
भूपेन्द्र गुप्ता
ट्रंप की टैरिफ टेरर से सभी देश बाहर निकलने की कोशिश कर रहे हैं। चीन ने त़ो पलट कर अमेरिका पर टैरिफ ही थोप दिए हैं, यूरोप भी अपनी तरह से काउंटर कर रहा है लेकिन भारत अभी असमंजस में है।
ताजा हालात ये हैं कि इस आपदा को सरकार ने अपने लिये अवसर बना लिया है।क्रूड आइल की कीमतें अंतरराष्ट्रीय बाजार में करीब 5 डालर प्रति बैरेल गिर गई हैं ।भारत ने अमरीका से नेगोशिएट करने की बजाय पेट्रोल और डीजल पर ₹2 प्रति लीटर एक्साइज ड्यूटी बढ़ा दी है ।बता रही है कि उपभोक्ता पर इसका असर नहीं पड़ेगा, कंपनियां अपने हिस्से से कीमतों को स्थिर रखेंगीं ।यह कदम खजाने में वृद्धि तो कर देगा किंतु परिवहन मूल्य घटाकर मंहगाई को थामने का अवसर गंवा भी देगा।रक्षात्मक नीतियां बिना व्यूह रचना के ऐसे आक्रमणो से नहीं बचातीं बल्कि वे दीवार की तरफ धकेलतीं हैं।
इसी तरह घरेलू गैस पर भी प्रति सिलेंडर ₹50 दाम बढ़ा दिए गए हैं ,कीमतों में यह वृद्धि उज्जवला कनेक्शन की हितग्राही गरीब महिलाओं को भी बर्दाश्त करनी पड़ेगी। यह जानना प्रासंगिक होगा कि भारत में लगभग 32.94 करोड़ घरेलू गैस उपभोक्ता है जिनमें से 10.33 करोड़ उज्जवला के हितग्राही है यानी लगभग 31 प्रतिशत।
भारत में औसतन प्रतिवर्ष 200.74 करोड़ सिलिंडर रीफिल होते हैं ।अतः इस मूल्य वृद्धि से सरकार की कंपनियां लगभग 10हजार 37 करोड़ रुपये का अतिरिक्त राजस्व अर्जित करना चाहतीं हैं ।इसी तरह पेट्रोलियम कंपनियों की कुल 37.1 मिलियन मेट्रिक टन पेट्रोल और 89.65 मिलियन मैट्रिक टन डीजल की खपत हो रही है जिसको लीटर में परिवर्तित करें तो 5 करोड़ लीटर प्रति दिन पेट्रोल और 10.6 करोड़ लीटर डीजल की खपत होती है ।दोनों को मिलाकर लगभग 1570 करोड़ लीटर पेट्रोल और डीजल की सालाना खपत है जिससे सरकार को एक्साइज ड्यूटी के खाते में लगभग 3 हजार 140 करोड़ की अतिरिक्त आय होगी।
अपने एक इंटरव्यू में पेट्रोलियम मंत्री हरदीप सिंह पुरी ने बताया था कि ईंधन में एथेनाल को मिलाने से सरकार ने 1लाख 6हजार करोड़ रुपये की बचत की है ।ब्लेंडिंग की यह मात्रा कुल खपत का 15 फीसदी तक पहुंच गई है।इससे हमारा आयात बिल भी घटा है लेकिन उपभोक्ता इस लाभ से पहले भी वंचित रहा था और अभी भी है जबकि क्रूड की कीमतें 67 डालर प्रति बैरल तक गिर गईं हैं।
भारत में गैस उत्पादन दो सरकारी कंपनियां ओएनजीसी एवं गेल करती है निजी क्षेत्र में रिलायंस यह काम कर रही है।इन कंपनियों के सालाना परिणाम बताते हैं कि ओएनजीसी को पहली और तीसरी तिमाही में क्रमशः 8 हजार 938 करोड़ तथा 9 हजार 784 करोड़ का मुनाफा बताया गया है। वहीं गेल ने तीसरी तिमाही में कंसालिडेटेड कुल मुनाफा 4 हजार 84 करोड़ घोषित किया है।
मनमोहन सरकार में 2014 में इन कंपनियों ने जब 22 हजार 95 करोड़ का ही लाभ कमाया था तब भी उपभोक्ताओं को 450 रुपये में गैस सिलिंडर और 59 रुपये लीटर में पेट्रोल मिल रहा था जबकि आज 853 रुपये में सिलिंडर और 106 रुपये में पेट्रोल मिल रहा है।
कंपनियों के ताजा परिणाम बताते हैं कि रिलायंस कंपनी की तो मार्केट कैप 2 लाख 42 हजार 203 करोड़ होकर ओएनजीसी की मार्केट कैप 2 लाख 38 हजार 270 करोड़ से भी आगे निकल गई है।कारण नीतिगत समर्थन भी हो सकता है और दक्षता भी लेकिन इतना तय है बाजार से संबद्ध होने के बावजूद उपभोक्ता के हिस्से की राहत उपभोक्ता को नहीं दी जा रही है।वह या तो इन कंपनियों की जेब भर रही है या सरकार का खजाना।
धारा के विपरीत केंद्रीय पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस मंत्री हरदीप संसद में कहा था कि भारत एकमात्र ऐसा देश है जहां पिछले ढाई-तीन वर्षों में ईंधन की कीमतें वास्तव में कम हुई हैं। क्या यह बयान विश्वसनीय है।मंहगाई से जूझते देश को यह जले पर नमक छिड़कने जैसा लगता है।
क्रूड की कीमतों में एक डालर की कमी आने पर देश के आयात बिल में लगभग 13 हजार करोड़ की बचत होती है ।लेकिन पुरी ने 22 फरवरी 2025 को यह कहा था कि कीमतों में गिरावट से सरकार को कोई वित्तीय लाभ नहीं हुआ, बल्कि सरकार ने तेल कंपनियों को 22,000 करोड़ रुपये की राहत दी है। चालीस रुपये लीटर पेट्रोल देने का वादा करते- करते सरकार कंपनियों को राहत और गरीब उपभोक्ता पर बादशाहत थोपने को चरितार्थ कर रही है।
(लेखक स्वतंत्र विश्लेषक हैं)