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सच्चाई छुप नहीं सकती…..?

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शशिकांत गुप्ते

अपने देश का गौरव शाली इतिहास,देश भक्ति से सराबोर गीत, देश में जन्मे महापुरुषों की जीवनियां, देश की स्वतंत्रता के लिए संघर्ष का इतिहास, संघर्ष में शहादत देने वाले देशभक्तों की लंबी फेरहिस्त, का स्मरण कर देशवासियों को आश्वस्त हो जाना चाहिए कि, अपने देश को विश्वगुरु बनने से कोई रोक नहीं सकता है।
अपने देश की भूमि आचार्यों की भूमि रही है,और है भी।
आचार्य का शाब्दिक अर्थ होता है,शिक्षक। शिक्षक का कर्म शिक्षा प्रदान कर देश की भावी पीढ़ी को ना सिर्फ शिक्षित करना,बल्कि उसे एक अच्छा संस्कारवान नागरिक बनाना होता है। तात्पर्य शिक्षक सृजक होता है।
उपर्युक्त महत्वपूर्ण मुद्दे सिर्फ पढ़ने में अच्छे लगते हैं और सुनने में कर्ण प्रिय लगते हैं।
यथार्थ में अपने देश की भावी पीढ़ी मतलब देश के लगभग बीस लाख विद्यार्थी प्रतिवर्ष विदेशों में शिक्षा ग्रहण करने जातें हैं।
अपने देश के विद्यार्थी विदेश में सिर्फ पढ़ने ही नहीं जातें हैं, बल्कि युवावस्था में ही देश की वित्तीय संस्थाओं से ऋण का बोझ लेकर जातें हैं।
अपने देश की शिक्षण संस्थाओं में छद्म प्रवेश लेकर विद्यार्थी, शिक्षा का व्यापार करने वाले कोचिंग उद्योग को फलने फूलने में महंगी फीस दे कर आर्थिक सहयोग प्रदान करने गर्व महसूस करते हैं।
जब कोचिंग क्लासेस के इश्तिहार्रों में सौ फी सदी अंको से उत्तीर्ण विद्यार्थियों के प्रसन्न मुद्रा में तस्वीर दिखाई देती है,तब एक अहम सवाल जहन में उपस्थित होता है कि, कोचिंग क्लासेस में पढ़ने वाले शिक्षकों की बुद्धि शिक्षण संस्थाओं में पढ़ाने वाले शिक्षकों की तुलना में इतनी तीक्ष्ण बुद्धि कैसे है?
अपने देश के सियासतदान विदेशों में जाकर निः संकोच कबूल करते हैं कि, वे पिछले जन्मों के पापों को भोगने के लिए भारत में जन्मे हैं?
देश में घोषित और अघोषित आपातकाल को नजरंदाज कर बी विदेश में जाकर लोकतंत्र पर चिंता प्रकट की जाती है।
इन लोगों की फितरत होती है, देश की बुनियादी समस्याओं को नज़र अंदाज़ करना।
पत्थर दिल होते हैं ये लोग।
इस संदर्भ में शायर जमाल एहसानी का यह शेर मौजू है।
उस ने बारिश में भी खिड़की खोल के देखा नहीं
भीगने वालों को कल क्या क्या परेशानी हुई

शशिकांत गुप्ते इंदौर

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