अग्नि आलोक

*न्यायपालिका पर दबाव बनाकर उसे ब्लैकमेल करने की कोशिश*

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सनत जैन

भारत में 21 अप्रैल को सिविल सर्विस डे मनाया जाता है। भारतीय संविधान ने नागरिकों के मौलिक अधिकारों को सुनिश्चित किया है। संविधान ने न्यायपालिका, विधायिका और कार्यपालिका के रूप में ब्रह्मा, विष्णु, महेश की तर्ज पर भारतीय संविधान की रचना की है। संविधान ने सभी की जिम्मेदारी तय की है। संविधान द्वारा न्यायपालिका विधायिका और कार्यपालिका को अधिकार और कर्तव्य दोनों ही सुनिश्चित किए गए हैं।

संविधान निर्माताओं में से एक स्वतंत्र भारत के पहले गृहमंत्री सरदार वल्लभभाई पटेल, ने 10 अक्टूबर 1949 को सिविल सेवा के अधिकारियों की भूमिका पर मार्गदर्शन देते हुए कहा था। मेरी सलाह है, आप पूरी स्वतंत्रता के साथ कार्य करें। यदि आप मुखिया हैं, तो अपने अधीनस्थ को स्वतंत्रता से बोलने का अवसर दें। अधिकारियों को बिना किसी डर या पक्षपात के अपने विचार रखने की आजादी है। यदि विचार रखने की स्वतंत्रता नहीं होगी, ऐसी स्थिति में भारत का नवनिर्माण नहीं हो सकता है। उन्होंने कहा कि मेरा सचिव यदि मेरे किसी विचार से सहमत नहीं है, तो भी वह अपने विचार पूरी स्वतंत्रता के साथ लिख सकता है

। प्रशासनिक सेवा के अधिकारी किसी डर और भय के कारण स्पष्ट राय नहीं देते हैं। उसे लगता है, कि मंत्री या वरिष्ठ अधिकारी नाराज हो जाएंगे। ऐसी स्थिति में प्रशासनिक सेवा में रहने का कोई कारण नहीं है। पटेल ने प्रथम संबोधन में सांसदों से अपेक्षा की थी। प्रशासनिक सेवा के अधिकारियों का सम्मान और उनके अच्छे कार्यों का समर्थन करें। यदि वह लापरवाही और गलत काम करते हैं। ऐसी स्थिति में शासन का ध्यान आकर्षित करें। अच्छे कार्यों की प्रशंसा करें। सरदार पटेल कठोर प्रशासक के रूप में जाने जाते है। स्वतंत्रता मिलने के पश्चात उन्होंने रियासतों को भारत में विलय करने के लिए जो कार्य किया था। उसकी प्रशंसा आज भी सारी दुनिया में होती है। उन्होंने भारतीय सेवा के अधिकारियों को सजाह देते हुए कहा था। प्रशासन को पूरी तरह से निष्पक्ष और भ्रष्टाचार मुक्त बनाएं। सिविल सेवा के अधिकारी को राजनीति में भाग नहीं लेना चाहिए। सांप्रदायिक विवादों में उसे दूर रहना चाहिए। भारतीय सेवा के अधिकारियों से उम्मीद की जाती है। वह बिना किसी डर या पक्षपात के बाहरी प्रलोभन से प्रभावित हुए बिना अपना कार्य करेंगे।

स्वतंत्रता संग्राम से जुड़े नेताओं की पीढ़ी में भारतीय सेवा के अधिकारी बेहतर ढंग से संविधान के अनुरूप अपना कार्य कर रहे थे। भारत में जब से गठबंधन की सरकारें आना शुरू हुई हैं। उसके बाद भारतीय सेवा के अधिकारियों में भारी परिवर्तन देखने को मिल रहा है। वह सत्ता के दबाव और प्रलोभन के चलते अपनी भूमिका का सही ढंग से निर्वाह नहीं कर रहे हैं। यही नहीं कह पा रहे हैं। जिसके कारण भारत की कार्यपालिका मैं डर, भय, पक्षपात और भ्रष्टाचार अब सभी और देखने स्थिति विधायिका की हो गई है। जो अपने आप को संविधान से भी सर्वोपरि मानने लगी है। विधायिका को लगता है, चुनाव जीतने के बाद वह जो चाहे कर सकते हैं। न्यायपालिका को संविधान ने नागरिकों के मौलिक अधिकारों को सुरक्षित रखने जो अधिकार दिए हैं।

जज अपने कर्तव्य का पालन नियम कानून और संविधान के अनुरूप करें। न्यायपालिका को संविधान ने सीधे अधिकार नहीं दिए हैं। विधायिका और कार्यपालिका के शासन-प्रशासन तंत्र द्वारा यदि संविधान के अनुसार कार्य नहीं किये जाने पर नियंत्रित करने के अधिकार दिये है। संविधान ने न्यायपालिका को विधायिका और कार्यपालिका के पर अंकुश बनाये रखने का दायित्व सौंपा है। सरकार का दबाव अब न्यायपालिका के ऊपर स्पष्ट रूप से देखने को मिल रहा है। उसमें न्यायपालिका अब विफल होती हुई दिख रही है। विधायिका और कार्यपालिका ऐसा कोई कानून नहीं बना सकती है। जिससे नागरिकों के या किसी समुदाय के मौलिक अधिकारों का हनन हो। कोई ऐसा नियम भी नहीं बनाया जा सकता है।

विधायिका और कार्यपालिका को नियंत्रित करने के लिये संविधान ने सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट के जजों को विशेष अधिकार दिए हैं। सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में राज्यपालों की भूमिका में संघीय व्यवस्था तथा वक्फ कानून को लेकर सही समय पर सही निर्णय करने से सरकार बौखला गई है। सरकार के नुमाइंदे न्यायपालिका के ऊपर तरह-तरह के आरोप लगा रहे हैं। शुद्ध हिंदी में कहा जाए तो न्यायपालिका पर दबाव बनाकर उसे ब्लैकमेल करने की कोशिश की जा रही है। सुप्रीम कोर्ट के वर्तमान रुख से आम नागरिकों का न्यायपालिका के ऊपर भरोसा जागा है, जो पहिले खत्म होता जा रहा था।

न्यायपालिका ने पिछले वर्षों में आधे अधूरे निर्णय देकर सरकार के दबाव में सरकार के पक्ष में काम किए है। उससे धारणा बनने लगी थी, न्यायपालिका सरकार के इशारे पर निर्णय कर रही है। यह भ्रम चीफ जस्टिस खन्ना ने पिछले कुछ दिनों में दिए गए फैसले से तोड़ा है। सरकार के संरक्षण के चलते संवैधानिक पदों और कार्यपालिका के अधिकारी संविधान प्रदत्त न्यायपालिका के आदेशों का पालन नहीं कर रहे थे। न्यायपालिका और सरकार के बीच यही टकराव अब चरम पर पहुंच गया है।

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