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छाता सादगी का प्रतीक बन गया?

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शशिकांत गुप्ते

बरसात से बचने के लिए छाते का उपयोग किया जाता है।बरसात यदि तेज गति से हो रही हो तब छाता सिर्फ सिर को बचा पाता है।सिर को छोड़ बाकी शरीर भीग ही जाता है।छाता होते हुए भीगने को विनोदपूर्ण भाषा में कहतें हैं,इज्जत के साथ भीगना।स्वामीभक्तो ने स्वामीजी को वर्षा की हल्की बूंदाबांदी के दौरान  एक हाथ में छाता पकड़े हुए लोगों से चर्चा करते देख लिया।स्वामीभक्त भावविभोर हो गए।स्वामीभक्तों ने छाते को सादगी के प्रतीक की उपमा दे दी।तेज गति से हो रही बारिश में आमजन  के हाथों छाता होते हुए भी वह भीग जाए तो ऐसे भीगने को कहतें हैं, इज्जत के साथ भीगना।एक ओर आमजन छाते से अपनी इज्जत को बचाता है।

दूसरी ओर यही छाता सादगी का प्रतीक बन जाता है।यही अंतर है,सामंती सोच में और सतही सोच में।स्वामीजी के हाथों का छाता तो दिखाई दिया,लेकिन स्वामीजी के बेशकीमती परिधान पर भक्तों की नजर नहीं गई?जो भी हो छाते का महत्व बढ़ गया है।स्वामीभक्त स्वामीजी के मुखारबिंद से निकलने वाले हरएक उदगार को  किसी ब्रह्मज्ञानी का उपदेश ही समझतें हैं।स्वामीजी ने अपने भक्तों को उपदेशात्मक मंत्र दिया है।

सत्तर वर्षो में देश में कुछ नहीं हुआ।भक्तों ने हाथों में गौमुखी थाम ली।गौमुखी एक प्रकार की थैली होती है, जिसमें हाथ डालकर माला फेरते हैं।भक्त चौबीसों घण्टों माला जपने लग गए।माला फेरने पर क्रांतिकारी संत कबीरसाहब का एक व्यंग्यात्मक दोहा है।*माला फेरत जुग भया, फिरा न मन का फेर,**कर का मनका डार दे, मन का मनका फेर।*अर्थ : कोई व्यक्ति लम्बे समय तक हाथ में लेकर मोती की माला तो घुमाता है, पर उसके मन का भाव नहीं बदलता, उसके मन की हलचल शांत नहीं होती. कबीरसाहब  की ऐसे व्यक्ति को सलाह है कि हाथ की इस माला को फेरना छोड़ कर मन के मोतियों को बदलो या फेरो.संत कबीरसाहब ने इस दोहे में मन को महत्व दिया है।

मन की बात को नहीं?मन के महत्व को इतने बेबाक तरीक़े से कबीरसाहब जैसा क्रांतिकारी संत ही कह सकता है।साहित्य समाज का दर्पण है। मन को मनुष्य के भले बुरे कर्मो का दर्पण कहा है।सवाल यह है कि,दर्पण में वास्तविकता का प्रत्यक्ष दर्शन होने पर भी कोई उसे नजरअंदाज करें तो यह दर्पण का दोष नहीं है।

यह दोष सावन के अंधे का है जिसे सभी दूर हरा ही हरा दिखता है।इसी तरह अंधभक्ति में लीन होने से ऐसे भक्त भ्रम का ऐनक पहन लेतें हैं।भ्रम के चश्मे से ही तो भक्तों को छाता सादगी का प्रतीक दिखाई दे रहा है।स्व.जसपाल भट्टीजी एक विनोद है।एक छाते के नीचे दस लोग खड़े थे,उनमें से एक भी गीला नहीं हुआ,पूछो क्यों?कारण बारिश ही नहीं हो रही थी।अंधभक्तों को ऐसे स्थिति में भी मूसलाधार  बारिश दिखाई दे सकती है?ऐसे भक्त यही गीत दिन रात गुंगनाते रहतें हैं।

*हो तुमको जो पसंद वही बात करेंगे*

*तुम दिन को अगर रात कहो, रात कहेंगे*
शशिकांत गुप्ते इंदौर

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