डॉ. विकास मानव
- मानवीय चेतना के हत्यारे बने सारे बाबा
- महज बाल- लीला, राधा- प्रसंग से व्यापार
- लाडू गोपाल के नाम पर ज्ञान का सत्यानाश
- कृष्ण होते तो पटक-पटक कर मरवाते बाबाओं को
- हमें मिलें, कृष्ण को निःशुल्क अनुभव करें
साधनारत रहकर जब हम आत्मस्थ होकर स्व-चिन्तन मे लीन होते हैं तो कृष्ण अंतस में प्रगट होते हैं।
मथुरा में कृष्ण जन्म : मथुरा शब्द मथ (मथना) उरा (उर= ह्रदय ) से बना है। उर को मथने से अर्थात आत्म चिन्तन मे लीन होने से कृष्ण प्रगट होते हैं. या यूं समझिए कि आत्म मंथन से कृष्णानुभूति या आत्मानुभूति होती है।
कारागार में कृष्ण जन्म :
यह शरीर एक जेल की तरह है जिसमें उर (हृदय) बन्द है। इसी को कृष्ण का जन्म जेल (हृदय) में होना कहा गया है। आत्मा के लिए यह शरीर एक जेल या कारागार के समान ही तो है।
सोचिये : कंस को अगर समस्या देवकी के बच्चों से थी तो वासुदेव के साथ दोनो को एक साथ रखने की क्या जरूरत थी। अलग- अलग रखता, वे सम्भोग नहीं कर पाते.
आठवें गर्भ में कृष्ण जन्म :
कंस को खतरा अगर आठवें बच्चे से ही था तो बाकि के बच्चों की निर्मम हत्या करने की क्या जरूरत थी ?
आठवें गर्भ का तात्पर्य अष्टम चरण से है। ध्यान साधना में योग के अष्टम चरण में आत्मसाक्षात्कार होता है. कृष्ण प्रगट होते हैं अर्थात् साधक को कृष्णानुभूति या आत्मानुभूति होती है।
अष्टम गर्भ से भाव लगातार अष्टांग योग में रत रहने से है जब तक आत्मानुभूति न हो जाए।
भीष्म को भी तो अष्टम गर्भ का सन्तान ही बताया गया है। आत्मस्थ होकर आत्म चिन्तन मे सतत लीन कर के मन को वासुदेव (जो देवों में बसा हो या जिस में देव बसे हों) और तन को देवकी (जो देवों की ही है) बनाना पड़ता है।
आधुनिक जड़ धर्माचार्यों ने कहानी ऐसी गढ़ी की साधना की सारी बात ही खत्म हो गई है। लोग कहानी में उलझ कर रह गए हैं. कृष्ण (आत्मा) तत्व को कभी भी समझ ही नहीं पाते। बस जय श्री कृष्ण, राधा कृष्ण कह के धर्म की दुकानदारी चल रही है।
आधुनिक युग में वैदिक आख्यान का तत्वार्थ पूर्ण रूप से खो गया है। गीता (४/33, ३४) में कहा गया है कि सभी यज्ञों में ज्ञान यज्ञ ही श्रेष्ठ है।
अपने देश वालों की बात तो छोड़िए, ये जो विदेशों से खुले विचारों वाले भोले भाले लोग आते हैं उन से भी अगर कोई कह दे कि कृष्ण जिनको आप मनुष्य या महा पुरुष या विष्णु का अवतार समझते हो वह वास्तव में आत्मा का ही नाम है तो वे उदास और भ्रमित हो जाते हैं।
जिन धर्माचार्यों के आश्रमों में उनकी दीक्षा होती है वहां उनको कथाओं के रंग में इस प्रकार रंग दिया जाता है कि वे खुले दिमाग से कुछ सोच ही नहीं पाते हैं। बस सड़कों पर कृष्णा कृष्णा गाते रहते हैं। आत्म दर्शन के लिए खुद कोई साधना या अभ्यास करने की बात सोचते ही नहीं हैं।
आधुनिक काल के डपोरशंख धर्माचार्यों ने किस प्रकार इन रहस्य कथाओं को उलझा दिया है वह कृष्ण के ऊखल से बांधे जाने वाली कहानी में देखी जा सकती है। यशोदा कृष्ण को रस्सी से ऊखल में बांध देती है और खुद काम में लग जाती है। थोड़ी देर बाद देखती है कि वो ऊखल चल रहा है। यशोदा डर जाती है और बाकी की कहानी आप सभी जानते ही हो। धर्माचार्य इसको बाल कृष्ण की लीला बता के रस ले ले के सुनाते हैं। अब तो लाडू गोपाल की दुकानदारी भी जोड़ दी गई. अरबों का व्यापार खड़ा हो गया. मनावीय चेतना को खा रहे हैं ये गटर के कचरे बाबा. कृष्ण होते तो बलराम से पटक- पटक कर मरवाते इन्हें.
ऊखल में कृष्ण का भाव क्या है?
कृष्ण स्वयं आत्मा हैं। कृष्ण को ऊखल से बांधने का मतलब ऊखल में आत्मा का प्रवेश हो जाना। आत्मा के प्रवेश हो जाने के कारण वह ऊखल प्राणवान हो गया और सजीव होकर चलने लगा।
कृष्ण (आत्मा) को जब रस्सी खोलकर यशोदा ने निकाल लिया तो वही ऊखल फिर से निर्जीव होकर जमीन पर गिर गया।
इस वैज्ञानिक बात को कथा वाचक बता नहीं पाते क्योंकि उनके दिमाग में कृष्ण आत्मा नहीं लीला करने वाला बच्चा है जिसको बार बार भगवान बताकर धंधा करना है।
मूलभूत रहस्य कथाओं में साधना का सार है– “सोहम.” मैं वही हूं या वह ही मैं हूं। मात्र विशुद्ध आत्मा स्वरूप।
चिदानंद रूपः शिवोहम शिवोहम।आगे यही सोहम हंस: (आत्मा का पर्यायवाची) हो जाता है।
लेकिन अन्दर मे जब अहंकार (महिषासुर) जगता है तो पूछता है– “किमस:?” कौन वह। इसी किमस: को कंस कहा गया है।
अहंकारी मनुष्य किसी की सुनता नहीं है। वह तो पत्थर के मूर्ति मे भी प्राणप्रतिष्ठा करने के लिए अड़ जाता है। जिस दिन आत्मा (कृष्ण) दुत्कारती है उस दिन अहंकार (कंस) खत्म हो जाता है। अगर ऐसा नहीं होता है तो प्रकृति (माया) में स्थिति पुरुष (आत्मा) उसको मार देती है।
यही है गीता का सम्भवामि युगे युगे। (चेतना विकास मिशन).

