मुनेश त्यागी
पश्चिमी बंगाल के पंचायत चुनावों को लेकर पूरे देश की जनता में कोतुहल मचा हुआ है। चुनाव को लेकर हालात इतने खराब हैं कि पश्चिमी बंगाल में मतदाताओं और उम्मीदवारों को चुनाव लड़ने से और वोट डालने से डराया धमकाया जा रहा है, उनके साथ हिंसा ही की जा रही है, उन्हें नामांकन करने से रोका जा रहा है और सरकार और चुनाव आयोग द्वारा मतदान केंद्रों पर स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव कराने के लिए केंद्रीय बलों की तैनाती का जमकर विरोध किया जा रहा है। इन दोनों का रुख बता रहा है कि चुनावी हिंसा का रोका जाना उनकी प्राथमिकता में नहीं है।
मामला इतना बढ़ गया है कि इस हिंसा और अशांति के माहौल में स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव कराने की मांग को लेकर, विपक्षी दल पहले उच्च न्यायालय गए। उच्च न्यायालय ने चुनाव आयोग को आदेश दिया कि वह सभी मतदान केंद्रों पर केंद्रीय सुरक्षा बल तैनात करें। हाई कोर्ट के इस फैसले से तृणमूल कांग्रेस और राज्य चुनाव आयोग इस कदर खौफजदा हो गए और इस कदर नाराज हुए कि वे दोनों सुप्रीम कोर्ट पहुंच गए और वहां पर प्रार्थना पत्र दिया कि स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव कराने के लिए, हर मतदान केंद्र पर केंद्रीय सुरक्षा बल तैनात करने के हाईकोर्ट के आदेश को, वापस लिया जाए।
इस मामले की सुनवाई के दौरान सर्वोच्च न्यायालय में बहाने बनाये गये कि सरकार के पास पैसा नहीं है और वित्तीय स्थिति अच्छी नहीं है। यहां पर सबसे ज्यादा आश्चर्यचकित करने वाली बात यह है कि आखिर राज्य सरकार और राज्य चुनाव आयोग स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव कराने की विपक्ष की मांग को क्यों दरकिनार कर रहे हैं? वह उच्च न्यायालय के स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव कराने के आदेश को क्यों मानने को तैयार नहीं है? इसका क्यों विरोध कर रहे हैं?
इसका जवाब देते हुए सर्वोच्च न्यायालय ने अपने आदेश में कहा है कि कलकत्ता उच्च न्यायालय का आदेश सही है और वहां पर स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव कराने के लिए हर मतदान केंद्र पर केंद्रीय सुरक्षा बलों की तैनाती का आदेश बिल्कुल सही है। सर्वोच्च न्यायालय ने सख्त टिप्पणी करते हुए कहां है कि आप इस आदेश से व्यथित क्यों है? आपके पास राज्यबल हो या केंद्रीय बल हो, आपको इससे कोई चिंता नहीं करनी चाहिए।
सर्वोच्च न्यायालय ने कहा है कि स्वतंत्र व निष्पक्ष चुनाव लोकतंत्र की मूल पहचान है। राज्य के सभी जिलों में न सिर्फ संवेदनशील बूथों पर बल्कि सभी बूतों पर केंद्रीय बलों की तैनाती सुनिश्चित होनी चाहिए और सर्वोच्च न्यायालय ने मामले की सुनवाई के दौरान तल्ख टिप्पणी करते हुए कहा कि चुनाव कराना हिंसा कराने का लाइसेंस नहीं हो सकता। यदि उम्मीदवार नामांकन दाखिल करने में असमर्थ हैं, या वे नामांकन दाखिल करने जाते हैं और विवाद के कारण ऐसा नहीं कर पाते तो यह भी बड़ी चुनौती है। ऐसे में स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव कहां रह जाता है?
यहीं पर मुख्य सवाल है कि आखिर पश्चिमी बंगाल के मुख्य विपक्षी दलों बीजेपी, कांग्रेस और वामपंथी मोर्चे को आखिर क्या अंदेशा है कि वहां पर इस सरकार के रहते और राज्य पुलिस बलों के सहारे स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव नहीं कराए जा सकते? उनकी इस बात में दम है कि राज्य सरकार, चुनाव आयोग और पुलिस बल तीनों संवैधानिक प्रक्रियाओं के अनुसार इमानदारी से काम नहीं कर रहे हैं और विपक्षी दलों की स्वतंत्र व निष्पक्ष चुनाव करवाने की मांग की अनदेखी कर रहे हैं और उसे किसी भी प्रकार डाल देना चाहते हैं।
पश्चिमी बंगाल के चुनाव में हिंसा और आतंक का माहौल यह है कि 2018 के पिछले पंचायत चुनाव में भी पश्चिमी बंगाल में भारी हिंसा हुई थी जिसमें 20 से ज्यादा लोग मारे गए थे। हिंसा के जरिए विपक्षी पार्टियों के उम्मीदवारों को आतंकित करने का ही नतीजा था कि पिछले चुनाव में तृणमूल कांग्रेस ने 90 फीसदी सीटों पर कब्जा कर लिया था जिनमें से 34 फ़ीसदी सीटों पर उसने निर्विरोध जीत हासिल की थी।
इसी हकीकत के मद्देनजर पश्चिमी बंगाल की तीनों विपक्षी पार्टियां, उच्च न्यायालय की शरण में गई और वहां पर जाकर स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव कराने के लिए, हर मतदाता केंद्र पर केंद्रीय सुरक्षाबलों की तैनाती की मांग की। हाईकोर्ट ने उनकी बातों पर गौर से सुनवाई की और उनकी बातों पर पूरा विश्वास किया और राज्य में केंद्रीय सुरक्षा बलों की तैनाती का आदेश दे दिया।
यहां पर यही सवाल उठता है कि आखिर ममता बनर्जी की सरकार क्या चाहती है? वह मतदान केंद्रों पर केंद्रीय सुरक्षाबलों की तैनाती से क्यों नाराज और खौफजदा है? इसका एक ही कारण है कि अगर वहां पर केंद्रीय सुरक्षाबलों की तैनाती हो जाएगी, तो वह चुनाव में मनमानी और बेईमानी नहीं कर पाएगी, मतदाताओं को और उम्मीदवारों को डरा और धमका नहीं पाएगी और इस प्रकार वह फिर से सत्ता में बने रहने के अपने मंसूबों में कामयाब नहीं हो पाएगी और वह 2018 के चुनावों के एकतरफा परफॉर्मेंस को नहीं दोहरा पाएगी।
उसको पूरा डर सता रहा है कि केंद्रीय सुरक्षा बल तैनात होने पर, वह मतदाताओं को स्वतंत्र और निष्पक्ष तरीके से वोट डालने से नहीं रोक पाएगी और मतदाता उसकी इच्छा के खिलाफ विपक्षी पार्टियों को वोट देंगे, जिससे वह सत्ता से बाहर हो जाएगी। इसी के साथ साथ इस बार पश्चिमी बंगाल में कांग्रेस और लेफ्ट पार्टियों का गठबंधन कायम हो गया है जिसमें जनता एकजुट होकर इस गठबंधन का समर्थन कर रही है। इसके अतिरिक्त बंगाल की जनता तृणमूल कांग्रेस के भ्रष्टाचार से भी तंग आ चुकी है और उसने उसके खिलाफ जाने का मन बना लिया है। इस कारण भी ममता बनर्जी को लग रहा है कि वह इस बार सत्ता से बाहर हो जाएगी।
उपरोक्त घटनाक्रम को देखकर यह लगभग साबित हो रहा है कि तृणमूल कांग्रेस पश्चिमी बंगाल में स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव नहीं होने देना चाहती। वह अपनी मनमानीपूर्ण हरकतों, भ्रष्टाचार, आतंक और हिंसा एवं गैर-संवैधानिक तौर तरीकों को बरकरार रखना चाहती है ताकि वह किसी भी प्रकार सत्ता में बनी रहे। येन-केन प्रकारेण किसी भी हालत में सत्ता में बने रहने की त्रिणमूल कांग्रेस की प्रवृत्ति, भारतीय समाज के जनतांत्रिक मूल्यों और संवैधानिक मूल्यों के खिलाफ है, जिसे किसी भी दशा में बर्दाश्त और स्वीकार नहीं किया जा सकता।

