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पारंपरिक उद्योग ‘झंडा’ वाली यूनियनों की वजह से बंद हुए हैं-ट्रेड यूनियनों पर सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी

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दिनकर कपूर

घरेलू कामगारों की न्यूनतम मजदूरी और एक व्यापक केंद्रीय कानून के अधिकार के लिए सुप्रीम कोर्ट में दाखिल याचिका पर सुनवाई करते हुए मुख्य न्यायाधीश जस्टिस सूर्यकांत ने कहा कि देश में कितने औद्योगिक संस्थान ट्रेड यूनियनों की वजह से बंद हो गए हैं, यह देखिए। पारंपरिक उद्योग – सब ‘झंडा’ वाली यूनियनों की वजह से बंद हुए हैं। ये काम नहीं करना चाहते। ट्रेड यूनियन के नेता देश के औद्योगिक विकास को रोकने के लिए काफी हद तक जिम्मेदार हैं। बार एंड बेंच की रिपोर्ट के अनुसार उन्होंने कहा कि न्यूनतम वेतन अनिवार्य न होने पर घरेलू कामगारों के समानता, भेदभाव-रहित व्यवहार और निष्पक्ष रोजगार के अधिकार (अनुच्छेद 14, 15 और 16) का उल्लंघन होता है, लेकिन जरूरत से ज्यादा सक्रिय ट्रेड यूनियनें अंततः इन कामगारों को ही असहाय स्थिति में छोड़ सकती हैं।

सच्चाई इसके विपरीत है अपने जीवन के एक उदाहरण से हम स्थिति को स्पष्ट करना चाहते हैं। इलाहाबाद विश्वविद्यालय से पढ़ाई के बाद ऑल इंडिया सेंट्रल काउंसिल आफ ट्रेड यूनियंस में हमने काम शुरू किया था। यह काम विशेष तौर पर टेक्सटाइल के मजदूरों के बीच में था। जिसमें दो महत्वपूर्ण क्षेत्र एक नेशनल टेक्सटाइल कॉरपोरेशन (एनटीसी) और दूसरा स्टेट टेक्सटाइल कॉरपोरेशन (एसटीसी) व कोआपरेटिव टेक्सटाइल, उत्तर प्रदेश में हमारा काम था।

इन उद्योगों को 90 के दशक में धीरूभाई अंबानी की कंपनी रिलांयस को मालामाल करने के लिए सरकार ने बंद कर दिया। बहुतेरे लोगों को जानकर यह आश्चर्य होगा कि कानपुर जहां बड़ी संख्या में सरकारी टेक्सटाइल मिलें थी और जिसे भारत का मैनचेस्टर कहा जाता था, वहां 12 साल तक मजदूरों को बिना मिल में एक भी उत्पादन किए सरकार ने बैठा कर तनख्वाह दी। उस आंदोलन का नेतृत्व करने के कारण कई वार्ताओं में प्रबंधनतंत्र ने हमसे कहा कि सरकार की मंशा इन फैक्ट्रियों को चलाने की नहीं है, इसलिए हम कुछ नहीं कर सकते।

दरअसल 1991 से शुरू की गई नई आर्थिक-औद्योगिक नीतियों को जिन्हें आज और भी परवान चढ़ाया जा रहा है। औद्योगिक पूंजीवाद से वित्तीय पूंजी के दौर में ले जाने की शुरुआत थी। इसमें सचेत रूप से सरकार ने तमाम सरकारी उद्योग धंधों को खुद बंद करने, बेचने और खत्म करने की नीति ली हुई है। ट्रेड यूनियनें तो दरअसल इन उद्योगों को बचाने के लिए संघर्ष कर रही है। क्योंकि अगर उद्योग ही नहीं रहेगा तो मजदूर का अस्तित्व कहां रह पाएगा। इसलिए मुख्य न्यायाधीश की टिप्पणी सत्यता से परे है।

जहां तक संवैधानिक मानदंडों की बात है तो भारत के संविधान की प्रस्तावना में यह कहा गया है कि देश के हर नागरिक को सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक न्याय की गारंटी की जाएगी। मूल अधिकार से लेकर नीति निर्देशक तत्व इसे सुनिश्चित करते हैं। संविधान का अनुच्छेद 19 (1)(ग) हर नागरिक को संगठन बनाने का अधिकार देता है। इसी अनुच्छेद में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का प्रावधान किया गया है। अनुच्छेद 21 में सम्मानजनक जीवन सरकार से प्राप्त करना हर नागरिक का अधिकार है। सम्मानजनक जीवन तभी सुनिश्चित होगा जब किसी व्यक्ति को सम्मानजनक मजदूरी और सामाजिक सुरक्षा का प्रावधान सरकार द्वारा किया जाएगा।

नीति निर्देशक तत्वों के अनुच्छेद 38, 39, 41, 42 और 43 इस बात को सुनिश्चित करते हैं कि राज्य लोक कल्याणकारी राज्य के बतौर सामाजिक व्यवस्था का निर्माण करेगा। राज्य में असमानता को खत्म काम करने का प्रयास करेगा। पुरुष और स्त्री सभी नागरिकों को समान रूप से जीविका के पर्याप्त साधन उपलब्ध कराएगा। समान वेतन होगा, पूंजी का संकेंद्रण नहीं होगा, वृद्धा अवस्था में पेंशन पाने का अधिकार, जीवन निर्वाह मजदूरी, शिष्ट जीवन स्तर, अवकाश का संपूर्ण उपयोग, काम की दशाएं, सामाजिक सांस्कृतिक अवसर प्राप्त होगा। वही संविधान के आर्टिकल 14 में समानता के अधिकार को सुनिश्चित किया गया है। सुप्रीम कोर्ट का यह जो निर्णय है यह पूरे तौर पर संवैधानिक व्यवस्था का निषेध करता है।

यह भी गौरतलब है कि अंतर्राष्ट्रीय मजदूर ऑर्गनाइजेशन के कन्वेंशन नंबर 189 वर्ष 2011 में घरेलू कामगारों के चैप्टर पर जिसमें भारत सरकार ने भी हस्ताक्षर किया था कहा गया है कि घरेलू कामगारों को न्यूनतम मजदूरी सुनिश्चित करने, उनकी सामाजिक सुरक्षा सुनिश्चित करने, उनके जीवन स्तर को बेहतर करने के संबंध में कानून का निर्माण किया जाएगा। इसके विरुद्ध निर्णय देना अंतर्राष्ट्रीय कानूनी वायदों के भी अनुरूप नहीं है। यह भी महत्वपूर्ण है कि महाराष्ट्र जैसे राज्य में घरेलू कामगारों के लिए पहले से ही कानून बने हुए हैं। जो वहां घर-घर में विवाद के कारण नहीं बने है, जैसा कि मुख्य न्यायाधीश जी बता रहें है।

आज के दौर में जब लेबर कोड लाकर पुराने सारे मजदूर हितैषी कानूनों को सरकार ने खत्म कर दिया है। ऐसे में 2008 के असंगठित मजदूरों के सामाजिक सुरक्षा के कानून को उल्लेखित करना भी उचित नहीं है। सच्चाई यह है कि सामाजिक सुरक्षा के इस कानून में केंद्र और राज्य सरकारों के ऊपर सामाजिक सुरक्षा का जो दायित्व डाला गया था, उसे भी पूरा नहीं किया गया। जिसमें मजदूरों को वृद्धावस्था पेंशन, उनके मुफ्त इलाज की व्यवस्था, उनकी मृत्यु का बीमा, आवास की सुविधा देना, उनके बच्चों के शिक्षा आदि के अधिकार शामिल है। जबकि इसके क्रियान्वयन के लिए खुद सुप्रीम कोर्ट ही बार-बार आदेश दे रहा है।

वास्तव में लेबर कोड़ों ने जो न्यूनतम सामाजिक सुरक्षा असंगठित क्षेत्र के मजदूरों को उपलब्ध थी उसे भी खत्म कर दिया है। इन लेबर कोडों में तीन महत्वपूर्ण बातें जो मजदूरों के जीवन में सर्वाधिक प्रभाव डालेंगी पहला काम के घंटे को 12 कर दिया गया जो 200 वर्षों के संघर्ष से काम के घंटे 8 के अधिकार को खत्म करता है। दूसरा अभी तक पति-पत्नी और दो बच्चों के किसी तरह से जीवन निर्वाह के लिए जो न्यूनतम मजदूरी दर तय की गई थी, उसे भी इन लेबर कोड में समाप्त करके एक नया प्रावधान फ्लोर लेवल वेज लाया गया है, जो न्यूनतम मजदूरी दर से भी कम है।

पिछले 20 वर्षों से परमानेंट काम के स्वरूप को खत्म करके मजदूरों की मजबूरी का फायदा उठाते हुए ठेकेदारी प्रथा राष्ट्रपति भवन से लेकर निचले स्तर तक लागू की गई थी। जिसमें परमानेंट काम की तुलना में बेहद कम मजदूरी पर काम कराया जाता था। लेकिन इसमें भी मजदूरों की सामाजिक सुरक्षा के लिए ईपीएफ, ईएसआई जैसे प्रावधान मौजूद थे और कार्य स्थल पर सुविधा जैसी कुछ सुविधाएं भी दी गई थी। नए लेबर कोड में फिक्स टर्म इम्पाल्वायमेंट लाकर इस ठेकेदारी प्रथा से भी बुरी हालत में काम कराया जायेगा, जहां कोई भी सामाजिक सुरक्षा नहीं होगी।

कुल मिलाकर कहा जाए तो  मुख्य न्यायाधीश ने ट्रेड यूनियनों पर जो टिप्पणी की है वह अस्वीकार्य है और संविधान में दिए अधिकारों  के अनुरूप नही है। जरूरत तो इस बात की थी कि मजदूरों की आवाज और पीड़ा पर न्यायपालिका संवेदनशील होकर सुनवाई करती। लेकिन अब सुप्रीम कोर्ट के इस निर्णय के बाद मजदूरों को और उत्पीड़न झेलना होगा और मजदूरों की न्यायपालिका पर विश्वास में कमी आयेगी। जो लोकतंत्र के लिए शुभ नही है। बहरहाल 12 फरवरी को पूरे देश के मजदूर राष्ट्रीय हड़ताल में जा रहे हैं और उम्मीद है कि यह हड़ताल सफल होगी और एक राजनीतिक संदेश देगी।

(दिनकर कपूर ट्रेड यूनियन नेता हैं।)

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