सलमान अरशद
भारत में ये तहज़ीब का हिस्सा है कि लोग अपने किये का भी श्रेय नहीं लेते, इसे ईश्वर, खुदा, भोलेनाथ वगैरह की कृपा कह देते हैं, इसे विनम्रता समझा जाता है। राजस्थान में आज भी लोग जब अपने बच्चों का परिचय देते हैं तो मेरा बच्चा कहने के बजाय ” आपका बेटा या बेटी” कहते हैं। इसी तरह जब कोई वादा करते हैं या संकल्प लेते हैं तो फिर बीच में ईश्वर को ले आते हैं, मुसलमान अपने संकल्प या वादे के साथ “इंशाअल्लाह” कहना नहीं भूलते। दरअसल, ग़ुरूर या अहंकार से बचने की भारतीय समाज सचेतन प्रयास करता है। यहाँ तक कि ग़ुरूर का प्रदर्शन करते हुए भी ये प्रयास किया जाता है।
पहली बार देश में ईश्वर की जगह एक “महामानव” को स्थापित करने की कोशिश की जा रही है। “फ़लाने की कृपा” हर काम के लिए ज़रूरी है। इस फ़लाने का कोई कर्तव्य नहीं है, ये किसी क़ायदे कानून से भी नहीं बंधा है, ये बस कृपा करता है। अब ये कृपा आप तक पहुँचे या न पहुंचे, पर हाँ कृपा की कुछ बूंदे अगर पहुँच जाएं तो आपको ढोल नगाड़े बजाकर इस महामानव की कृपा के लिए धन्यवाद देना है।
कमाल तो ये है कि ये कृपा भी आपकी ज़ेब से निकलता है, आपकी भूख और आंसुओं की कीमत पर ये कृपा आपको मिलती है, बावजूद इसके अगर अपने इस कृपा के बदले वाहवाही करने में ज़रा भी कोताही बरती तो आपको नमक हराम कहा जाता है, ये अलग बात है कि ये नमक भी आपका ही आपको देता है।
क्या ये सोचने की बात नहीं है कि जब ईश्वर की ही सत्ता डवांडोल है, एक आदमी जो ठीक से आदमी भी नहीं बन पाया, उसे ईश्वर बनने की इतनी लालसा क्यों है ? क्यों हज़ारो करोड़ रूपये उसके ईश्वर बनने की लालसा पर खर्च हो रहे हैं ?
क्या सच में इस ईश्वर बनने की चाहत में पागलपन की हद तक जाने को तैयार महामानव की आपको ज़रूरत है ?
ईश्वर की जगह एक “महामानव” को स्थापित करने की कोशिश

