Site icon अग्नि आलोक

*बेरोजगारी और पलायन का बिहार के साथ चोली-दामन जैसा रिश्ता* 

Share

प्रत्यक्ष मिश्रा

बेरोजगारी और पलायन का बिहार के साथ चोली-दामन जैसा रिश्ता जुड़ा है। पिछले दो विधानसभा चुनावों में रोजगार और जीविका को मतदाताओं की सबसे बड़ी चिंता के रूप में देखा गया। लोकनीति-सीएसडीएस द्वारा किए गए पोस्ट-पोल सर्वे के अनुसार, 2015 में केवल 9.1% मतदाताओं ने बेरोज़गारी/रोजगार को सबसे महत्वपूर्ण मुद्दा माना था, लेकिन 2020 में यह आंकड़ा 20% तक बढ़ गया, जिससे यह मतदाताओं के लिए दूसरा सबसे महत्वपूर्ण मुद्दा बन गया है। चूंकि रोजगार की स्थिति अभी भी गंभीर है इसलिए इस बार के चुनाव में भी यह मुद्दा मतदाताओं की प्राथमिकताओं में प्रमुख बने रहने की संभावना है।

पिछले दस साल में बिहार की अर्थव्यवस्था, देश की औसत रफ्तार से भी पीछे रही है, जहां पूरे देश की ग्रोथ करीब 5.6% रही, वहीं बिहार सिर्फ 5% पर अटका रहा, लेकिन ग्रोथ तभी होगी जब राज्य में निवेश और रोजगार होंगे। दुर्भाग्य ये है कि राज्य सरकार की उबाऊ और बेबस नीतियों ने किसी भी एक सेक्टर को पनपने नहीं दिया, जो राज्य की मजबूत नींव बन सके। 

देखा जाए तो बिहार की अर्थव्यवस्था अभी भी छोटी और सीमित है। राज्य की अर्थव्यवस्था ₹10 लाख करोड़ के आसपास है, जोकि आबादी के हिसाब से बेहद कम है। औद्योगिक उत्पादन और भी निराशाजनक है, 2023-24 में बिहार में केवल 3,386 फैक्ट्रियां थी, जो देश की कुल फैक्ट्रियों का केवल 1.3% है और इन फैक्ट्रियों में काम करने वाले श्रमिकों की संख्या सिर्फ 1.17 लाख (0.75%) है।

ये आंकड़े स्पष्ट बताते हैं कि बिहार में औद्योगिक आधार बहुत कमजोर है, जबकि यह भारत का तीसरा सबसे अधिक आबादी वाला राज्य है। 

कृषि की रीढ़ टूटने से किसान के कंधों पर बढ़ा बोझ 

बिहार की अर्थव्यवस्था को ऑक्सीजन देने वाला कृषि क्षेत्र आज खुद गहरे संकट में है। भूमि के लगातार खंडित होने, निवेश की कमी और फसल विविधता को प्रोत्साहन देने वाली सरकारी नीतियों के अभाव ने खेती को पीछे धकेल दिया है। छोटे और सीमांत किसान लगातार संकट से जूझ रहे हैं, न लागत निकल पा रही है, न दाम मिल रहे हैं।

पिछले पांच वर्षों में कृषि संकट को लगातार “गंभीर” (5 में से 4) स्तर पर आंका गया है, जिससे किसानों पर कर्ज, गरीबी और ग्रामीण संकट का बोझ और बढ़ता जा रहा है। बिहार में 90% से अधिक किसानों के पास 1 हेक्टेयर से कम जमीन है, जिसमें जोत अक्सर छोटे प्लॉट्स में और विभाजित होती है। यह लागत लाभ वाली अर्थव्यवस्था की राह रोकती है और अधिकांश लोगों के लिए आधुनिक खेती को अव्यावहारिक बनाती है।

राज्य में 50% लोग कृषि/खेतिहर मजदूर और मत्स्य पालन का काम करते हैं, लेकिन इस सेक्टर को मुनाफे का सौदा ना बना पाने के कारण रोजगार पैदा करने की उम्मीद इधर भी नजर नहीं आती। 

उद्योग और मैन्युफैक्चरिंग में केवल 5.7% लोग ही काम कर रहे हैं। मतलब कि राज्य में ज्यादातर लोग कृषि और असुरक्षित रोजगार में लगे हैं, जबकि स्थिर और औद्योगिक नौकरियों की हिस्सेदारी बहुत कम है।

वहीं बिहार के 42.5% किसान परिवार कर्ज में हैं, जिसमें 70% कर्ज साहूकारों और बिचौलियों से लिया जाता है, जो किसानों को गरीबी और कर्ज के चक्र में फंसा देता है। छोटे किसानों के पास अक्सर सरकारी खरीद तक पहुंच नहीं होती है और स्थानीय मंडियों में कम दाम मिलते हैं; कई किसान न्यूनतम समर्थन मूल्य से नीचे की कीमतों पर उपज बेचने की शिकायत करते हैं। 

श्रम पलायन के चिंतित करते रुझान 

भारत में रोजगार के लिए बाहर जाने वाले प्रवासियों की दर जहां सबसे ज्यादा है, उनमें से एक बिहार भी है। राज्य की अधिकांश आबादी अब भी कृषि पर निर्भर है, अन्य क्षेत्रों में रोजगार सृजन में विविधता बहुत कम है और कुल मिलाकर नौकरियों की कमी है। भयंकर बेरोजगारी और सीमित आर्थिक अवसरों ने बड़े पैमाने पर श्रम पलायन को बढ़ावा दिया है; बिहार लगातार उत्तर प्रदेश के बाद दूसरे स्थान पर रहा है, जहां काम और रोजगार की तलाश में 75 लाख से अधिक लोग बाहर जा चुके हैं, इसको यदि आबादी के अनुपात में देखा जाए तो बिहार ऐसा पहला राज्य है। 

बिहार में पलायन केवल राज्य के बाहर ही नहीं होता, बल्कि अंदर भी होता है – जहां एक मजदूर अपने ही जिले से दूसरे जिले में सिर्फ कुछ दिन की मजदूरी के लिए भटकता है।

जैसे मखाना मजदूरों की बात करें तो मधुबनी, दरभंगा, सहरसा और पूर्णिया के तालाबों में जो मखाना पैदा होता है, वो देशभर में बिकता है। सरकार इसे “सुपरफूड” बताती है, लेकिन जिनके पसीने से वो मखाना निकलता है, उनके लिए रोजगार टिकाऊ  नहीं है। मौसम खत्म होते ही मजदूरों के पास कोई दूसरा काम नहीं बचता। कई मजदूर अपने परिवार को साथ नहीं ले जा पाते। घर की औरतें खेतों में मजदूरी करती हैं, बच्चे अधूरी पढ़ाई छोड़ देते हैं।

यह कहानी सिर्फ मखाना मजदूरों की नहीं; बल्कि ईंट भट्ठों, निर्माण स्थलों, खेतों और तालाबों में काम करने वाले लाखों मजदूरों की भी है। 

राज्य की वित्तीय स्थिति पर बढ़ता दबाव

वित्त वर्ष 2025-26 में राज्य सरकार ₹1.12 लाख करोड़ रुपये वेतन और पेंशन के रूप में खर्च करेगी, जोकि कुल व्यय का एक तिहाई से ज्यादा (36.5%) है, इन खर्चों को ‘प्रतिबद्ध व्यय’कहा जाता है – यानी ऐसे अनिवार्य खर्च, जो टाले नहीं जा सकते। जब ये खर्च बढ़ते हैं तो सरकार के पास सड़क, स्कूल, बिजली जैसी विकास की चीजों पर खर्च करने के लिए कम पैसे बचते हैं।

वहीं 2025-26 में निवेश और निर्माण पर किए जाने वाला खर्च ₹40,532 करोड़ प्रस्तावित है, जो पिछले वर्ष के मुकाबले 7% कम है। जबकि रोजगार और निवेश करने की दृष्टि से बढ़ना चाहिए था। 

यह तब है जब बिहार को निवेश और बुनियादी ढांचे में भारी बढ़ोतरी की आवश्यकता है, ताकि राज्य में रोजगार के अवसर बन सकें और गरीबी से बाहर निकलने का मार्ग तैयार हो सके। 

पीआरएस लेजिस्लेटिव रिसर्च के मुताबिक़, बिहार का 2025-26 का बजट राजकोषीय घाटा GSDP का 3% (₹32,718 करोड़) दिखाता है, लेकिन 2024-25 में संशोधित अनुमान के अनुसार, राजकोषीय घाटा का 9.2% तक पहुँच गया था, यानी बजट अनुमान से तीन गुना ज्यादा। इसका मतलब यह है कि राज्य सरकार के सामने दोहरी चुनौती है – राजकोषीय घाटे को संतुलित करना और निवेश बढ़ाना।

लेकिन समस्या ये है कि बिहार की वित्तीय स्थिति पहले से ही सीमित राजस्व और ऊँचे प्रतिबद्ध खर्च के बोझ से दबाव में है। दूसरी तरफ, मुख्यमंत्री महिला रोजगार योजना के तहत, राज्य सरकार ने 25 लाख महिलाओं को ₹10,000 की राशि दी है, कुल 7500 करोड़ रुपये की राशि इस योजना के लिए आवंटित की गई है, ताकि महिलाएं छोटे व्यवसाय शुरू कर सकें। यदि यह व्यवसाय सफल होते हैं तो उन्हें अतिरिक्त ₹2 लाख की सहायता भी दी जाएगी। 

अब सवाल यह है कि ये योजनाएं ‘मुफ़्तखोरी’ कहलाए या नहीं, यह बहस कानूनी रूप से मायने नहीं रखती, क्योंकि ‘फ्रीबी’ शब्द की कोई स्पष्ट कानूनी परिभाषा नहीं है, लेकिन हाँ, इन योजनाओं से सरकार का खर्च बढ़ जाएगा। जो पैसा खर्च होगा, वह सीधे लोगों की जरूरतों या रोजमर्रा के उपयोग में जाएगा। लेकिन इस खर्च से सड़क, स्कूल, बिजली, अस्पताल जैसी लंबी अवधि की चीज़ें नहीं बनेंगी, यानी ये निवेश नहीं बल्कि खर्च है।

जब केंद्र सरकार पूंजीगत व्यय बढ़ाने और निजी निवेश को प्रोत्साहित करने पर जोर दे रही है, ऐसे समय में यदि बिहार का राजस्व व्यय अनुपात बढ़ता है तो यह राज्य की आर्थिक सेहत और दीर्घकालिक विकास नीति के लिए चिंता का विषय होना चाहिए। 

विकास का एजेंडा 

देश के हर राज्य की तरह, बिहार के सामने भी सबसे बड़ी चुनौती नौकरियां पैदा करने की है। राज्य के 3.16 करोड़ लोगों ने रोजगार की तलाश में सरकार के ई-श्रम पोर्टल पर पंजीकरण कराया है, जो देश में आबादी के हिसाब से काम खोज रहे लोगों का सबसे बड़ा आंकड़ा है।

वहीं सरकार के पीएलएफएस के हाल ही आंकड़ों के अनुसार, अप्रैल-जून तिमाही में बिहार की बेरोजगारी दर 5.2 प्रतिशत थी, जो कि राष्ट्रीय औसत 5.4 प्रतिशत (15 वर्ष या उससे अधिक आयु के लोगों के लिए) से थोड़ा कम है। सतही तौर पर देखने पर तो स्थिति ठीक लगती है, लेकिन यह एक भ्रम है। 

रोजगार की सही तस्वीर समझने के लिए केवल बेरोजगारी का आंकड़ा देखना काफी नहीं है। इसके लिए तीन मुख्य बातें देखनी जरूरी है:

  1. कितने लोग काम कर रहे हैं/श्रमिक जनसंख्या अनुपात – यह बताता है कि काम करने लायक लोगों में से कितने लोग असल में नौकरी या किसी काम में लगे हुए हैं। बिहार का डब्ल्यूपीआर भी 46.2% है, जो राष्ट्रीय औसत 52% से कम है। यानी बिहार में काम करने लायक लोगों में नौकरी पाने वाले लोग देश की तुलना में काफी कम हैं।
  2. कितने लोग काम कर रहे हैं/श्रम बल भागीदारी – यह दिखाता है कि काम करने लायक लोगों में से कितने लोग या तो काम कर रहे हैं या नौकरी की तलाश में हैं। बिहार में श्रम बल भागीदारी दर केवल 48.8% है, यानी राज्य की कार्यशील आयु वर्ग की लगभग आधी आबादी ही रोजगार की तलाश में है या काम कर रही है। यह दर राष्ट्रीय औसत से कम है, जो 58% के आसपास है।
  3. बेरोजगारी दर – यह बताती है कि काम करने वाले लोगों में से कितने लोग बेरोजगार हैं और सक्रिय रूप से काम ढूंढ रहे हैं।

बिहार जैसे नौ बड़े और कम-आय वाले राज्यों (जैसे असम, छत्तीसगढ़, झारखंड, मध्य प्रदेश, ओडिशा, राजस्थान, उत्तर प्रदेश, पश्चिम बंगाल) से तुलना करने पर बिहार सबसे निचले पायदान पर है।

वहीं सबसे  ज्यादा महत्वपूर्ण है, रोजगार की गुणवत्ता को देखना। केवल 8.7% लोग नियमित वेतनभोगी नौकरियों में हैं, जो सबसे कम है, जबकि लगभग 24% लोग अस्थायी मजदूरी पर हैं, यानी सुरक्षित और स्थिर नौकरियां बहुत कम हैं।

यह स्थिति एनडीए के दावों से बिल्कुल विपरीत है, जो अक्सर अर्थव्यवस्था को औपचारिक बनाने की उपलब्धि बताते हैं। बिहार में रोजगार का बड़ा हिस्सा अभी भी अनौपचारिक, असुरक्षित और कम वेतन वाला है। खैर, अब से लगभग 1 महीने बाद, बिहार की जनता तय करेगी कि अगले पांच वर्षों तक उनके भाग्य को कौन दिशा देगा।

(प्रत्यक्ष मिश्रा पब्लिक पॉलिसी रिसर्चर हैं।)

Exit mobile version