सनत जैन
अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप अपने ही बिछाए हुए जाल में फंसते हुए नजर आ रहे हैं। नामालूम भारत और भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ, वह कौन सी दुश्मनी निकाल रहे हैं। जिसमें वह खुद और अमेरिका को फंसाते जा रहे हैं। अमेरिका के एच-1बी वीजा को लेकर उन्होंने भारत और अमेरिका में रह रहे प्रवासी भारतीयों के ऊपर जो दबाव बनाने का प्रयास किया था।
वह दबाव तो बन नहीं पाया, उल्टे चीन को उन्होंने एक ऐसा मौका दे दिया है। वह भी ऐसे समय पर, जब अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप अपनी कार्य प्रणाली के कारण अमेरिका और दुनिया के कई देशों में सबसे ज्यादा अलोकप्रिय हो चुके हैं। चीन आईटी सेक्टर में हार्डवेयर, संचार माध्यम तथा एआई में अमेरिका को तगड़ी चुनौती दे रहा था। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के क्षेत्र में चीन ने दबदबा बनाना शुरू कर दिया है। कई मायने में चीन, अमेरिका से कई गुना आगे दौड़ रहा है। पिछले एक दशक में चीन ने रिसर्च के मामले में दुनिया के सभी देशों को पीछे छोड़ दिया है। चीन के साथ अब भाषा से संबंधित दिक्कत भी नहीं रही। ऐसी स्थिति में चीन ने के वीजा के रूप में जो गुगली फेंकी है उसमें उसने कहा है, जो भी प्रोफेशनल, आईटी सेक्टर से जुड़े हुए विशेषज्ञ, मेडिकल प्रोफेशनल के जुड़े हुए विशेषज्ञ यदि चीन आते हैं तो उन्हें के वीजा उनकी शर्तों और सम्मान के साथ दिया जाएगा।
चीन इसके लिए फ्री एंट्री देगा। कोई शुल्क नहीं लेगा। चीन का यह ऑफर अमेरिका के लिए एक बड़ा झटका साबित हो सकता है। चीन ने पिछले दो दशकों में साबित कर दिया है, उसे व्यापार करना आता है। वह राजनीति और कूटनीति भी अपने व्यापार के लिए करता है। पिछले दो दशक में चीन ने सारी दुनिया में अपना लोहा मनवाया है। इससे इनकार नहीं किया जा सकता है। चीन में विशेषज्ञों की कमी है। अमेरिका ने एच-1बी वीजा देना एक तरह से बंद कर दिया था। पुराने एच-1बी वीजा धारकों के ऊपर वेतन से ज्यादा शुल्क का प्रावधान कर भारतीय पेशेवरों को डरा दिया है। भारतीयों को अमेरिका ने बेड़ियों और हथकड़ी में भारत वापिस भेजा था।
टेरिफ शुल्क 50 फीसदी कर दिया। अब वीजा शुल्क 1 हजार डॉलर से बढ़ाकर 1 लाख डॉलर कर दिया। इससे भारतीय प्रवासी अमेरिका में स्वयं के और परिवार के भविष्य को लेकर भयाक्रांत हैं। अमेरिका ने पिछले कई महीनो में लगभग सभी देशों के साथ टैरिफ को लेकर जो दूरियां बनाई हैं। डोनाल्ड ट्रंप अपने परिवार के कारोबार को बढ़ाने के लिए अमेरिका की अस्मिता को ही दांव पर लगा रहे हैं। ऐसी स्थिति में चीन ने के वीजा का जो ऑफर दिया है। उससे दुनिया के सभी देशों के विशेष रूप से भारतीय मूल के आईटी, फार्मा सेक्टर के लोग चीन में अपना भविष्य देखने लगे हैं।
चीन जिस तरह से तकनीकी और रिसर्च के मामले में आगे बढ़ रहा है। चीन जिस तरह से विशेषज्ञों को रिसर्च के लिए प्रोत्साहित कर रहा है। उसको देखते हुए आईटी, संचार माध्यम और फार्मा के क्षेत्र मे प्रोफेशनल चीन का रूख करें, तो कोई आश्चर्य नहीं होना चाहिए। शिक्षा के क्षेत्र में भी चीन बड़ी तेजी के साथ आगे बढ़ रहा है। चीन चाहता है भारत के लोग चीन में आकर पढ़ाई करें। यहां पर कंपनियां लगाएं। चीन की कंपनियां भारतीयों को नौकरी दें।
अमेरिका ने 1990 में एच-1 वीजा के माध्यम से कंपनियों को अधिकार दिए थे। वह विशेषज्ञों को अमेरिका में नौकरी दें। अमेरिका आईटी सेक्टर के भारतीय विशेषज्ञों के कारण बड़ी तेजी के साथ आर्थिक रुप से बढ़ा। इस तथ्य को अमेरिका भूल गया है। चीन ने इसे पहचान लिया है। एच-1बी वीजा पर शुल्क बढ़ाकर अमेरिका ने चीन को एक अवसर दिया है। जिसे अमेरिका की सबसे बड़ी भूल माना जा सकता है। अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप अपनी विश्वसनीयता खोते जा रहे हैं। अमेरिका के राज्यों, वहां के विश्वविद्यालयों में डोनाल्ड ट्रंप को एक मसखरे के रूप में देखा जा रहा है। जो कभी कुछ कहता है, कभी कुछ करने लगता है। अदालतों में भी अमेरिका के राष्ट्रपति की कोई अच्छी छवि नहीं देखी जा रही है। ट्रंप मनमाने निर्णय ले रहे हैं। वर्तमान मे चीन की छवि अमेरिका की तुलना में कई गुना ज्यादा बेहतर है। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बहुत बड़े परिवर्तन चीन के इस ऑफर के कारण देखने को मिल सकते हैं। भारत में कहा जाता है, जब आदमी के बुरे दिन आते हैं तब सबसे पहले उसकी मति नष्ट हो जाती है। लगता है, ऐसा ही कुछ अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के साथ हो रहा है। अमेरिका जैसे देश के राष्ट्रपति होने के बाद भी उनमें कहीं से गंभीरता, कूटनीति, राजनीति, एवं शब्दों की मर्यादा देखने को नहीं मिल रही है। बुढ़ापे में ट्रम्प की छवि अपने परिवार के कारोबार तक सीमित है। जिसका फायदा अब चीन उठाने जा रहा है। चीन और भारत की सीमाएं आपस में लगी हैं। ऐसी स्थिति में दोनों देशों के लिए इसे अच्छे अवसर के रुप में देखा जाना चाहिए।

