आजादी के 7 दशक बाद सरकार ने यूजीसी के माध्यम से उच्च शिक्षण संस्थाओं में पिछड़ों के खिलाफ भेदभाव पर सजा का प्रावधान किया है। लेकिन सर्वोच्च न्यायालय ने इस पर रोक लगा दी है। उनका तर्क है कि यह समाज को विभाजित करेगा। दरअसल SC/ST के लिए यह प्रावधान शुरू से ही लागू है लेकिन पिछड़ों के लिए इसे लागू करने में 75 साल से ऊपर लग गया। डॉ. अंबेडकर ने नेहरू कैबिनेट से इस्तीफा दिया था तब हिन्दू कोड बिल के साथ यह प्रावधान भी था जिसे उस समय लागू नहीं किया गया था। वास्तव में इस भेदभाव का ही परिणाम है कि शिक्षण संस्थाओं में कुलपति प्रोफेसर आदि पदों पर पिछड़ों की संख्या 10% से भी कम है।भाजपा नेतृत्व के लिए सांप छछूंदर वाली स्थिति है। एक ओर उसका सवर्णों का सबसे ठोस वोट बैंक है दूसरी ओर पिछड़े वोट बैंक को भी पूरी तरह वह अपने साथ लाना चाहती है। इसका विशेष संदर्भ केरल तमिलनाडु का चुनाव तो है ही जहां लाख कोशिशों के बाद भी अपनी ब्राह्मणवादी छवि के कारण वह जगह नहीं बना पा रही है। अबकी बार वह अपनी नई पिछड़ापरस्त छवि के साथ इस स्थिति को बदलना चाहती है। सर्वोपरि UP के निकट आते चुनाव को लेकर उसकी चिंता स्वाभाविक है।
लाल बहादुर सिंह
यूजीसी के नए प्रावधानों पर चल रही राष्ट्रव्यापी बहस में सबसे सही साबित हुए भाजपा के मुखर सांसद निशिकांत दुबे। बीजेपी सांसद निशिकांत दुबे ने 25 जनवरी को ‘एक्स’ पर लिखा, “मोदी हैं तो मुमकिन है, विश्वास रखिए UGC नोटिफिकेशन की सभी भ्रान्तियों को दूर किया जाएगा।
संविधान के आर्टिकलों 14 एवं 15 के अनुसार अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति, पिछड़े वर्ग और सामान्य वर्ग में कोई फर्क नहीं है। 10 प्रतिशत आरक्षण सामान्य वर्ग को केवल और केवल माननीय प्रधानमंत्री मोदी जी के कारण मिला। 1990 मंडल कमीशन लागू होने के बाद इस देश की सभी राजनीतिक पार्टियों ने सरकार बनाई, लेकिन न्याय केवल पीएम मोदी ने दिया। इंतज़ार कीजिए UGC की भ्रांतियां भी ख़त्म होगी।”
इस बात पर जोर स्पष्ट है कि पिछड़ों को न्याय केवल मोदी राज में मिल सकता है और उधर सवर्णों को10% EWS कोटा भी मोदी राज में ही मिला है।
दरअसल आजादी के 7 दशक बाद सरकार ने यूजीसी के माध्यम से उच्च शिक्षण संस्थाओं में पिछड़ों के खिलाफ भेदभाव पर सजा का प्रावधान किया है। लेकिन सर्वोच्च न्यायालय ने इस पर रोक लगा दी है। उनका तर्क है कि यह समाज को विभाजित करेगा। दरअसल SC/ST के लिए यह प्रावधान शुरू से ही लागू है लेकिन पिछड़ों के लिए इसे लागू करने में 75 साल से ऊपर लग गया। डॉ. अंबेडकर ने नेहरू कैबिनेट से इस्तीफा दिया था तब हिन्दू कोड बिल के साथ यह प्रावधान भी था जिसे उस समय लागू नहीं किया गया था। वास्तव में इस भेदभाव का ही परिणाम है कि शिक्षण संस्थाओं में कुलपति प्रोफेसर आदि पदों पर पिछड़ों की संख्या 10% से भी कम है।
संस्थानों में नियुक्ति के समय इन तबकों के तमाम युवा Not Found Suitable श्रेणी में डाल दिए जाते हैं। इसके खिलाफ स्वाभाविक रूप से करणी सेना जैसे स्वयंभू सवर्ण हिंदू संगठन सड़क पर उतर पड़े।अभी भले कोर्ट में इस पर रोक लग गई हो, यह साफ है कि यह नैतिक और व्यावहारिक रूप से हारी हुई लड़ाई है और यह रोक पिछड़े छात्रों के बीच भारी असंतोष और दबाव को जन्म देगी।
यूजीसी के प्रमोशन ऑफ इक्विटी इन हायर एजुकेशन इंस्टीट्यूशंस रेगुलेशंस, 2026 के विरोध में सबसे बड़ा तर्क यह दिया जा रहा है कि इसका दुरुपयोग करके कुछ लोगों को निशाना बनाया जाएगा। कुछ लोग मेरिट की उपेक्षा के पुराने मंडल विरोधी तर्क को ला रहे हैं। हालांकि मेरिट से तो इसका कोई संबंध ही नहीं है। जहां तक दुरुपयोग की बात है वह अच्छे से अच्छे नियम का भी किया जा सकता है अगर लागू करने वाले की नीयत साफ न हो।
बेशक दुरुपयोग को रोकने के लिए उचित प्रावधान किए जा सकते हैं और वे किए जाने चाहिए। इस नए प्रावधान का विरोध करने वालों को तमाम शिक्षण संस्थाओं की क्षमता, कुल प्राध्यापकों की संख्या बढ़ाने के लिए लड़ना चाहिए और नए प्रावधान का समर्थन करना चाहिए।
राजनीतिक रूप से बिल्कुल साफ है कि यह प्रावधान पिछड़े मतों की गोलबंदी के लिए लाया गया है। पिछले दिनों राहुल गांधी द्वारा जिस तरह लगातार मोदी राज में पिछड़ों की उपेक्षा को बड़ा राजनीतिक मुद्दा बनाया गया है उसे काउंटर करने के लिए यह प्रावधान लाया गया है। मजेदार यह है कि जिस जाति जनगणना को मोदी पाप बताते थे उसे अंततः भारी दबाव में लागू करने की बात को उन्हें स्वीकार करना पड़ा लेकिन अभी अगली जनगणना का जो प्रोफार्मा जारी किया गया उसमें जाति जनगणना को शामिल नहीं किया गया। दरअसल यूजीसी का प्रावधान एक तरह का बैलेंसिंग एक्ट है।
भाजपा नेतृत्व के लिए सांप छछूंदर वाली स्थिति है। एक ओर उसका सवर्णों का सबसे ठोस वोट बैंक है दूसरी ओर पिछड़े वोट बैंक को भी पूरी तरह वह अपने साथ लाना चाहती है। इसका विशेष संदर्भ केरल तमिलनाडु का चुनाव तो है ही जहां लाख कोशिशों के बाद भी अपनी ब्राह्मणवादी छवि के कारण वह जगह नहीं बना पा रही है। अबकी बार वह अपनी नई पिछड़ापरस्त छवि के साथ इस स्थिति को बदलना चाहती है। सर्वोपरि UP के निकट आते चुनाव को लेकर उसकी चिंता स्वाभाविक है।
भाजपा अगर 2024 में बहुमत से 20 सांसद पीछे रह गई तो इसके पीछे सबसे बड़ा कारण UP की उसकी पराजय रही। जहां अखिलेश के PDA समीकरण ने संविधान परिवर्तन की आशंका के साथ जुड़कर भाजपा की पराजय को सुनिश्चित कर दिया।भाजपा सरकार की ओर से इसीलिए इस पर सफाई दी जा रही है। शिक्षामंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने कहा कि मैं भरोसा देता हूं कि किसी के साथ भेदभाव नहीं होगा। विरोधियों का तर्क यह था कि समानता समिति में सर्वणों के लिए अनिवार्य प्रतिनिधित्व नहीं रखा गया है और इससे रिवर्स डिस्क्रिमिनेशन होगा। बहरहाल सच्चाई इसके ठीक विपरीत है। वास्तव में संभावना यह है कि हाशिए के तबकों को एक-एक प्रतिनिधित्व देने के बाद बाकी बचे सभी स्थान सवर्णों को मिल जाएंगे क्योंकि संस्था के प्रधान से लेकर तमाम वरिष्ठ प्राध्यापक उन्हीं के बीच से हैं।
इसलिए इस समिति के प्रधान से लेकर अधिकांश प्रतिनिधि सवर्ण समाज के होना तय है।
इस तर्क में कोई दम नहीं है कि कमेटी में सवर्णों का प्रतिनिधित्व नहीं सुनिश्चित किया गया है। जिस देश में विश्वविद्यालयों में कुलपति से लेकर प्रोफेसर तक 90% से अधिक हैं यह तर्क हास्यास्पद बेईमानी से अधिक कुछ नहीं है।
बहरहाल पिछड़ों को आरक्षण का झुनझुना और फिर कोर्ट द्वारा उस पर रोक मोदी भाजपा के लिए दोधारी तलवार साबित हो सकती है और भाजपा के लिए माया मिली न राम की स्थिति पैदा हो सकती है। उच्चतम न्यायालय को इस नियम में अभी भी मौजूद खामियों को दूर करते हुए और अधिक स्पष्टता के साथ तथा इसके दायरे में प्रोफेशनल शिक्षा को भी ले आते हुए एवं इसके दुरुपयोग पर रोक लगाने के समुचित प्रावधानों के साथ इस नियम को लागू करना चाहिए।
लाल बहादुर सिंह इलाहाबाद विश्वविद्यालय छात्र संघ के पूर्व अध्यक्ष हैं।)

