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*अनुपयुक्त और अवाँछनीय है कामचोरी*

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     ~ राजेंद्र शुक्ला

       श्रम का उचित मूल्य मिले, इसके लिए आग्रह करने के कितने ही तरीके हैं। उन्हें व्यवधान उत्पन्न होने पर काम में लाया जा सकता है, किन्तु यह अवाँछनीय है कि कम वेतन की तुलना में एक दूसरी अनुपयुक्तता कामचोरी की चल पड़े। इसमें तो सबका सब प्रकार से अहित ही है।

       काम करने की शक्ति घट जाने की तरह मेहनत न करने, उससे जी चुराने, किसी बहाने टालमटोल करते रहने से व्यक्ति की अपनी सामर्थ्य घटती है, उपयोगिता कम होती है।

      फलत: मूल्यांँकन भी कम होता है। ऐसी दशा में पदोन्नति के अवसर भी घटते हैं और अपने आपको पिछड़ी स्थिति में पड़े रहने का अभिशाप सहना पड़ता है।

       स्मरण रखने योग्य तथ्य यह है कि राष्ट्रीय सम्पदा बढ़नी चाहिए। उसी आधार पर अधिक टैक्स वसूल होने और अधिक वेतन मिलने का उपक्रम बनता है।

      राष्ट्रीय सम्पदा की अभिवृद्धि का प्रमुख आधार कठोर परिश्रम ही है। यदि इसमें तनिक भी कटौती होती, तो न केवल देश आर्थिक दृष्टि से दरिद्र बना रहेगा वरन् अन्य क्षेत्रों में भी पिछड़ेपन का कुहासा सघन होगा।

       जब-तब अपने देश में चलने वाली कामचोरी के आंँकड़े सामने आते हैं, तो चौकना पड़ता है और सोचना पड़ता है, कि यदि यह कुप्रचलन हमारे स्वभाव का अंँग बना, तो उसके कारण प्रगति पथ में कितना बड़ा अवरोध आ सकता है। 

       समय की चोरी में देरी से कार्यालय आना, समय से पूर्व कार्यालय छोड़ देना, कार्यकाल में व्यक्तिगत टेलीफोन करना, व्यक्तिगत चिट्ठियांँ लिखना, चाय-पान में अधिक समय लगाना, कार्यालय क्षेत्र में समाचार पत्र आदि पढ़ना, अकारण बीमारी का अवकाश लेना अथवा बिना छुट्टी लिए अनुपस्थित रहना आदि सम्मिलित हैं।

       देश की प्रगति हेतु इन आदतों से छूटने और छुड़ाने के लिए व्यापक प्रयत्न होने चाहिए।

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