शशिकांत गुप्ते
राजा हरिश्चंद्र का इतिहास ईसा के लगभग 600 पूर्व का है।
पवित्र नगरी अयोध्या के राजा हरिश्चंद्र सत्यनिष्ठ थे।
राजा हरिश्चंद्र राम भक्त थे।
सन 1963 में राजा हरिश्चंद्र के जीवन पर हरिश्चन्द्र तारामती नाम से फ़िल्म बनी थी।
इस फ़िल्म में गीतकार प्रदीपजी ने गीत लिखें हैं।
इस फ़िल्म यह गीत प्रसिद्ध हुआ था।
अपनी झोली दुःख से भर ली
सुख दुनिया को बांटे
सारे जग को फूल लुटाए खुद अपनाएं कांटे
राज भी छोड़ा देश भी छोड़ा
लेकिन सत्य न छोड़ा
धर्म की ख़ातिर बिक गए राजा बिक गई देखों रानी
ये अमर रहेगी कहानी
इक्कीसवी सदी में उक्त गीत की पंक्तियों का स्मरण कर और पंक्तियां गुनगुना पर आश्चर्य होता है।
आश्चर्य होने का कारण है, राजा हरिश्चंद्र भी राम भक्त थे।
समयानुसार परिवर्तन होता है।
सन 1970 में प्रदर्शित फ़िल्म जॉनी मेरा नाम में गीतकार इंदिवरजी ने लिखे गीत की पंक्ति में चुनौती है।
नफरत करने वालों के सीने में प्यार भर दूं
अरे मै वो परवान हूँ,पत्थर को मोम कर दूं
ईसा के 600 वर्ष स्वयं झोली दुःख भरली दूसरों को फूल बांटने वाले राज हरिश्चंद्र थे।
बीसवीं सदी में गीतकार को लिखना पड़ रहा है।
नफ़रत करने वालों के सीने में प्यार भर दूं
इक्कीसवी में कल्पना में वर्णित परवाने के समक्ष कठिन चुनौती है।
अब अकेले परवाने के बूते की बात नहीं है।
अब तो शाहिर लुधियानवी रचित गाने की पंक्ति गाना पड़ेगी।
साथी हाथ बढ़ाना साथी रे
यह गीत फ़िल्म नया दौर का है।
इस गीत पंक्तियां फ़िल्म की Situation मतलब परिस्थिति पर लिखी पंक्तियां हैं।
इसीलिए गीत की निम्न पंक्तियां आज के दौर में विरोधाभासी लगती है।
हम मेहनतवालों ने जब भी मिलकर कदम बढ़ाया
सागर ने रास्ता छोड़ा परबत ने सीस झुकाया
यह पंक्तियां आज के संदर्भ में विरोधाभासी क्यों है?
इस प्रश्न का जवाब ढूंढना जोख़िम का काम हो गया है।
इसीलिए राम भगवान के भक्त राजा हरिश्चन्द्रजी का स्मरण होता है।
फ़िल्म के गीत पंक्तियां पुनः गुनगुनाने का मन करता है।
धरम के खातिर बिक गए राजा
देखों बिक गई देखों रानी
गीत की पंक्तियों को गुनगुनाने में कोई जोख़िम नहीं है। कारण गीत तो गीतकार प्रदीप ने लिखा है।
यह स्पष्टीकरण जरूरी है।
शशिकांत गुप्ते इंदौर

