~कृष्ण कांत त्रिपाठी
बसपा शीर्ष पार्टी से आठवें नंबर की पार्टी बन गई,तमाम छोटे दल भाजपा का साथ पाकर तीसरे चौथे पांचवें नंबर पर पहुंच गए,जो कांग्रेस चौथी बड़ी पार्टी होती थी आज दो सीटों पर सिमट गई।ये सब ऐसे आंकड़े हैं जिन्हें ध्यान से देखने पर पाएंगे की वर्षों पुरानी राजनीतिक परंपराएं टूट चुकी हैं। अब पहले के जैसे चुनाव नहीं होते हैं।भाजपा ने दो सीटों से 350 का आंकड़ा छुआ था तो उस वक्त लोगों ने एक स्वर में कहा था कि ये बस एंटी इनकंबेंसी का प्रभाव है असल में सबके वोटर्स सुरक्षित हैं।लेकिन वास्तव में उसके बाद से प्रत्येक चुनाव में सभी पार्टियों के कुछ न कुछ वोटर्स बीजेपी की ओर शिफ्ट होते चले गए हैं।
कल के आए चुनाव परिणाम को देखकर विश्लेषण करें तो पता चलता है कि अधिकांश ब्राह्मण और राजपूत भाजपा को वोट किए हैं।जबकि यूपी के एक बहुत बड़ा ब्राह्मण वोट बसपा का रिजर्व था।वहीं मुस्लिम वोट की बात करें तो कुछ समय तक ये कांग्रेस के वोटर्स रहे फिर बसपा के साथ शिफ्ट हुए लेकिन इस बार बहुत हद तक सपा के साथ रहे हैं।जबकि यादव वोट शुरू से सपा के साथ रहे हैं और इस बार भी बंटे नहीं हैं।यही कारण है कि पिछले चुनाव के तुलना में समाजवादी पार्टी इस बार कुछ बेहतर प्रदर्शन कर पाई है।लेकिन केवल मुस्लिम और यादव का समीकरण आपको बहुमत नहीं दिला सकते हैं,यह बात समाजवादी पार्टी जितना जल्दी समझ जायेगी,उतना हीं बेहतर रहेगा।जो ओबीसी वोटर्स थोड़ा थोड़ा सबके साथ हो लेते थे, अब एक साथ भाजपा की ओर जा रहे हैं,जबकि एससी और एसटी वोटर्स भी धीरे धीरे भाजपा की ओर जा चुके हैं जबकि बसपा के ये कोर वोटर्स थे।ऐसे में भाजपा का बार बार जीतना कहीं भी अतिशयोक्ति नहीं है।।
यदि समीकरण यही बना रहा और जनता का भाजपा से मोहभंग नहीं हुआ तो अगले कई चुनावों तक परिणाम में कुछ खास बदलाव नहीं होने वाला है और बसपा का इस प्रकार से मैदान से किनारे हो जाना भाजपा के राह को और आसान कर देगा।बसपा के जितने भी इस चुनाव में वोटर्स थे कहीं न कहीं सबका दूसरा विकल्प भाजपा हीं था,तो यह बात अन्य पार्टियों को समझना होगा कि आपको भाजपा से लड़ने के लिए कहीं न कहीं भाजपा के जैसा बनना पड़ेगा और एक दो जातियों के वोट पाने का मोह छोड़कर सभी वोटर्स के मन को लुभाना होगा,तभी भविष्य में भी कुछ बदलाव हो सकता है अन्यथा आप ईवीएम का विलाप करते हुए विपक्ष की शोभा बढ़ाते रहेंगे।।
~कृष्ण कांत त्रिपाठी

