डॉ. नेहा
तृप्ति यानी इच्छा पूरी होने से प्राप्त शान्ति और आनन्द। तृप्त अर्थात अघाया हुआ जिसकी इच्छा पूरी हो गई है।
तृप्त= तृप पीड़ने + क्त:।
तृप्ति = तृप पीड़ने + क्तिन्
शुद्धान्तसम्भोग नितान्त तुष्टे न नैषधेकार्यमिदम् निगाद्यम्।
सम् + भोग, अर्थात् सम् भोग के द्वारा जो नितान्त तुष्टि दे,पुनः उस भोग की इच्छा न हो। वह तृप्त है।
अपां हि तृप्ताय न वारिधारा.
इस हेतु गीता 2/46 का श्लोक है-
यावानर्थ उदपाने सर्वतः सम्प्लुतोदके।
अर्थरूप जल से उतना ही प्रयोजन होता है जितने से स्नान और प्यास की पूर्णता हो जाय। वैसे तो कूप तालाब, नदी, आदि में बहुत सा जल है, अथवा जल राशि में से उतने ही जल से प्रयोजन होता है जितने से स्नान पान की समस्या पूर्ण हो जाती हो, पूरे जल से नही।
वैसे ही जल से तृप्त होती है जलधारा से नही।
तृपपीड़ने + भावे क्तिन् = तर्पणम्,
“भक्षणादिनाकाङ्क्षानिवृत्ति:”
तर्पण अथवा तृप्ति वह है जो भक्षण आदि के पश्चात् भक्षणादि की निवृत्ति हो जाय।
इस हेतु महर्षि “ऋभु” और उनके शिष्य “निदाघ” का थोड़ा सा आख्यान प्रस्तुत है :
महर्षि ऋभु अपने शिष्य निदाघ के घर पधारे। अतिथि प्रथमोपचार के पश्चात् निदाघ ने भोजन हेतु निवेदन किया, तब महर्षि ने निदाघ से हलुआ, खीर और मट्ठे से बने व्यञ्जन के भोजन हेतु कहा।
निदाघ ने सब बनवाकर महर्षि को भोजन के लिए दिया। भोजनोपरान्त निदाघ ने ऋषिवर से पूछा :
अपि ते परमा तृप्तिरूत्पन्ना तुष्टिरेव च।
अपि ते मानसं स्वस्थमाहारेण कृतं द्विज।।
हे द्विज ! कहिये भोजन करके आपका मन और चित्त स्वस्थ हो गया न?
आप पूर्णतयः तृप्त और सन्तुष्ट हो गए न?
निदाघ के इस प्रश्न पर महर्षि ऋभु ने बड़ा विचित्र उत्तर दिया; महर्षि ऋभु ने कहा :
क्षुद्यस्य तस्य भुक्तेsन्ने तृप्तिर्ब्राह्मण जायते।
न में क्षुन्नाभवत्तृप्ति: कस्मान्मां परिपृच्छसि।।
हे ब्राह्मण, जिसे क्षुधा होती है उसी की तृप्ति भी होती है।
न तो मुझे क्षुधा थी और न तृप्ति। फिर तुम यह क्षुधा और तृप्ति के बारे में मुझसे क्यों पूँछ रहे हो?
वह्निना पार्थिवे धातौ क्षपिते क्षुत्समुद्भव:।
भवत्यम्भसि च क्षीणे नृणां तृडपि जायते।।
देह के पार्थिव परमाणुओं का जठराग्नि के द्वारा क्षय हो जाने पर पार्थिव धातुओं की आवश्यकता देह को होती है, धातुओं की क्षीणता पर धातुओं की पूर्ति हेतु देह को क्षुधा उत्पन्न होती है। उसी प्रकार प्रदीप्त जठराग्नि के द्वारा जल की क्षीणता पर जल की आर्द्रता की कमी होने पर जल की भी आवश्यकता देह को ही होती है।
क्षुत्तृष्णे देह धर्माख्ये न ममैते यतो द्विज।
ततः क्षुत्सम्भवाभावात्तृप्तिरस्त्येव मे सदा।।
यह क्षुधा और तृष्णा देह का धर्म है। हे द्विज भूख प्यास मेरा धर्म नही। न मैं क्षुधित पिपासु था और न तृप्त ।मैं तो सदैव सर्वदा तृप्त ही हूँ।
मनसः स्वस्थता तुष्टिश्चित्तधर्माविमौ द्विज।
चेतसो यस्य तत्पृच्छ पुमानेभिर्न युज्यते।।
हे द्विज! स्वस्थ्यता और तुष्टि मन से मन ही में होते हैं। अतः ये क्षुधा तृप्ति आदि धर्म (धारण की प्रतीति) मन के ही धर्म हैं। पुमान् अर्थात् पुरुष रूप आत्मा से इनका कोई सम्बन्ध नही है।
इस लिए हे द्विज, क्षुधा पिपासा तृप्ति आदि जिसके धर्म हैं, उसी से इस तृप्ति के बारे में पूछो।
जब तक देहभाव के बन्धनों से जकड़ा हुआ है तभी तक सम् + भोग के सम्बन्ध से तृप्ति अतृप्ति का भाव है। तृप्ति का आत्मा से कोई सम्बन्ध नही है।
देह के धर्म से आत्मा अछूती है, निर्लिप्त है। इस लिए आत्मा न तो कभी अतृप्त थी और न भोगों से कभी आत्मा तृप्त ही होती है।
आत्मा का स्थूल से कोई सम्बन्ध नही है। स्थूल ही आत्मा से सम्बन्ध बनाकर समस्त आरोप आत्मा पर मढ़ता है. यही अज्ञानता है। (चेतना विकास मिशन).

