-निर्मल कुमार शर्मा
‘अगर इसी तरह जंगलों,दरख्तों,पर्वतों, नदियों,झीलों,समुद्रों आदि का मनुष्यजनित कुकृत्यों से क्षय और विनाश होता रहा तो इस सदी के अंत तक नहीं,अपितु सन् 2040 तक ही पृथ्वी का तापमान 1.5 डिग्री सेल्सियस बढ़ जायेगा। तब इस धरती का क्या होगा ?इसका सहज ही अंदाजा लगाया जा सकता है,उस समय क्या-क्या हो सकता है ?इसका ट्रेलर प्रकृति अभी से संकेत के तौर पर गंभीरतापूर्वक देने लगी है, मसलन भारत सहित दुनियाभर में कहीं न कहीं भयंकर सूखा,कहीं प्रचंड बाढ़,कहीं पहाड़ों पर इतने बड़े-बड़े भूस्खलन कि गाँव के गांव पशुओं और मनुष्यों सहित जमींदोज हो रहे हैं,ग्लेशियर टूटने से जान-माल की भयंकर तबाही हो रही है, साइबेरिया जैसी जगहों में,जो दुनिया की सबसे ठंडी जगह मानी जाती है,इतनी भीषण गर्मी,जिसे अंग्रेजी में सीवियर हीट कहते हैं,पड़ने लगी है, अमेरिका,कनाडा,ब्राजील,तुर्की आदि देशों में स्थित जंगलों में बहुत ही विस्तृत क्षेत्र में आग लगने की विभीषिका भी उसी का एक नमूना है। ‘
यह बात कोई एक व्यक्ति,कोई एक संस्था,कोई एक देश नहीं कह रहा है,बल्कि इस दुनिया के 195 देशों के 200 सर्वश्रेष्ठ मस्तिष्क वाले वैज्ञानिकों का एक दल,जिन्होंने संयुक्त राष्ट्र संघ के तत्वाधान में विस्तृत व गहन अध्ययन करके अपनी विस्तृत रिपोर्ट में पूरे विश्व के देशों के प्रकृति और पर्यावरण के प्रति पूर्णतया असंवेदनशील व उदासीन कर्णधारों को यह जानकारी दी गई है, जानकारी क्या एक तरह से चेतावनी भी दी गई है,कि अभी भी वक्त है, प्रकृति,पर्यावरण,जंगलों,नदियों,पहाड़ों,समुद्रों, पृथ्वी के भूगर्भीय जल,विभिन्न अयस्कों,धातुओं आदि के लालच में अब और अधिक छेड़छाड़ व दोहन कतई नहीं होना चाहिए,पहले ही बहुत हो चुका है। यह रिपोर्ट साफ-साफ चेतावनी देती हुई प्रतीत हो रही है कि उक्तवर्णित दुर्घटनाओं व प्राकृतिक विपदाओं के लिए प्राकृतिक घटनाएं यथा ज्वालामुखी और सूरज की गर्मी कतई जिम्मेदार नहीं हैं,अपितु इन भयावहतम् घटनाओं के लिए मानवीय गतिविधियाँ पूर्णतः जिम्मेदार हैं ।
यह रिपोर्ट ऐसे समय में आई है,जिसके मात्र तीन महीने बाद ही यूनाइटेड नेशंस क्लाइमेट चैंज कॉनफ्रेंस यानि कॉप-26 की मिटिंग ग्लासगो में होनी है,इसी मिटिंग में निर्णय लिया जाएगा कि हमें धरती को बचाने के लिए निजी स्वार्थों और हितों को परे रखकर,निरपेक्ष व पर्यावरण को ध्यान में रखकर ऐसे निर्णय लिए जाने चाहिए, जिससे हमारी पृथ्वी, इसका पर्यावरण और समस्त जैवमण्डल,जिसका एक छोटा सा अंश मानवप्रजाति भी है,का जीवन सुरक्षित और निरापद रहे। जलवायु परिवर्तन के लिए मुख्य रूप से सबसे बड़े दोषी व जिम्मेदार इस दुनिया के सबसे ताकतवर व आर्थिक रूप से बड़े देश यथा अमेरिका और चीन जैसे देश हैं। कॉप-26 की मिटिंग के माध्यम से शेष विश्व के देश और समाज अमेरिका और चीन जैसे देशों को उनके यहाँ कार्बन उत्सर्जन और उसमें कटौती करने की बात जोरदार ढंग से उठाएंगे,क्योंकि जलवायु परिवर्तन से होनेवाला दुष्प्रभाव का असर सबसे ज्यादे कॉर्बन डाइऑक्साइड उत्सर्जित करनेवाले इन देशों के अलावे समूचे धरती और इसके जैवमण्डल पर पड़ रहा है।
संयुक्त राष्ट्र संघ ने आनेवाले खतरे से बचने के लिए एक तरह से खतरे का सायरन बजा दिया है। उदाहरण के तौर पर पिछले दिनों यूरोप में इतनी भयावह बाढ़ आई थी कि जितनी वहाँ पिछले एक हजार साल में भी नहीं आई थी ! मिडिया के अनुसार इस धरती पर प्रतिवर्ष 40 अरब टन कार्बन डाइऑक्साइड गैस वायुमंडल में मिलाई जाती है ! वैज्ञानिकों के अनुसार इतनी मात्रा में कार्बन डाइऑक्साइड गैस वायुमंडल में मिल जाने से उत्पन्न ग्लोबल वार्मिंग से उत्तरी ध्रुव और दक्षिणी ध्रुव की करोड़ों साल पूर्व से जमीं ठोस बर्फ भी तेजी से पिघल रही है,जिससे वहाँ के जैवमण्डल यथा वहाँ की पारिस्थितिकी में शीर्ष पर विराजमान ध्रुवीय भालुओं,विभिन्न ह्वेलों, मस्क बैलों,बारहसिंगों,सीलों,बालरसों तथा लोमड़ियों आदि जीवों का जीवन अत्यंत संकट में पड़ गया है ! ध्रुवीय भालू विलुप्ति के कगार तक पहुँच गये हैं ! अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी या नासा द्वारा बनाए गए सी प्रोटेक्शन टूल के आकलन के अनुसार अगर कार्बन डाइऑक्साइड गैस का उत्सर्जन और प्रदूषण इसी गति से बढ़ना जारी रहा तो सन् 2100 तक इस धरती का तापमान 4.4 डिग्री सेल्सियस बढ़ जायेगी,जिससे दोनों ध्रुवों की अधिकांशतः बर्फ पिघल जाएगी, फलस्वरूप समुद्र का जलस्तर 2.69 फीट तक ऊपर उठ जायेगा,जिससे यह दुनिया भीषण गर्मी से बुरी तरह त्रस्त तो होगी ही,दुनियाभर के सैकड़ों तटीय इलाकों में पानी से हजारों कस्बे,उथले टापू और शहर सदा के लिए समुद्री पानी में जलसमाधि ले लेने को अभिशापित हों जाएंगे।विश्व के इन हजारों तटीय इलाकों,शहरों और उथले टापुओं को जलसमाधि लेने से दुनिया की कोई ताकत रोक ही नहीं सकती ! वैसे दुनियाभर में पर्यावरण संरक्षण और ग्लोबल वार्मिंग रोकने के लिए प्रायः गोष्ठियां और सम्मेलन होते ही रहते हैं,लेकिन ये सब कागजों तक ही सीमित रहता है ! हकीकत यह है कि अमेरिका जैसे देश अपनी आर्थिक स्थिति को सुदृढ़ीकरण के लिए पेरिस जलवायु सम्मेलन से तुरंत पीछे हट जाता है,तो भारत के कर्णधार बक्सवाहा अतिसघन जंगलक्षेत्र में निरर्थक हीरों के लिए करोड़ों सालों से सृजित और पोषित वन क्षेत्र के लाखों हरे-भरे पेड़ों को काटने पर आमादा और अतिव्यग्र हैं ! भारत में स्थिति बद से बदतर है क्योंकि पर्यावरणक्षरण और वृक्षों को न कटने देने को प्रतिबद्ध पर्यावरणप्रेमी लोगों के दल पर सत्ता के कर्णधार अपने प्रायोजित गुँडों द्वारा हमला कराकर,उनको निर्वस्त्र करने और आंदोलनरत महिलाओं तक से अश्लीलता भरी गालीगलौज की जा रही है !
पर्यावरणसचेतक वैज्ञानिकों के अनुसार घने जंगल वायुमंडल में बहुत अधिक मात्रा में ऑक्सीजन मिला देने और लगभग उसी मात्रा में कार्बन डाइऑक्साइड गैस अवशोषित करने का काम करते हैं। इस धरती के वायुमंडल में कार्बन डाइऑक्साइड गैस की मात्रा संतुलित रहनी ही चाहिए, जिससे वातावरण का तापमान कम रहता है,इससे मिट्टी की उर्वरक शक्ति भी बढ़ती है,जिससे समस्त पेड़-पौधे भी स्वस्थ्य रहते हैं,फसलों का उत्पादन भी बेहतर होती है। कार्बन प्रकृति में ह्यूमिक एसिड और फ्यूमिक एसिड के रूप में संग्रहित रहता है। यह बेहतर परिस्थिति मिट्टी में पीएच वैल्यू 6 से 7 के बीच रखता है,जो फसलों सहित हरेक पेड़-पौधों के स्वास्थ्य व वृद्धि के लिए सबसे बेहतर स्थिति होती है। वैज्ञानिक तथ्य यह है कि पौधे वृक्ष बनकर वातावरण से कार्बन डाइऑक्साइड गैस को सोखकर कार्बन के रूप में संचित रखते हैं और उतनी ही मात्रा में ऑक्सीजन को मुक्त कर देते हैं,जो समस्त जंतु जगत के साँसों का और जीवन का भी आधार और अवलंबन है। जाहिर सी बात है कि इस धरती का जितना ज्यादे से ज्यादे भाग वनाच्छादित रहेगा,वहाँ की वायु उतनी ही ज्यादे मात्रा में ऑक्सीजन युक्त मतलब शुद्ध रहेगी।
वृक्षारोपण करने,पौधों को पालपोसकर वृक्ष बनाने और वनसंरक्षण करने में भारत के दक्षिण के राज्य उत्तर के सभी राज्यों से अपेक्षाकृत ज्यादे ईमानदार व प्रतिबद्ध हैं, उदाहरणार्थ कर्नाटक अपनी 1025 वर्ग किमी जमीन को वन आवरण से ढकने में सफलता हासिल किया है,आन्ध्रप्रदेश 990 वर्ग किमी में,केरल 823 वर्ग किमी में वनों से जमीन को पूर्णतः ढक देने में सफलता पाया। देश में सबसे ज्यादे वन आच्छादित राज्य मध्यप्रदेश है,जहाँ 77482 वर्ग किमी जंगलक्षेत्र है,दूसरे नंबर पर अरुणांचल प्रदेश है,जहाँ वनक्षेत्र 61000 वर्ग किमी वन है,उसके बाद छत्तीसगढ़ 55611 वर्ग किमी,फिर महाराष्ट्र जहाँ 50778 वर्ग किमी,उसके बाद कर्नाटक,जहाँ 38575 वर्ग किमी वनक्षेत्र है।
आजकल सरकारों द्वारा अपने तमाम प्रोजेक्ट्स यथा औद्योगिकीकरण,सड़क निर्माण,व्यावसायिक व रिहायशी निर्माण के लिए घने जंगलों,उसमें रहनेवाले मूल निवासियों, पहाड़ों,नदियों,करोड़ों सालों से प्रकृति द्वारा बड़े जतन से बनाए गये जंगलों को कुछ ही दिनों में निर्दयतापूर्वक उजाड़ दिया जाता है,उनका सर्वनाश कर दिया जाता है,इन सरकारों के असंवेदनशील कर्णधार किसी भी तार्किक व पर्यावरणहितैषी लोगों,वैज्ञानिकों की बात को भी सुनना ही नहीं चाहते ! जबकि प्राकृतिक वनों के विनाश से हमारी सभ्यता,हमारी संस्कृति,समस्त जैवमण्डल,जैवविविधता,ऑक्सीजन आदि जीवन के स्पंदन से युक्त सभी तत्व नष्ट हो जाता है,तहस-नहस हो जाता है और विडंबना देखिए जब पर्यावरण और जंगलों के प्रति संवेदनशील लोगों और संस्थाओं द्वारा इस कुकृत्य पर आपत्ति जताई जाती है,तब सत्ता के कर्णधार, उनके सहायक प्रशासनिक अफसर और बड़े ठेकेदारों द्वारा बड़े ही शातिराना ढंग से यह तर्क दिया जाता है कि काटे गये जंगल की क्षतिपूर्ति वे वृहद् वृक्षारोपण करके कर देंगे,लेकिन कटुसच्चाई यह है कि किसी भी प्राकृतिक जंगल को उजाड़ कर उसकी जगह वृक्षारोपण करके उसकी क्षतिपूर्ति की ही नहीं जा सकती ! उदाहरणार्थ उत्तराखंड में प्राकृतिक वनों को उजाड़कर वहाँ चीड़ के पेड़ लगाए गए,इसी प्रकार छत्तीसगढ़ के बस्तर संभाग में प्रकृतिप्रदत जंगलों को काटकर वहाँ लाखों यूकेलिप्टस के पेड़ लगा दिए गए, इन दोनों जगहों में प्राकृतिक जंगलों की जैवविविधता व पर्यावरण का सत्यानाश होकर रह गया ! वहाँ पर्यावरण व जैवविविधता की अपूरणीय क्षति हुई है। दोबारा वृक्षारोपण करके वनीकरण करने का मुहिम चलाना एक पक्षीय होता है,जो परिस्थितिकी व जैवविविधता को सदा के लिए नष्ट-भ्रष्ट कर देता है ! वृक्षारोपण करना एक तरह से मोनोकल्चर पौधारोपण होता है,सरकारों द्वारा उजाड़ा गया जंगल वास्तव में अपने पुराने स्वरूप में कभी आ ही नहीं सकता ! चारधाम आलवेदर सड़क बनाने से पूर्व इसके लाभ और इसके फायदे के बारे में खूब कसीदे गढ़े गये, इसकी खूब प्रसंशा और ढ़िढोरा पीटा गया,लेकिन इस पूर्णतः अविवेकपूर्ण व मूर्खताभरे सड़क निर्माण कार्य का खामियाजा आज संपूर्ण हिमालय,उसमें रहनेवाले हजारों जीव-जंतु व वहाँ का मानव समाज अपनी बलि देकर चुका रहा है ! इस चारधाम आलवेदर सड़क के निर्माण से हिमालय की अत्यंत नाजुक पारिस्थितिकी को अकथनीय नुकसान पहुँचा है ! वैज्ञानिकों के अनुसार हिमालय अभी शैशवावस्था से गुजर रहा है,इस शिशु हिमालय के निर्माण में पत्थरों की चट्टानें कम अधिकांशतः मिट्टी से यह निर्मित है। इस कच्चे और किशोर हिमालय में आलवेदर सड़क बनाने की जो अवैज्ञानिक व अनियंत्रित तरीका अपनाया जा रहा है,यथा चट्टानों को अनगढ़ तरीके से सीधा काटकर समूचे हिमालयी परिक्षेत्र में भूस्खलन, तेजी से ग्लैशियरों को गिरने,भयंकर बाढ़ और भूकंप को आमंत्रित किया गया है ! पहाड़ों की स्थिरता और सुरक्षा तथा स्थायित्त्व प्रदान करने में पेड़ों और दरख्तों का बहुत ही महत्वपूर्ण भूमिका और अमूल्य योगदान होता है,क्योंकि पेड़ों की जड़ें ही पहाड़ों पर होनेवाले भूक्षरण को रोकने में सक्षम हैं,लेकिन सड़क चौड़ीकरण करने की हड़बड़ी में लाखों पुराने पेड़ों को क्रूरतापूर्वक, अवैज्ञानिकता और निर्दयतापूर्वक बलि ले ली गई ! कोढ़ में खाज़ वाली एक और स्थिति हुई कि इस सड़क को बनाने वाले नासमझ इंजीनियर भूवैज्ञानिकों के महत्वपूर्ण सलाह को पूर्णतया नजरंदाज करते हुए चट्टानों की कटाई में वैज्ञानिक पद्धति व नियम-कायदों की खूब जमकर अवहेलना व उपेक्षा करके,अपनी मनमानी करके स्थानीय मृदा,इसकी प्रकृति और चट्टानों की मजबूती को बगैर जाँचे-परखे उल्टा-सीधा व सीधी कटाई करके उक्तवर्णित खतरों को कई गुना बढ़ा दिए हैं !
संपूर्ण हिमालय क्षेत्र अतिसंवेदनशील और नाजुक हालत में है,क्योंकि भारतीय प्रायद्वीप के एशियन प्लेट में भारी दबाव की वजह से हिमालय जैसे पहाड़ का निर्माण हुआ है। इस वजह से हिमालय की ऊँचाई अभी भी प्रतिवर्ष लगभग एक सेंटीमीटर बढ़ जा रही है,इसीलिए इस भूगर्भीय टेक्टॉनिक प्लेटों के उथल-पुथल से इस अतिसंवेदनशील क्षेत्र में अक्सर भूकंप के झटके महसूस किए जाते रहे हैं,कुछ भूकंप तो बहुत ही भयावह और तीव्र आ चुके हैं,जिससे इस क्षेत्र में जानमाल की भयंकर तबाही हो चुकी है ! ऐसे अतिसंवेदनशील क्षेत्र में सड़क निर्माण में बारूदी बिस्फोटकों का बगैर सोचे-विचारे जमकर प्रयोग करना,करोड़ों साल पुराने जंगलों की अंधाधुंध कटाई कर देना इस नवजात शिशु पहाड़ की स्थिरता को सदा के लिए खतरे में डालनेवाली बात है !पिछले कई सालों से पूरे हिमालयी परिक्षेत्र में बादलों के फटने की घटनाएं बहुतायत संख्या में हो रहीं हैं,जिसमें जान-माल की बहुत ही भयंकर बर्बादी हुई है,यथा पिछले दिनों एक ऐसी ही दुर्घटना में जोशीमठ के पास एनटीपीसी का भवन और देवप्रयाग का आईटीआई भवन तेज प्रवाह में बहकर विलीन हो गये,इसके अतिरिक्त कई गाँव मय उसके पशुओं और अपने वाशिंदों के साथ सदा के लिए जमींदोज़ हो गए !ऐसी भयावह दुर्घटनाओं की पुनरावृत्ति धर्मशाला,काँगड़ा और पूर्वोत्तर राज्यों में बारम्बार हो रही है ! इन परियोजनाओं में अनियन्त्रित व अवैज्ञानिक तरीके से किए जा रहे कार्य समस्त हिमालयी क्षेत्र की मिट्टी और पानी की अकूत संचयित राशि तेजी से बहकर समुद्रों में अनवरत जा रही है ! ऐसी दुःखद स्थिति में एक दिन ऐसा भी आ सकता है कि इस प्रकार के अनियंत्रित विकास व जंगलों की घनघोर विनष्टीकरण से पहाड़ों में रहना ही दुष्कर हो जाय,क्योंकि पहाड़ों में बहुत ऊँचाई पर ऑक्सीजन वैसे ही बहुत विरल होती है,अब वनों,पेड़ों,दरख्तों की बेहिसाब कटाई से ऑक्सीजन पूर्णतः समाप्त हो जाय,तब सब कुछ तबाह व तहस-नहस हो जाएगा !
इसलिए इस देश का विकास हो,खूब विकास हो,लेकिन संतुलित विकास हो,जिसमें प्रकृति,पर्यावरण,जंगल,पेड़,जीव-जंतु आदि सभी का जीवन भी संतुलित व सुखमय रहे,विकास के नाम पर विध्वंस कतई न हो,पर्यावरणविदों, धरतीपुत्रों,जंगलपुत्रों,वैज्ञानिकों,पर्यावरण हितैषियों की बात को भी सत्ता के मदांध कर्णधारों द्वारा संजीदगी से सुनी जानी चाहिए, पर्यावरण,जंगल,पेड़ बचाने के लिए आंदोलन करनेवाले लोग कोई अपराधी नहीं हैं,जिन्हें सत्ताप्रायोजित गुँडे अपमानित व गालीगलौज तथा असभ्य भाषा का इस्तेमाल करके अपमानित करें। और अब तो इस दुनिया के सबसे बड़े चौपाल संयुक्त राष्ट्र संघ से भी अनियंत्रित, विध्वंसक विकास पर विराम लगाने की आवाज जोरदार तरीके से उठाई जा रही है !यह भी ध्यान रखा जाना चाहिए कि बक्सवाहा की खदानों से निकले हीरों की कीमत,वहाँ के जंगलों में स्थित करोड़ों साल से प्रकृति द्वारा संरक्षित पेड़ों द्वारा उत्सर्जित ऑक्सीजन से बहुमूल्य हो ही नहीं सकता,इसलिए बक्सवाहा जंगलक्षेत्र के लाखों पेड़ों की जान की कीमत पर हीरों का उत्खनन कदापि नहीं होनी चाहिए।
-निर्मल कुमार शर्मा, ‘गौरैया एवम पर्यावरण संरक्षण ‘,प्रताप विहार,गाजियाबाद

