देशभक्ति का परिचय देना चाहिये|
“मैंने भी नरसिंहगढ़ जेल में,मधुजी के साथ रहते रहते ये महसूस किया है कि मधुजी में समय की नब्ज को पहचानने की अद्भुत क्षमता है|देश की राजनैतिक,आर्थिक और सामाजिक समस्याओं पर उनका अध्ययन और समस्याओं के विश्लेषण का उनका तरीका अचूक है।
“श्रीमती गांधी के देशव्यापी मायाजाल को छिन्नभिन्न करने के लिए देश को मधुजी के नेतृत्व में ही आगे बढ़ना होगा|
“यथास्थितिवादी,शुष्क और बेजान राजनीति करने वाले नेता न केवल अपनी छवि बिगाड़ रहे हैं,अपितु अपने दल और देश की छवि को भी,दुनिया की नजरों में बदरंग करते जा रहे हैं|
” राज्यसभा के चुनाव और वर्तमान परिस्थितियों में,प्रतिपक्ष की भूमिका ने भी कार्यकर्ताओं के मनोबल को चूर चूर कर डाला है|
“चाहिए तो ये था कि प्रतिपक्ष राज्यसभा के चुनावों में भाग लेने के पहले ये शर्त रखता कि आपातकालीन स्थिति समाप्त की जाये तथा राजनैतिक बंदियों को आज़ाद किया जाय|शर्त पूरी न होने की स्थिति में प्रतिपक्ष को राज्यसभा के चुनावों का बहिष्कार कर देना चाहिये था|
” प्रतिपक्ष का ये कदम देश में नये आत्मविश्वास को जगाता और विदेशों में प्रतिपक्ष की छवि को उजला करता|
“लेकिनप्रतिपक्ष ने क्या किया?
“प्रतिपक्ष ने बिना कोई शर्त रखे,श्रीमती गांधी के नाटक में नाटकीय भूमिका अदा की|
” जनसंघ के शीर्ष नेता श्री लालकृष्ण आडवाणी ने भी इस बदले हुए माहौल की नब्ज को टटोलने से इंकार कर दिया और स्वयं राज्यसभा के लिए गुजरात से प्रत्याशी बन बैठे|
नतीजा क्या निकला?
आडवाणी तो दल के अनुशासन का लाभ उठाकर राज्यसभा के निरुपयोगी सदस्य बन गये लेकिन दल की इस भूमिका ने संगठन में फूट के बीज बो डाले|
“दल के प्रमुख नेता और कार्यकर्त्ता,धीरे धीरे दल छोड़ते जा रहे हैं|जनसंघ के बिखराव की गति,राज्यसभा के चुनावों के बाद काफी तेज हो गई है|
“कोई विधायक स्वयं दल छोड़ रहा है तो किसी को दल ही,अनुशासन भंग करने का आरोप लगाकर,6साल के लिये दल से निकाल रहा है|दल ने जो अनुशासनहीनता दिखाई है,उसकी सजा उसे कौन देगा?
“दल का टूटना और बिखरना ही दल के लिये सबसे बड़ी सजा है|ऐसे नेताओं का नेतृत्व जो अपने ही दल को बिखरने से नहीं बचा सकता,भला श्रीमती गांधी के मायाजाल का मुकाबला कैसे कर सकता है?
“देश का प्रतिपक्ष ऐसे नेतृत्व के बिना अपंग हो गया है जो समय की नब्ज को पहचानकर,सही समय में,सही दिशा में,सही कदम उठाने की योग्यता रखता हो,उस योग्यता को अपने आचरण में झलकाता हो|ऐसे नेतृत्व के बिना प्रतिपक्ष का नैराश्य कभी दूर नहीं हो सकेगा” |
( डायरी दिनांक 4-6-76 समाप्त)
जयप्रकाश नारायण के आत्मबल,संकल्पशक्ति,और अपार लोकप्रियता के चलते,77के लोकसभा चुनावों के बाद जब जनतापार्टी की सरकार बनी तो आडवाणीजी केंद्रीय मंत्री भी बने|
बाद के सालों में वे गृहमंत्री और उप प्रधानमंत्री भी बने|
क्या उन्हें और उनके संघी भाजपाई अनुयायियों को इस गंभीर प्रश्न का उत्तर नहीं देना चाहिये कि ऐसे आला दर्जे के पदों पर पदासीन रहते हुए,खुद लालकृष्ण आडवाणी ने,1975-1977के बाद ऐसा कुछ क्यों नहीं किया जिससे यह आश्वासन मिलता कि नागरिक अधिकारों को दोबारा निलंबित नहीं किया जायेगा या उनका दमन नहीं किया जायेगा?
दुष्परिणाम सामने है:-
2014से अबतक जारी, केंद्र की संघी/भाजपाई हुकूमत ,भारत के लोकतांत्रिक संविधान को धता बताते हुए जिस घृणित तरीके से लोकतंत्र की हत्या कर रही है, असहमति की आवाजों को कुचलने के लिए कभी मॉब लिंचिंग के जरिये, कभी अर्बन नक्सली बताकर अन्याय और शोषण के विरोध में लेख आदि लिखने वालों पर झूठे मुकदमे दर्ज कराके उन्हें सालों साल जेलों में तड़पाकर, तो कभी ग़ैरकानूनी बुल्डोज़री न्याय के नाम पर उनके घरों को गिराकर उनके पूरे परिवार को बेघर करके या और किसी तरीके से लोकतंत्र की हत्या निरंतर किये जा रही है, उसे देखते हुए तो ऐसा लगता है कि श्रीमती इंदिरा गांधी को लोकतंत्र की हत्या का गुनाहगार बताने की बजाय इस बात के लिए उनका शुक्रगुजार होना चाहिए कि उन्होंने ही1977में निष्पक्ष और पारदर्शी चुनाव करके लोकतंत्र को पुनर्जीवित भी कर दिया था।
इतनी ही दुश्वार
अपने ऐब की पहचान है
जिस कदर करना मलामत
और की आसान है…..
--विनोद कोचर