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दो चिंतन बिंदु : सत्ता पर भरोसा कैसे ? शोषण मुस्लिमों का या हिन्दुओं का?

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. डॉ. विकास मानव

_मानवतापरक संत हिमांशु कुमार के शब्दों में :  मैं एनकाउंटर जैसे मुद्दों पर बात नहीं कर रहा. मेरा विषय आम अवाम है. पिछले दिनों एक आदिवासी लड़की के साथ पुलिस थाने में दो बार बलात्कार हुआ. एक पत्रकार ने मुझसे कहा कि आप मुझे उसका पता बता दीजिए मैं जाकर इंटरव्यू करूंगा. मैंने कहा कि पता तो मैं आपको दूंगा नहीं. मुझे डर है कि लड़की की पहचान सार्वजनिक होने पर उस लड़की पर और ज्यादा मुसीबत आ सकती है. मैं दूध का जला हुआ हूं, इसलिए अब छाछ भी फूंक फूंक कर पीता हूं. पत्रकार ने पूछा – क्यों क्या हुआ था ? मैंने उन्हें जो बताया आप भी सुनिए :_
       छत्तीसगढ़ के सामसेट्टी गांव की बात है. भाजपा सरकार के समय की बात है. पुलिस वालों ने सुरक्षा बलों के साथ मिलकर गांव पर हमला बोला. सरकार चाहती थी कि आदिवासी गांव खाली करके भाग जाएं ताकि उनकी ज़मीन कम्पनियों को दे दी जाय. आदिवासियों को डराने के लिए सुरक्षा बलों द्वारा महिलाओं से सामूहिक बलात्कार किये जाते थे, आज भी किये जाते हैं.
   इस गांव में चार लड़कियों के साथ पुलिस वालों ने सामूहिक बलात्कार किये. लडकियां मदद मांगने हमारे आश्रम में आयीं. हम लड़कियों को लेकर थाने पहुंचे लेकिन बलात्कारी तो थाने में ही बैठे हुए थे, रिपोर्ट नहीं लिखी गयी.
  कानून के मुताबिक हमने पुलिस अधीक्षक को रजिस्टर्ड पोस्ट से शिकायत भेजी. पुलिस अधीक्षक ने पत्र का जवाब नहीं दिया. हमने सुकमा कोर्ट में केस दायर कर दिया. आरोपी पुलिस वालों के वारंट जारी हो गए. लेकिन पुलिस विभाग ने कोर्ट को जवाब दिया कि बलात्कार के यह आरोपी सिपाही हमें मिल नहीं रहे. यह तो फरार हैं. जबकि वह आरोपी पुलिस वाले थाने में ही रह रहे थे और नियमित तनख्वाह ले रहे थे. हिन्दुस्तान टाइम्स ने छापा कि ‘एब्स्कोंडिंग बट ऑन ड्यूटी’ फरार हैं, पर ड्यूटी पर हाज़िर हैं,
   मैंने गृह मंत्री पी. चिदम्बरम को उन लड़कियों के बयान की सीडी दी. गृह मंत्री पी. चिदम्बरम ने वह सीडी मुख्यमंत्री को दे दी. इसके बाद डेढ़ सौ से भी ज्यादा सुरक्षा बल उन बलात्कारी पुलिस वालों के साथ सामसेट्टी गांव में गए. *पुलिस वालों ने लड़कियों का अपहरण किया और दोरनापाल थाने में लाकर चारों लड़कियों के साथ दुबारा सामूहिक बलात्कार किया.*

पांच दिन के बाद उन लड़कियों को पुलिस वालों ने सामसेट्टी गांव के चौराहे पर फेंक दिया और चेतावनी दी कि अगर अबकी बार हिमांशु से बात की तो पूरे गाव को आग लगा देंगे. मैं उन लड़कियों से मिलने गया, लड़कियों ने मुझसे मिलने से मना कर दिया. लड़कियों का कहना था कि ‘आपने कहा था कि देश में कानून है आगे आओ, आवाज़ उठाओ, लेकिन आपने हमें नहीं बचाया.’
मेरा बचपन से जो विश्वास भारत के लोकतंत्र और संविधान में था वह चूर चूर हो गया. मैं सर झुका कर वहां से वापिस आ गया. पुलिस ने मेरे आश्रम पर बुलडोज़र चला दिया. एक हफ्ते के अंदर पुलिस ने मेरे आश्रम में मुझसे मिलने आये बारह आदिवासियों का अपहरण कर लिया. मेरे दो साथियों को जेल में डाल दिया गया. मेरे वकील को थाने में उल्टा लटका कर रात भर मारा गया. मेरे सभी कार्यकर्ताओं के घर पुलिस ने छापे मारे और सभी को मेरे साथ काम ना करने की धमकी दी. पुलिस ने जिस रात मेरी हत्या की योजना बनाई, अंत में उस रात मुझे छत्तीसगढ़ छोड़ना पड़ा.
अब जब कभी लोग मुझसे पीड़ित लोगों की जानकारी मांगते हैं तो मैं सोच में पड़ जाता हूं कि पीड़ित को कौन बचाएगा ? जब इस देश का गृह मंत्री और मुख्य मंत्री बलात्कार करवाते हों तो पीड़ितों की सुरक्षा कौन करेगा ? मैंने इस देश के लोकतंत्र का जो भयानक चेहरा देखा है उससे मुझे अब किसी पर भरोसा नहीं रहा. कोई भी पुलिस अधिकारी, कोई भी जज, मंत्री, मुख्य मंत्री बलात्कार करवा सकता है, बलात्कारी को बचा सकता है. इसलिए मैं अब जितनी मेरी ताकत है मैं शोर मचाता हूं.
मैं इस देश को बताना चाहता हूं कि आंखें खोलो और देखो देशवासियों के साथ क्या हो रहा है. कल आपके साथ भी यह सब हो सकता है. मैं चाहता हूं कि आप इस लड़ाई में शामिल हो जाएं, यह लड़ाई अब अदालत, सरकार, थाने के भीतर नहीं जीती जा सकती, इसे तो अब जनता ही लड़ कर जीत सकती है.

मुसलमानों को पीटने वाली मस्जिदों पर भगवे झंडे लगाने वाली जो भीड़ तैयार की गई है, उसे जानबूझकर तैयार किया गया है. जनता को दंगाई भीड़ में बदलना एक राजनैतिक मक़सद से किया जाता है. पुलिस, सरकार, अदालत सब मिलकर इस भीड़ का निर्माण कर रहे हैं. इस भीड़ को दुश्मनों की एक लंबी लिस्ट दी गई है. अगर आप एक लिस्ट में नहीं है तो दूसरी लिस्ट में जरूर होंगे.
आपको मुसलमान कह कर मारा जा सकता है. इसाई कह कर मारा जा सकता है. वामपंथी कह कर मारा जा सकता है. सेकुलर कह कर मारा जा सकता है. आपको पाकिस्तानी अर्बन नक्सल कहकर भी मारा जा सकता है लेकिन यह लिस्ट बढ़ती जाएगी. कुछ दिनों में कांग्रेसी कहकर लोगों की हत्या की जाएगी या सपाई, बसपाई या भाजपा का विरोध करने वाली किसी भी राजनीतिक पार्टी का समर्थक कहकर आपकी हत्या किया जाना भी उसमें शामिल हो जाएगा.
दंगाई भीड़ सरकार से कोई सवाल नहीं करती. वह सरकार से रोजगार नहीं मांगेगी बल्कि रोजगार मांगने वाले लोगों की पुलिस द्वारा पिटाई पर तालियां बजाएगी. यह भीड़ शिक्षा, यूनिवर्सिटी, स्कूल, कॉलेज नहीं मांगेगी बल्कि फीस कम करने की मांग करने वाले जेएनयू यूनिवर्सिटी में या हैदराबाद, बनारस और इलाहाबाद विश्वविद्यालय में घुसकर छात्रों को पीटेगी.
अम्बेडकर को मानने वाले या हिंदू धर्म को ना मानने वाले नास्तिकता की बात करने वाले लोगों की पिटाई भी की जाएगी. इस भीड़ के शिकार की लिस्ट लंबी होती जाएगी. यह जींस वाली लड़कियों को पीटेगी, रेस्टोरेंट जाने वाली लड़कियों को पीटेगी. कल को तिलक ना लगाने वाले हिंदुओं को पीटना शुरू कर दिया जाएगा. घूंघट ना करने वाली, सिर ना ढंकने वाली महिलाओं की सरेआम पिटाई की जा सकती है. इस भीड़ की हिंसा बढ़ती जाएगी और इसकी लिस्ट लंबी होती जाएगी. अफगानिस्तान वगैरह में आप यह सब देख भी चुके हैं.
शर्मा, मिश्रा, शुक्ला, चौधरी साहब, ठाकुर साहब, चोपड़ा साहब सब की पिटाई हो सकती है. उसका कोई ना कोई बहाना यह भीड़ खोज लेगी. यह भीड़ आप को सुरक्षा देने के नाम पर आपसे रंगदारी या सुरक्षा शुल्क मांग सकती है. इस भीड़ के अपने अपने इलाके तय हो जाएंगे. इस भीड़ के जो गैंग लीडर होंगे वही उस इलाके को कंट्रोल करेंगे. सत्ता के लिए इन गैंग लीडर से सांठगांठ करके अपना राजकाज चलाते रहना बहुत आसान हो जाएगा.
फिर चुनाव, लोकतंत्र, अदालत, न्याय पुलिस इसे भी जनता के प्रति जिम्मेदार बनाने की कोई जरूरत नहीं होगी. न ही चुनाव में हारने का कोई डर बचेगा. ठीक इसी योजना पर बिल्कुल संतुलित कदमों से बढ़ा जा रहा है. कुछ ही समय में आप यह सब वास्तविक रूप में देख लेंगे.

लोकतंत्र का खात्मा और अधिनायक तंत्र की स्थापना का यह रोड मैप सावरकर साहब ने पहले ही लिख दिया था. आपको आश्चर्य करने की कोई जरूरत नहीं है. सरकार ठीक वही कर रही है जिसके लिए वह सत्ता में आई थी लेकिन अभी आगे और भी खूनी पड़ाव बाकी है.
अभी अल्पसंख्यकों का कत्लेआम और एक धर्म पर आधारित सत्ता की स्थापना का लक्ष्य बाकी है. इन लोगों को आप महंगाई, अर्थव्यवस्था, कानून व्यवस्था जैसी बातों में फंसा कर इनके लक्ष्य से नहीं डिगा सकते. यह लोग सत्ता में आ गए हैं अब यह चुनाव से नहीं जाएंगे.

अधिक शोषण मुस्लिमों का या हिन्दुओं का?
मुसलमान भंडारा नहीं चलाता. अनाथालय, अस्पताल नहीं चलता. कोई भी दान -पुण्य नहीं करता. राष्ट्रभक्ति के नाम पर बिदकता है. तो फिर वह करता क्या है? जी हाँ, बस कुरान के हिसाब से दूसरी कौम को काफिर मानकर उसका धर्मपरिवर्तन या कत्ल. ~ यह प्रचारित दर्शन है दक्षिणपंथियों का.
मेरी एक मित्र हैं गुलबानो फातिमा दिल्ली से. हिन्दू धर्मग्रंथो की भी विद्वान. पक्की मुसलमान हैं. अमीर नहीं हैं. चर्मचक्षु से दृष्टिहीन जरूर हैं. यतीमों के कल्याण के सफ़र की मेरी हमसफ़र हैं, आर्थिक सहयोगिनी के तौर पर भी. आज की तारीख तक मुझ से मिली तक नहीं हैं.
बाकी नवोदित शब्दशिल्पी आभा शुक्ला के शब्दों में पढ़िए :
मुस्लिम लॉकडाउन में मजदूरों के विस्थापन के समय खाने की पैकेट और पानी के बोतल बांट रहे थे. कोरोनाकाल में लोगों की जिंदगी बचाने मस्जिदों को कोविड सेंटर में बदल रहे थे.
जहांगीरपुरा मस्जिद, मुग़लपुरा (वडोदरा गुजरात) की मस्जिद को मुसलमानों द्वारा कोविड सेंटर बना दिया गया. अगर किसी के पास एक भी मंदिर को कोविड सेंटर में बदलने की सूचना है तो मुझे भी बताएं.
मेरा दिल भर आया था. क्या आदमी हो भाई. माफ करना हमें, हममें तुम्हारे जितनी मानवता नहीं है.
20 साल बाद कोर्ट ने ये तो मान लिया कि ये 127 लोग सिमी के सदस्य नहीं हैं, लेकिन जो अपमान समाज में इन लोगों ने 20 साल तक सहा. कुल 6 महीने लगातार सुबह-शाम थाने में बुलाकर स्टेटमेंट लिखाये गये. पड़ोसी हंसे. देशद्रोही होने की तोहमतें दीं. क्या वो कोर्ट लौटा सकता है ?
इन 20 सालों में कुछ देशविरोधी गतिविधियों में शामिल होने का ठप्पा लिये लिये ही मर गये होंगे. कितनी जलालत सही होगी इनके परिवार ने. और आप समझ सकते हैं कि पुलिस ने इनके साथ क्या क्या नहीं किया होगा.

देश में कांग्रेस रही या भाजपा पर मुसलमानों की नियति नहीं बदली. अब 2014 के बाद से तो उनका सांस लेना भी देशविरोधी गतिविधि हो गई और होनी भी चाहिए क्योंकि जिन्ना को छोड़कर गांधी को चुनने का. पाकिस्तान को छोड़कर भारत को चुनने का गुनाह हुआ है उनसे. अब मुल्क से वफादारी की सजा तो मिलेगी ही.
ये 127 लोग मुट्ठी भर हैं जिन्हें न्याय मिल गया. कश्मीर की जेलों मे न जाने कितने नौजवान सड़ रहे हैं आतंकी होने के संदेह में, जिन्होंने बच्चे से लेकर बड़े होने तक अपनी औलाद का मुंह भी नहीं देखा. जो अपने मां बाप के जनाजे को कंधा नहीं दे सके. जिनकी पत्नी ने अपने शौहर के जिन्दा होते हुये भी बेवा की तरह अपनी जिन्दगी गुजार दी. इन सबकी जिम्मेदार कांग्रेस भी उतनी ही है जितनी की भाजपा.

     यूपी के शाहजहांपुर में पश्चिम बंगाल से आए कुछ मुसलमानों को हिरासत में लिया गया है. उनका गुनाह ये है कि उन्होंने रेलवे स्टेशन पर नमाज़ पढ़ी. पुलिस का कहना है कि नमाज़ पढ़ कर मुसलमानों ने ‘शांति भंग’ की है. क्या ईश्वर को याद करने से शांति भंग होती है? जब गणेश महोत्सव में रोड पर गणेश जी के बड़े-बड़े पंडाल लगते हैं, जोकि भयानक जाम और कानफोड़ू शोर का सबब बनते हैं, तब शांति भंग नहीं होती थी?
   दशहरे के मेले की आड़ में होने वाली छेड़छाड़ और शांति भंग की घटनाओं पर करके दिखायेगा गिरफ्तारी? दीवाली पर एकदम से दमा और सांस के मरीजों का जीना दूभर हो जाता है, एक बार करके दिखाइयेगा एक भी गिरफ्तारी? खुला चैलेंज है यूपी पुलिस को! चलिए एफआईआर मैं लिखा दूंगी, करिए आप गिरफ्तारी!
   जो लोग पूरे साल शांति भंग करते हैं, मूर्तियों का विसर्जन कर जल प्रदूषण फैलाते हैं, लाउडस्पीकर से ध्वनि प्रदूषण फैलाते हैं, पटाखों से वायु प्रदूषण फैलाते हैं, उनको आपत्ति है शांतिपूर्ण तरीके से एक कोने में बैठकर नमाज पढ़कर ईश्वर को याद करने वालों से!

भयानक मनोरोग इस्‍लामोफोबिया
गिरीडीह में तीन हिन्दू लड़के अरेस्ट हुए हैं. मस्जिद के अंदर पेशाब करने के मामले में. दो सगे भाई हैं, एक चाचा का लड़का है उनके. मल्टीनेशनल कम्पनी में काम करते हैं. MBA और होटल मैनजमेंट किया है. इसको कहते हैं जहालत.
लाखों रुपए लगाकर मां बाप ने पढ़ाया लिखाया होगा. लड़कों ने सब पढ़ाई लिखाई पर पलीता लगा दिया. हमको तो इन लड़कों के मां बाप पर तरस आ रहा है. बेचारों की मनोस्थिति क्या होगी इस समय ये खबर सुनकर?
मस्जिद में पेशाब करके लड़कों ने क्या हासिल कर लिया?
इस्लाम का नाम खत्म कर दिया दुनिया से?
भारत को हिंदू राष्ट्र बना दिया?
भारत से मुसलमान को बाहर कर दिया?
मुसलमानों को सड़क पर ला दिया?
पैगंबर मोहम्मद साहब का अस्तित्व मिटा दिया?
क्या कर लिया?
कुछ नहीं.
कुछ नहीं कर पाए किसी का. फिर मिला क्या ये करके?
रुपया?
पद?
बंगला?
गाड़ी?
नहीं जी, कुछ नहीं मिला.
जब कुछ नहीं मिल रहा हो और फिर भी आप बचकानी हरकतें करते रहो तो ये मनोरोग की स्थिति होती है. आज भारत के बहुसंख्यक समाज का एक बड़ा हिस्सा इसी मनोरोग से पीड़ित है. इसको ‘इस्‍लामोफोबिया’ कह सकते हैं आप.
आप चाहें तो मेरी बात को हंसी में टाल सकते हैं. पर लिखकर ले लीजिए : ये मनोरोग है और भयानक मनोरोग है.

क्या आपको पता है कि कोविड की तरह इस्लामोफोबिया भी एक भयंकर महामारी है जिस पर किसी का ध्यान नहीं जाता.
ये ऐसा मनोरोग है जो मेरा देश खा गया. जीडीपी खा गया. संविधान खा गया. लॉ एंड आर्डर खा गया. उद्योग धन्धे खा गया. किसानों की आय खा गया. बैंकों को खा गया. नौकरियां खा गया. अब मुर्दों के कफन तक खा गया. सैकडों जाने खा गया.
इतना सब खा गया ये इस्लामोफोबिया लेकिन इसके रोगियों को इसका एहसास तक नहीं. उनको बस मुल्ला और मस्जिद ही दिखता है. मनोवैज्ञानिक क्या कर रहे हैं?
इस्लामोफोबिया की दवा या वैक्सीन ईजाद क्यों नहीं कर रहे? ये आज एक गंभीर मानसिक विकार है. बड़ी संख्या में लोग इसके शिकार हैं. खासकर युवा. बड़ी गम्भीर स्थिति है. मुझे लगता है कि इसको राष्ट्रीय स्वास्थ मिशन के अंतर्गत लाना चाहिए.
CHC और PHC स्तर पर एक मनोचिकित्सक तैनात करना चाहिए. जिसको इस्लामोफोबिया का पूर्व प्रशिक्षण दिया गया हो.
जीवन के उद्देश्य बदल गए हैं. आदमी सब्जी वाले से लेकर हर व्यक्ति पर शक करता है. हर जगह रस्सी का सांप है. मुझे इस्लामोफोबिया के मरीजों से खुद डर लगता है, और दया भी आती है. पता नही कब कहां किसे नुकसान पहुंचा दें और खुद को भी पहुंचा लें.
स्वास्थ और परिवार कल्याण मंत्रालय को चाहिए कि इस रोग की गंभीरता को समझे और आप सब भी ऐसे मरीजों से सहानुभूति रखें.
मज़ाक की बात नहीं ये. एक बहुत विकृत मानसिक स्थिति है. जो खासकर युवाओं की सोचने समझने की शक्ति को खत्म कर देती है.

अब धर्मांतरण से सम्बंधित तीन दृष्टांत :
एक खबर बताती है कि सतरंगी सपनों और पैसे के लालच में आकर लड़कों ने इस्लाम क़ुबूल किया. सपने भी उनके. लालच भी उनका और गुनाह मौलाना का. मतलब पैसे के लालच में हत्या आप करो, पर गुनाहगार पड़ोसी को माना जाये.
दूसरी खबर बताती है कि एक लड़की जो घोर आस्तिक थी. रोज मन्दिर जाती थी. उच्च शिक्षित थी. उस ने अंग्रेजी भाषा में कुरान पढ़ी और मुसलमान बनने का निर्णय लिया. इस सम्बंध में उसने पहले एसडीएम से सार्टिफिकेट प्राप्त किया, इसके बाद मौलाना जहांगीर से. लेकिन न लडकी दोषी, न वो एसडीएम दोषी, अकेले मौलाना दोषी.
तीसरी खबर बताती है कि छाया और अन्जली नाम की दो लड़कियों ने निकाह से पहले धर्म परिवर्तन कर मुस्लिम लड़कों से निकाह किया. उनसे धर्म छुपाकर शादी नहीं की गई. फिर जब 3 साल बाद दोनों के रिश्ते में दरार आयी तो लड़कों पर धर्मांतरण कराने का केस कर दिया.
कोई पैसे के लालच में धर्म परिवर्तन कर रहा है तो कोई निकाह के लिये. पर अपराधी सिर्फ मौलाना को बनाया जा रहा है. कितनी विकट स्थिति है ये. मुस्लिम संगठनों, शहर काजियों, वफ्फ बोर्ड की इस। पर चुप्पी मुझे बेहद खल रही है और निराशाजनक लग रही है.
क्या सब अपना ईमान फासिस्टों के आगे गिरवी रख दिये हैं?

हिन्दुओं का अहित :
2014_के बाद से देश का माहौल हिन्दू विरोधी है. यदि सत्ता के लिये सबसे ज्यादा किसी का अहित किया जा रहा है तो वो हिन्दू का ही है.
एक पहलू खान या तबरेज अंसारी की हत्या के लिये जिन 50 लड़कों को खूनी और दंगाई बनाया जा रहा है, आगे उनका भविष्य शून्य है.
नशा ऐसा है कि गांव कस्बे का 16-17 का लड़का भी युवा नेता है. जगह जगह छोटे छोटे संगठन तैयार हो रहे हैं और एक अल्पशिक्षित कम उम्र के लड़के को संगठन का प्रदेश महामंत्री, प्रदेश सचिव बनाया जा रहा है. उसकी उम्र, कम शिक्षा, और धर्म की गरमी उसको कैबिनेट मन्त्री जैसा महसूस करा देती है. उसका काम ही होता है 24 घन्टे नफरत फैलाना.
ऐसे बच्चे या तो मां बाप की सुनते नहीं, या फिर लफट्टे होते हैं. सांसद जी के साथ एक फोटो खिंचाने के चक्कर में किसी भी हद तक गिर जाते हैं.
ऐसे में जरुरत है कि आप ये समझें कि आपके बच्चे कहां जा रहे हैं. आपकी पीढियां बर्बाद कर दी जा रही हैं और धर्म का इन्जेक्शन लगातार लगाया जा रहा है, ताकि आप अपने बच्चों की बर्बादी का दर्द भी न महसूस कर सकें.
🍃चेतना विकास मिशन

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