देवेंद्र भाले
बेरोजगारी इस देश की विकट समस्या हमेशा से रही है लेकिन वर्तमान सरकार की कुनीतियों की वज़ह से और विकराल होती जा रही है। हालत इतने ख़राब है कि सही आंकड़े तक प्रस्तुत नहीं हो पा रहे हैं। फ़र्जी आंकड़े दिखा कर कागजों पर बेरोजगारी कम हो रही हैं, जिसका ज़मीनी हक़ीक़त से दूर-2 तक कोई नाता नहीं है। रोजगार पंजीयन कार्यालयों ने तो अब बेरोजगारों का पंजीयन तक बंद कर दिया है क्योंकि उस पंजीयन से क्या फ़ायदा ?
जब कोई नौकरियां देने वाला हीं न हो। अब देखिए पहले रेलवे की कितनी भर्तियाँ आती थी। उन भर्तियों के द्वारा खासकर बीमारू राज्यों के बहुत सारे युवा चुनकर जाते थे। अब जब से भाजपा की सरकार आयी है, रेलवे के अधिकांश कार्यों को एक-2 कर निजी हाथों में सौंपा जा रहा है, नतीजतन भर्तियाँ कम होती जा रही हैं। जैसे कि पहले स्टेशनों पर साफ़-सफाई हेतु स्वीपर बहाल होते थे, अब वो काम निजी कंपनियां को दे दिया गया है। निजी कंपनियां हीं रख-रखाव करेंगी। निजी कंपनियों ने पैसा ख़र्च कर टेंडर हासिल किया है,फ़िर उसे मुनाफ़ा भी कमाना है, फिर वो कैसा काम करेगी, खुद सोचें। जहां 5 आदमी लगेंगे ,1 रखा है, जहां 5 लिटर क्लीनर खर्च होता था, वहां 2 लीटर होने लगा, वो विभाग की भर्तियाी भी लगभग खत्म हो गयी। बाकी विभाग का भी वही हाल है, एक लम्बा अरसा बीत गया जब ग्रुप B,C की भी वेकैंसी आयी हो।
रेलवे के बाद अन्य विभाग का भी वही हाल है, चाहे एसएससी हो या अन्य विभाग। 2013 के बाद से भर्तियाँ साल दर साल कम होती चली गयी।लेकिन सरकार को इस से मतलब कहां, उन्हें न तो बेरोजगार युवाओं का दर्द दिखता है और न ग़रीबी की दलदल में फंसे करोड़ों लोग। बस उनमें फ़र्जी आँकड़े दिखा-2 कर पीठ थपथपाने की महारथ दिखती है। CMIE के आंकड़े बताते हैं कि ग्रामीण भारत के बजाय शहरी क्षेत्रों में ज्यादा बेरोजगारी पनपी है। मई में देश की कुल बेरोजगारी दर 11.6%, वहीं शहरी क्षेत्र में बेरोजगारी दर 13.9% जबकि ग्रामीण क्षेत्र में 10.6% थी।
अचंभे की बात तो यह है कि जो हरियाणा कभी “औद्योगिक हब” कहा जाता था, वो आज राज्यों की श्रेणी में “बेरोजगारी में शीर्ष” पर चला गया है, जिसकी बेरोजगारी दर 35.1% थी। जबकि 28% के साथ राजस्थान दूसरे और 27.3% के साथ दिल्ली तीसरे और 25.7% के साथ गोवा चौथे स्थान पर था। आलम ये है कि हर साल एक करोड़ नये बेरोजगार युवाओं की फ़ौज खड़ी हो रही है। ऐसे में रोजगार देने वाले संस्थानों को कॉरपोरेट के हाथों निजीकरण के नाम पर बेचना कहाँ तक जायज़ है!
विडंबना देखिए कि सरकार के पास बेरोजगारी कम करने के लिये वैसा हीं उपाय है, जैसा “पेट्रोलियम मंत्री” की बढ़ते पेट्रोल के दाम पर बेतुकी दलीलें हैं। लेकिन अफ़सोस फ़र्क़ किसे पड़ता है,किसी को नहीं। जब आवाम को बढ़ती बेरोजगारी से कोई फ़र्क़ हीं न पड़ता फ़िर सोए हुए सत्ताधीशों को भला क्या फ़र्क़ पड़ेगा ?
“प्रिंट नामक न्यूज़ एजेंसी” के मुताबिक “प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी जी” ने 2015 में कभी जेटली जी के 5-6 PSUs को छोड़कर बाकी सभी के “निजीकरण” के प्रस्ताव को यह कह कर ख़ारिज कर दिया था कि इस से सरकारी योजनाओं का सफलतापूर्वक क्रियान्वयन ठीक से नहीं हो पाएगा। उन्ही मोदी जी का 2021 आते-2 ह्रदय परिवर्तन हो गया और गलत अर्थनीतियों की वज़ह से लकवाग्रस्त हुई अर्थव्यवस्था को बचाने के लिये “आत्मनिर्भर” बनाने के नाम पर आज सम्पत्तियों को औने-पौने दाम में बेचने की होड़ मची है। लेकिन इससे भला होगा किसका ? कॉरपोरेट का या आम आदमी का या बेरोजगार युवाओं का जो इन संस्थानों में नौकरी पाने के लिये कल कड़ी मेहनत करते थे ? अब समय आ गया है कि राजस्व उपार्जन के नये स्रोंतों पर विचार हो न कि आसान दिख रही विनिवेशीकरण के द्वारा धन उगाही की योजनाओं पर हीं केवल आश्रित हों। बाजार में जब तक माँग नहीं बढ़ेगी,तब तक प्रोडक्शन नही बढ़ेगा, प्रोडक्शन नहीं बढ़ेगा तो आर्डर ज्यादा नहीं मिलेगा, आर्डर नहीं मिलेगा तो फैक्ट्रियाँ कम चलेंगी, फैक्ट्रियाँ कम चलेंगी तो मजदूर कम लगेगा, मजदूर कम लगेगा तो रोजगार के अवसर घटेंगे मतलब बेरोजगारी बढ़ेगी। और बेरोजगारी बढ़ेगी तो बाजार से क्रय कम होंगे, अभी ठीक वही हो रहा है। और एक बड़ा वर्ग जिसे “मध्यमवर्ग” कहते हैं उसमें से जो संगठित क्षेत्र में है, अधिकांश सरकारी या सार्वजनिक उपक्रमों में कार्यरत है,अगर उसे हीं सरकार बेचेगी तो परिणाम और ज्यादा भयंकर होंगे। भले ही वो शुरुआत में न दिखे लेकिन दूरगामी प्रभाव बेहद नुकसानदेह होंगे।
इसलिए सरकार को निजीकरण की नीति पर दुबारा पुनर्विचार करनी चाहिए। अमेरिका इस का ताजा उदाहरण है, जहां के नए राष्ट्रपति ने सार्वजनिक उपक्रमों के अति विनिवेशीकरण की पूर्व सरकारों की गलती को स्वीकार किया है।विनिवेशीकरण से न केवल रोजगार क्षय होता अपितु सम्भावनाएँ कम होती हैं, सरकारी नियंत्रण समाप्त होता हैं, टैक्स की चोरी शुरू होती है और कार्पोरेट का बाजार पर एकछत्र नियंत्रण होता है।जिससे ग़रीब और मध्यमवर्गीय लोगों की पहुँच खत्म हो जाती है, एक समानांतर अर्थव्यवस्था प्रचलन में आती है। मुद्रास्फ़ीति की सम्भावनाएँ बढ़ जाती हैं। गरीब दिन ब दिन और गरीब तथा अमीर और अमीर होते चले जाते हैं। उनके बीच की खाई और ज्यादा चौड़ी होती चली जाती है।

