शशिकांत गुप्ते इंदौर
सन 1974 में जो जनांदोलन शुरू हुआ,इस जनांदोलन में देश के युवाओं की सक्रियता और जोश को देख जयप्रकाश नारायणजी ने आंदोलन का नेतृत्व किया था।
सन 1974 का जनांदोलन पूरे देश में सक्रिय हो गया था।इसी आंदोलन के कारण ही 1977 में जो सत्ता परिवर्तन हुआ।1975 से 1977 तक का आपातकाल का काला इतिहास सर्वविदित है।
सन 1977 के सत्ता परिवर्तन का प्रयोग अल्प अवधि में ही असफल हो गया।
इसकी के बाद राजनीति में अस्थिरता निर्मित हुई।गठजोड़ की राजनीति के आधार पर सत्ता प्राप्त करने प्रचलन शुरू हुआ।
समाजवादी विचारकों में कुछ अतिवादियों के कारण समाजवादियों में बिखराव हो गया।कुछ प्रखर समाजवादियों को दक्षिणपंथ की ओर आकर्षित हो गए।जिन समाजवादियों ने दक्षिणपंथ के साथ गलबहियां की ऊनकी स्थिति चार दिनों की चांदनी फिर वही…. जैसी हो गई।
विपणन अर्थात Marketing की भाषा में समझने की कौशिश करें तो यूज़ एंड थ्रो वाली स्थिति बन गई।
बहुत से लोगों ने समाजवाद के नाम पर क्षेत्रीय दलों का गठन, प्रायवेट लिमिटेड़ कम्पनियों की तर्ज किया।एक ही परिवार के लोगो को डारेक्टर बनाया गया।
अपने क्षेत्र में वर्चस्व के अहम का जेहन में कोरा वहम पालते हुए अवसरवाद को भुनाने की नाकाम कौशिश के कारण राजनीति में अपनी विश्वसनीयता खो दी।
वर्तमान में सभी राजनीति दलों ने कांग्रेस को खलनायक बना दिया।
सन 2011 के भ्रष्ट्राचार विरोधी आंदोलन को तात्कालिक सत्ता के विरुद्घ केंद्रित कर स्वयं को दूध का धुला घोषित करते हुए सन 2014 में सिर्फ जुमलों का प्रचार पर सत्ता प्राप्त की गई।
सन 2011 के आंदोलन में सक्रियता निभाने की भूमिका को भुनाने के लिए राजनीति में झाड़ू भी दिखाई देने लग गई। जिन्हीने हाथों में झाड़ू थामी है वे लोग भी मध्यम मार्गीय कांग्रेस को कोसतें है और दक्षिणपंथ का फैशनेबल विरोध करते है।
कुल मिलाकर राजनीति सत्ता केंद्रित होकर रह गई है।हरएक दल का लक्ष्य सत्ता परिवर्तन में सिमट के रह गया है।व्यवस्था परिवर्तन कोई नहीं चाहता है।
आज जरूरत है व्यवस्था परिवर्तन की।
सत्ता केंद्रित राजनीति के प्रचलन के कारण ही प्रचार माध्यम के सहारे छद्म चुनावी वादों को बहुत ही बेशर्मी से जुमलों में परिवर्तित कर जो सत्ता परिवर्तन हुआ उसके खामियाजे को आज आमजन भुगत रहा है।
दुर्भाग्य से जयप्रकाश नारायणजी के बाद राष्ट्रीय स्तर पर नेतृत्व की क्षमता रखने वाला कोई नेता रहा ही नहीं है।
सन 1980 में युवावस्था में लेखक अपने कुछ युवा साथियों के साथ विसर्जन आश्रम में सर्वोदयी नेता दादाभाई नाईक से भेंट करने गया।
दादाभाई बहुत ही सहज सरल व्यक्ति थे।दादाभाई से युवा साथियों ने पूछा कि देश में जयप्रकाशजी के बाद कोई भी राष्ट्रीयस्तर का नेता नहीं रहा है।
दादाभाई हम युवाओं की जिज्ञासा को समझ गए।
दादाभाई ने एक वाकया सुनाया,सन 1935 में स्वतंत्रता आंदोलन में शिरकत करते हुए विनोबाभावे गिरफ्तार हो गए।जब मै(दादाभाई) विनोबाजी ने मिलने जेल में गया और विनोबाजी से कहा,आप तो जेल में है अब हमारा नेतृत्व कौन करेगा?
विनोबाजी ने उत्तर दिया कि, आज तो मैं जेल ही हूँ कल यदि मुझे हृदयाघात हो गया और मैं इस दुनियां में ही नहीं रहा तो क्या होगा?यदि मुझे नेता मानते हो तो अपने अंदर विनोबा तैयार करों।
दादाभाई के साथ चर्चा के बाद यह समझ में आया कि,सिर्फ अवलंबन की मानसिकता को छोड़ स्वयं अपनी क्षमता के अनुसार देशहित में समाजहित में अपना योगदान देना चाहिए।
गांधीजी लोहियाजी जयप्रकाशजी और विनोबाजी के आदर्श ही हमारा नेतृत्व करेंगे।
लेखक का किसी राजनैतिक दल से कोई सरोकार नहीं है।कांग्रेस का उदाहरण देने के पीछे यही मकसद है कि, किसी एक ही दल को टारगेट बनाकर कोसतें रहने से स्वयं के पाप धुलने वाले नहीं है।
वर्तमान सत्ता पर तो बहुत ही गम्भीर आरोप लग रहें हैं।जब की वर्तमान सत्ता में विराजित लोग तो संस्कार और संस्कृति के विश्वविद्यालय में प्रशिक्षित अनुयायी हैं। इन लोगों की धर्म के प्रति प्रगाढ़ आस्था भी है।
आमजन को यथार्थ में झांकने का साहस करना पड़ेगा।
सच्चाई छुप नहीं सकती बनावट के उसूलों से।
शशिकांत गुप्ते इंदौर

