शशिकांत गुप्ते
आज सीतारामजी सन 1969 में प्रदर्शित फ़िल्म विश्वास के गीत की ये पंक्तियाँ गया रहे थे।
गीत लिखा है गीतकार गुलशन बावरा ने
गीत का मुखड़ा है।
चांदी की दीवार न तोड़ी
प्यार भरा दिल तोड़ दिया
इस तरह तोड़फोड़ करने शग़ल धनवानों का ही होता है।
सीतारामजी गीत की ये पंक्तियाँ भी गा रहे थे।
वो क्या समझे प्यार को
जिनका सब कुछ चाँदी सोना हैं
धन वालों की इस दुनियाँ में
दिल तो एक खिलौना हैं
मैंने सीतारामजी से पूछा आज क्या हो गया,आपने इसी गीत को याद किया है
सीतारामजी ने कहा इनदिनों एक खबर अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा में है। लोगों के आशियानों में दरार पड़ गई है। लोग बेघरबार हो रहें हैं।
इस हादसे का कारण भौतिकवादी विकास ही तो है। सुविधाभोगी मानसिकता से ग्रस्त लोगों के द्वारा प्रकृति के साथ बेरहमी का वर्ताव किया गया।
प्रकृति ने अपना रँग दिखा दिया।
ये कहावत चरितार्थ हो गई कि,दीवारों के भी कान होतें हैं।
लोगों के आशियानों की छतों और दीवारों में दरार पड़ने का यही कारण रहा है,पर्वतों को चीरने के लिए,विशालकाय मशीनों का इस्तेमाल किया गया,उन मशीनों के द्वारा नेस्तनाबूद करने वाली आवाज से दीवारों के कान फट गए,और उनमें दरार पड़ गई।
आज हर क्षेत्र में दरार डालने की मानसिकता पनप रही है।
आर्थिक क्षेत्र में भी बहुत बड़ी दरार पड़ गई है। एक ओर औसत आदमी दर दर भटकने के लिए मजबूर है। दूसरी ओर बेतहाशा धन जमा हो रहा है।
महजबी दीवार में दरार डालने की भी साज़िश चल ही रही है।
एक ओर दीवारों में दरार पड़ रही है दूसरी ओर दीवार खड़ी कर विषमताओं की दरार को छिपाया जाता है।
इस संदर्भ में शायर दुष्यन्त कुमारजी इस शेर का स्मरण होता है।
अब किसी को भी नज़र आती नहीं कोई दरार
घर की हर दीवार पर चिपके है इतने इश्तहार
इनदिनों सारी उपलब्धियाँ इश्तहारों में कैद है।
दुष्यन्त कुमारजी का ये शेर भी मौजु है।
रोज़ अखबारों में पढ़कर यह ख्याल आया हमें,
इस तरफ आती तो हम भी देखते फसलें बहार
इश्तहारों की फसल छद्म दावों और दावों के उर्वरकों का कारण फलती फूलती है लेकिन यही वादें जब जुमले प्रजाति के कीट दीमक,सफेद मख्खी और टिड्डी आदि कीड़े समूची फसल को ही नष्ठ कर देतें हैं।
शशिकांत गुप्ते इंदौर

