-तेजपाल सिंह ‘तेज’
आप जानते हैं कि देश के स्वतंत्रता संग्राम में राष्ट्रीय आत्मरक्षा बलों का कोई योगदान नहीं था। जब देश महात्मा गांधी और भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अपहरण के बाद आज़ादी की लड़ाई लड़ रहा था, तब राष्ट्रीय आत्मरक्षा बलों के प्रमुख से लेकर राष्ट्रीय आत्मरक्षा बलों के सेनापति तक, सभी उससे बहुत दूर खड़े थे।
यही कारण है कि राष्ट्रीय आत्मरक्षा बलों के पास स्वतंत्रता संग्राम का कोई महानायक नहीं है। इस कलंक से मुक्ति पाने के लिए, राष्ट्रीय आत्मरक्षा बल और उसके वरिष्ठ अधिकारी लगातार यह प्रयास करते रहते हैं कि किसी तरह देश को यह समझाया जाए कि राष्ट्रीय आत्मरक्षा बल भी स्वतंत्रता संग्राम में शामिल थे। इसी तरह, स्वतंत्रता संग्राम के प्रतीकों, चाहे वह वंदे मातरम हो या तिरंगा झंडा, पर संघ और उसके राजनीतिक दल के सदस्य भारतीय जनवादी पार्टी के नेता सिर झुकाते रहते हैं।
नतीजा यह है कि इस कलंक को मिटाने की जितनी कोशिश की जाती है, यह कलंक उतना ही गहरा होता जाता है। क्योंकि ऐतिहासिक तथ्य यह है कि राष्ट्रीय आत्मरक्षा बलों को आज़ादी की लड़ाई में अपने नाखून कटवाने का भी मौका नहीं मिला था। ताज़ा मुद्दा तिरंगा है।
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत ने दावा किया है कि संघ ने हमेशा तिरंगे का सम्मान और सुरक्षा की है। उनका कहना है कि ईश्वर और तिरंगा आमने-सामने नहीं हैं। संघ तिरंगे का सम्मान शुरू से ही करता रहा है।
सच तो यह है कि डॉ. मोहन भागवत का बयान ऐतिहासिक तथ्यों के आधार पर पूरी तरह ग़लत है। आइए डॉ. मोहन भागवत का बयान सुनें। भागवत स्वतंत्र भारत के ध्वजवाहक हैं लेकिन फिर गांधीजी ने बीच में आकर किसी कारण से तीन रंग कह दिए। सबसे ऊपर, भागवत। ठीक है। यह स्वतंत्र भारत के सार्वभौम समप्रभु सत्व का ध्वज होगा। हम इसे राष्ट्रध्वज कहते हैं। अपनी स्थापना के समय से ही संघ ने सदैव इस तिरंगध्वज के साथ खड़ा होकर इसका सम्मान किया है, इसे श्रद्धांजलि अर्पित की है और इसकी रक्षा की है।
रंगों से सजी आत्मा का प्रतीक:
भारत का तिरंगा—केवल तीन रंगों का वस्त्र नहीं, यह उन असंख्य आत्माओं की साँसों से बुना गया प्रतीक है जिन्होंने “वंदे मातरम्” की पुकार में अपने प्राण अर्पित कर दिए। यह झंडा खेतों की हरियाली का, बलिदान की रक्तिम आभा का और सत्य-शांति की उजली किरण का संगम है। यह उस भारत की पहचान है जो भूगोल से नहीं, बल्कि भाव से बंधा हुआ है। पर इतिहास का एक अध्याय ऐसा भी है, जिसमें इस तिरंगे को सच्चा मानने से इनकार किया गया।
जिस ध्वज ने स्वतंत्र भारत का मस्तक ऊँचा किया, उसके प्रति राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का रवैया लंबे समय तक संदेह और अस्वीकार का रहा।
भारत का राष्ट्रीय ध्वज केवल तीन रंगों का कपड़ा नहीं, बल्कि करोड़ों भारतीयों के स्वाभिमान, संघर्ष और बलिदान का प्रतीक है। तिरंगे की हर लकीर में आज़ादी की कहानी दर्ज है। परंतु इस ध्वज के प्रति एक संगठन — राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) — का दृष्टिकोण सदा से विवादों के घेरे में रहा है। संघ ने न केवल तिरंगे को अपनाने में अनिच्छा दिखाई, बल्कि लंबे समय तक उसका सार्वजनिक विरोध भी किया। इस विमर्श का इतिहास 1925 से लेकर आज तक फैला हुआ है।
स्वतंत्रता संग्राम और संघ की दूरी
बीसवीं शताब्दी का तीसरा दशक भारत के संघर्ष का तीव्रतम समय था। गांधी जेल में थे, जवाहरलाल सड़कों पर, भगत सिंह फांसी के फंदे पर और असंख्य युवक असहयोग आंदोलन में नारे लगा रहे थे। हर गली, हर ग्राम में तिरंगा उठाए देशवासी स्वतंत्रता की अलख जगा रहे थे। इन्हीं दिनों 1925 में नागपुर में एक नया संगठन जन्म लेता है—राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ।
डॉ. हेडगेवार इस संगठन के निर्माता थे, और उनका उद्देश्य था “चरित्रवान व्यक्तियों का निर्माण”। परंतु उनका यह संगठन, स्वतंत्रता आंदोलन की मुख्यधारा से दूर ही रहा। न कोई सत्याग्रह, न कोई जेल यात्रा, न कोई जनांदोलन—संघ अपने “सांस्कृतिक राष्ट्रवाद” के दायरे में सीमित रहा। देश जब आजादी के रण में था, संघ शाखाओं में सीटी और दंड चल रहे थे।
यह ऐतिहासिक दूरी आज भी कई प्रश्नों को जन्म देती है।
जब पूरा देश महात्मा गांधी के नेतृत्व में विदेशी हुकूमत के खिलाफ संघर्षरत था, उस समय आरएसएस अपने संगठन-निर्माण में व्यस्त था। संघ ने न तो असहयोग आंदोलन में भाग लिया, न नमक सत्याग्रह में, न ही भारत छोड़ो आंदोलन में।संघ के संस्थापक डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार, यद्यपि प्रारंभिक दौर में कांग्रेस से जुड़े रहे, पर संघ की स्थापना के बाद उन्होंने गठन को राजनीतिक आंदोलनों से दूर रखा। संघ का यह दृष्टिकोण था कि “संगठन निर्माण ही राष्ट्र निर्माण का आधार है” — पर इतिहास यह भी बताता है कि इस नीति ने उन्हें स्वतंत्रता-संघर्ष की मुख्यधारा से लगभग पूरी तरह अलग कर दिया।
तिरंगे के प्रति अस्वीकार और ‘भगवा’ का आग्रह (1925–1947):
1930 में डॉ. हेडगेवार ने संघ की शाखाओं को आदेश दिया कि “राष्ट्रध्वज के रूप में भगवा ध्वज की पूजा करो”। उनके अनुसार भगवा रंग त्याग और तप का प्रतीक था — वह रंग जिसने प्राचीन सन्यासियों को गौरव दिया। परंतु यही आग्रह आगे चलकर एक विचारधारात्मक जड़ता में बदल गया। 14 अगस्त 1947 — आज़ादी की पूर्व संध्या। जब पूरा देश उल्लास से भरा था, तब संघ के मुखपत्र ‘ऑर्गनाइज़र’ में एक संपादकीय छपा —“राष्ट्र को दिया गया नया ध्वज अशुभ और हानिकारक है।” कल्पना कीजिए, यह वही समय था जब असंख्य माँएँ अपने पुत्रों की शहादत पर तिरंगे में लिपटे पार्थिव शरीर को निहार रही थीं। और दूसरी ओर एक संगठन उस झंडे को “अशुभ” कह रहा था। संघ के द्वितीय सरसंघचालक गुरु गोलवलकर ने अपने ग्रंथ “बंच ऑफ थॉट्स” में लिखा—“एक दिन यह देश भगवा ध्वज को ही राष्ट्रीय ध्वज मानेगा।”
यानी स्वतंत्र भारत के प्रतीक रूप में भी उनके मन में केवल भगवा ही था, न कि तीन रंगों का यह तिरंगा।
स्वतंत्रता के बाद : तिरंगे से परहेज़:
1947 में जब भारत स्वतंत्र हुआ, देशभर में तिरंगे के उत्सव हुए। पर नागपुर स्थित आरएसएस मुख्यालय में झंडा फहराने का कोई कार्यक्रम नहीं हुआ। सिर्फ दो मौकों पर — 15 अगस्त 1947 और 26 जनवरी 1950 को — संघ ने राष्ट्रीय ध्वज फहराया, वह भी सरकार के दबाव में। उसके बाद दशकों तक संघ मुख्यालय पर तिरंगा नहीं फहराया गया। यहां तक कि 2001 में जब तीन युवा शाखा स्थल पर झंडा लेकर पहुँचे और बलपूर्वक उसे फहराने की कोशिश की, तो उन पर संघ प्रबंधन ने मुकदमा दर्ज करवा दिया। यह विडंबना थी — जिस ध्वज के लिए लाखों स्वतंत्रता सेनानियों ने बलिदान दिया, उसी ध्वज को फहराने वालों पर देशभक्ति का दावा करने वाला संगठन मुकदमा कर रहा था।
जब 15 अगस्त 1947 की सुबह लाल किले पर तिरंगा फहराया गया, तब पूरा देश गर्व से झूम उठा। पर नागपुर स्थित आरएसएस मुख्यालय उस उल्लास में शामिल नहीं हुआ। सिर्फ दो मौकों पर—15 अगस्त 1947 और 26 जनवरी 1950—संघ कार्यालय में तिरंगा फहराया गया।
उसके बाद दशकों तक मुख्यालय पर यह दृश्य नहीं दिखा। इतिहास में दर्ज है कि 2001 में जब तीन युवकों ने संघ परिसर में जाकर तिरंगा फहराने की कोशिश की, तो संघ के अधिकारियों ने उनके विरुद्ध कानूनी कार्रवाई कर दी। यह दृश्य उस झंडे के लिए अपमानजनक था, जो हर शहीद के कंधे पर गर्व से फहराया गया था।
समय का दबाव और प्रतीक की स्वीकृति:
2002 में सर्वोच्च न्यायालय ने हर नागरिक को राष्ट्रीय ध्वज फहराने का अधिकार दिया।
इस निर्णय के बाद आरएसएस ने भी झंडा फहराने की परंपरा आरंभ की। अब संघ के कार्यालयों और शाखाओं में भी तिरंगा दिखाई देने लगा। परंतु आलोचकों का कहना है कि यह स्वीकृति श्रद्धा की नहीं, परिस्थितियों की थी। जनमानस में बढ़ती आलोचना, और राष्ट्रवाद के बदलते विमर्श ने संघ को यह कदम उठाने पर विवश किया।अब शाखाओं में तिरंगे के साथ तस्वीरें आती हैं, बच्चों के हाथों में वही तीन रंग लहराते हैं। पर आलोचक पूछते हैं—क्या यह परिवर्तन श्रद्धा का था या विवशता का? क्योंकि विचारों की तह में आज भी वही पुराना आग्रह कहीं जीवित है।
तिरंगे की जीत : एक राष्ट्र की आत्मा की विजय: आज तिरंगा केवल सरकारी भवनों पर नहीं, हर दिल में फहरता है। वह हमारे किसान की मिट्टी पर लहराता है, हमारे सैनिक के सीने पर झलकता है, हमारे वैज्ञानिक की सफलता पर चमकता है। यह झंडा किसी दल का नहीं, किसी विचार का नहीं — यह भारत की आत्मा का वस्त्र है। संघ ने अंततः इसे अपनाया, पर यह समय की पुकार थी, अंतरात्मा की नहीं।
इतिहास के पन्नों में लिखा जाएगा—“तिरंगे ने सबको अपनी छाँव में ले लिया, पर सबने उसे अपना दिल नहीं दिया।” फिर भी यह झंडा सबका है। वह किसी से बैर नहीं रखता। जिस दिन कोई उसे अस्वीकार भी करता है, वह तब भी उसी के लिए फहरता है। क्योंकि तिरंगा केवल ध्वज नहीं — वह भारत की सामूहिक चेतना है, जहाँ केसरिया त्याग सिखाता है, सफेद सत्य का मार्ग दिखाता है, और हरा रंग जीवन और विश्वास का प्रतीक बन जाता है।
फिर भी जारी है भगवा की आकांक्षा:
भले ही आज संघ तिरंगे के साथ खड़ा दिखता है, पर समय-समय पर उसके नेताओं के बयानों से ‘भगवा को राष्ट्रीय ध्वज बनाने’ की इच्छा झलकती है। कर्नाटक के वरिष्ठ भाजपा नेता के.एस. ईश्वरप्पा ने कुछ वर्ष पूर्व कहा था —“एक दिन भगवा ध्वज लालकिले पर फहरेगा।” यह वक्तव्य न केवल इतिहास की स्मृति को झकझोर देता है, बल्कि यह भी बताता है कि तिरंगे की स्वीकारोक्ति संघ के लिए आज भी पूर्ण हृदय से नहीं हुई है।
निष्कर्ष : तिरंगे की जीत
आज देशभर में तिरंगा हर घर, हर पर्व और हर संस्थान में लहराता है। यह सिर्फ रंगों का मेल नहीं, बल्कि भारत की आत्मा का प्रतीक है — विविधता, एकता और स्वतंत्रता का।
संघ ने अंततः इस ध्वज को अपनाया, पर उसका यह अपनाना समय की मजबूरी था, न कि वैचारिक परिवर्तन का परिणाम। इतिहास गवाह है —“झंडा वही रहेगा, जो सबका है।” और वह झंडा तिरंगा है — जो शहीदों के खून से, स्वतंत्रता सेनानियों के सपनों से, और भारत माता के सम्मान से बना है। आज झंडे की जीत हुई है, और उन तमाम विचारों की हार, जो किसी एक रंग को राष्ट्र से ऊपर रखना चाहते थे।
इतिहास की अदालत में झंडा विजेता रहा है। उसने बार-बार यह सिद्ध किया है कि राष्ट्र किसी एक रंग, एक धर्म, या एक विचारधारा से नहीं बनता— राष्ट्र बनता है उन सबके मेल से, जो विविधता में एकता का विश्वास रखते हैं। आज तिरंगा ऊँचा है, क्योंकि वह साझी विरासत का प्रतीक है। वह याद दिलाता है कि भारत की आत्मा किसी एक झंडे या एक पुस्तक में नहीं,
बल्कि उस बहुरंगी आकाश में बसती है जो सबको साथ लेकर चलता है। तिरंगा जीता है — और उसके साथ जीता है भारत। जो भी उसे नमन करता है, वह अपने भीतर की विभाजनकारी रेखाओं को मिटा देता है। “झुका नहीं था तिरंगा तब, जब गोलियों की बौछार चली थी —
अब तो सिर झुकाकर उसे प्रणाम करना ही पड़ेगा, क्योंकि वही हमारी पहचान बन गई है।”
(डॉ. राकेश पाठक https://www.facebook.com/share/v/1DFpcy4xxH/ )

