उर्मिलेश
हिंदी के प्रतिष्ठित लेखक-संपादक राजेन्द्र यादव ( 28 अगस्त,1929- 28 अक्तूबर, 2013) का आज जन्म-दिन है। निजी तौर पर उनसे मेरी ज्यादा घनिष्ठता नहीं रही। लेकिन उनकी ‘हंस’ पत्रिका की संपादकीय टिप्पणियों और अन्य वैचारिक लेखों का मैं लगभग नियमित पाठक रहा। बीच-बीच में यदा-कदा मिलना-जुलना भी रहा। पर लंबी बैठकबाजी बहुत कम। जहां तक याद आ रहा है, उनसे मेरी पहली मुलाकात दिल्ली में तब हुई थी, जब मैं जवाहरलाल नेहरु विश्वविद्यालय में एम फिल-पीएच डी कर रहा था। यह सन् 1979-80 का दौर रहा होगा। लेकिन वह बस ‘प्रणाम-पाती’ तक सीमित रही। फिर लंबे समय तक उनसे कोई मुलाकात नहीं हुई।
लेखन और पत्रकारिता में आने के बाद मैं लंबे समय तक पटना और चंडीगढ़ रहा। सन् 1997 के फरवरी महीने में मेरी दिल्ली वापसी हुई। रोजाना छपने वाले अखबारों में राजनीतिक मसलों की रपटकारी की जिम्मेदारी होने के कारण उन दिनों किसी भी साहित्यिक बैठकबाजी या साहित्यकारों-विचारकों के ‘रस रंजन कार्यक्रमों’ में जाना संभव नही था। देश-विदेश की खबरों से रूबरू मेरे जैसे पत्रकार को ज्यादातर हिंदी साहित्यकारों की महफिलें बहुत फालतू और उबाऊ लगती थीं। देश के सबसे बड़े दो अखबारी समूहों के न्यूज सेक्शन में जिम्मेदारी के पदों पर काम करने के बावजूद ‘पार्टी-सार्टी’, खासकर ‘रस-रंजन’ के कार्यक्रमों से मेरी कभी ज्यादा घनिष्ठता नहीं रही।
जिन दिनों मैं पटना स्थित नवभारत टाइम्स में राजनीतिक मामलों का संवाददाता था, एक बार अचानक बहुत दिनों बाद राजेंद्र जी से मुलाकात हुई। वह किसी साहित्यिक कार्यक्रम में वहां आये थे और संभवत: प्रेसिडेंट होटल में रुके थे। यह होटल फ्रेजर रोड स्थित हमारे दफ़्तर के बिल्कुल पास ही था। तब तक राजेंद्र जी मुझे नाम से जान चुके थे। उनके पास हमारे बारे में उतनी ही जानकारी रही होगी, जितनी मेरे एक अनुज-तुल्य मित्र अनवर जमाल या किसी अन्य साथी से सुन रखी होगी। समारोह के बाद उन्होंने बड़े सहज भाव से कहा: ‘ काम से फ्री होना तो शाम को आ जाओ होटल! बिहार राजनीति पर तुमसे कुछ समझेंगे।’
मैं शाम को समय निकालकर होटल स्थित उनके कमरे में पहुंच गया। उनके बगल वाले कमरे में श्यामा चरण दुबे रुके थे। उनसे भी मुलाकात हुई। पर हमारी चर्चा के दौरान वह वहां मौजूद नहीं थे। राजेंद्र जी ने कमरे में पहुंचते ही मेरा बड़ी गर्मजोशी से स्वागत किया था: ‘आओ-आओ उर्मिलेश, तुम्हारा ही इंतजार कर रहा था।’ मुझे बड़ा अचरज हुआ उनके व्यवहार से। अब तक हिंदी के ज्यादातर साहित्यकारों को अपने जूनियर लोगों के साथ बहुत औपचारिक और खड़ूस मुद्रा में हमने देखा था। हिंदी की साहित्यिक सर्किल में मेरे लिए सिर्फ चार अपवाद थे-दूधनाथ सिंह, ओम प्रकाश ग्रेवाल, सर्वेश्वर दयाल सक्सेना एवं महादेवी वर्मा और पत्रकारिता जगत में एक हद तक राजेंद्र माथुर। जहां तक मेरी जानकारी है, इनमें प्रो. ग्रेवाल और श्री माथुर तो मूल रूप से अंग्रेजी के छात्र-शिक्षक रहे। लेकिन दोनों ने अपना ज्यादा लेखन हिंदी में किया।
जहां तक दूधनाथ जी के साथ सम्बन्ध का सवाल है, वह विश्वविद्यालयीय कारणों से बना था। वह हमारे शिक्षक भी थे और वैचारिक दोस्त भी। हर सप्ताह हम लोगों की पांच-छह दिन मुलाकात होती थी। पर राजेंद्र जी से तो शायद यह दूसरी या तीसरी बार ही मिल रहा था। और वह इतनी सहजता और प्यार भरा सम्मान दिखाते मिले। सचमुच अचंभित था।
महादेवी जी और सर्वेश्वर दयाल सक्सेना जी से मेरे सहज रिश्ते साहित्यिक सर्किल के जरिये नहीं बने थे। अचरज होगा आप सबको, सर्वेश्वर जी और हमारे सम्बन्ध राजनीतिक कारणों से बने। उसमें साहित्य या पत्रकारिता की कोई भूमिका नहीं थी। यह बात उन दिनों की है जब मैं जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में पीएचडी कर रहा था और सर्वेश्वर जी आहिस्ते-आहिस्ते इंडियन पीपुल्स फ्रंट नामक एक वाम-लोकतांत्रिक रुझान वाले संगठन में सक्रिय हो रहे थे। जहां तक याद आ रहा है, हम दोनों उसकी राष्ट्रीय परिषद के सदस्य हो गये थे।
ऊपर जिन लोगों के नाम गिनाये, इनसे मिलते हुए मुझे कभी दिल-दिमाग पर बोझ नहीं लेना पड़ता था। लेकिन बाकी के ज्यादातर बड़े हिंदी साहित्यकारों या बड़े संपादकों से मिलना मुझे बिल्कुल अच्छा नहीं लगता था। इसमें कुछ और भी अपवाद होंगे। पर ज्यादातर हिंदी के साहित्यकार बड़े नकली और पांडित्य प्रदर्शन के प्रति सजग दिखते थे। उनके मुकाबले अंग्रेजी के संपादक ज्यादा प्रेम भाव से मिलते थे।
राजेंद्र यादव जैसे हिंदी के एक बड़े संपादक और साहित्यकार को इतना अनौपचारिक और सहज भाव में देखना मेरे लिए विस्मयकारी था। रसरंजन के साथ उनके साथ वह मेरी पहली और आखिरी चर्चा थी। अच्छी और बहुत सार्थक चर्चा हुई तो लगा यह आदमी हिंदी के बड़े साहित्यकारों के बीच बिल्कुल अलग है। उनमें बनावटीपन बिल्कुल ही नहीं था। हिंदी के ज्यादातर प्रगतिशील और वामपंथी साहित्यकारों की तरह उनकी प्रगतिशीलता भी बनावटी नहीं थी। पर उनकी वैचारिकता में मुझे थोड़ी अराजकता ज़रूर नजर आती थी।
प्रेसिडेंट होटल की वह मुलाकात यादों में अब भी है। हालांकि वह भी ज्यादा लंबी मुलाकात नहीं थी। हम लोग राष्ट्रीय राजनीति के संदर्भ में बिहार की राजनीति पर चर्चा कर ही रहे थे कि बीच में पटना के एक कवि जी अपने एक मित्र को लेकर आ गये। फिर हमने बातचीत वहीं समेटकर राजेंद्र जी से इजाजत ली और फ्रेजर रोड स्थित अपने दफ़्तर आ गया।
बाद के दिनों में भी उनसे यदा-कदा मुलाकात होती रही। अपने निरंतर विकासमान वैचारिक परिप्रेक्ष्य और साहसिक व्यक्तित्व से मुझे हमेशा प्रभावित करते रहे। यह सही है कि उनके व्यक्तित्व में अंतर्विरोध भी कुछ कम नहीं थे पर उन अंतर्विरोधों में एक लय थी। मेरी नजर में उनके व्यक्तित्व की एक और विशेषता थी- वह अच्छे, सार्थक और बेहद रचनात्मक लोगों के अलावा तरह-तरह के ‘लघु-मानवों’ और ‘चिरकुटों’ से भी घिरे रहते थे।
अलग-अलग समय पर अलग-अलग बौद्धिक-नुमा या रचनाकार महिलाओं से उनके रिश्तों को लेकर भी खूब चर्चा होती रहती थी। पर किसी व्यक्त्ति या लेखक के समग्र मूल्यांकन का आधार ऐसी चर्चाएं नहीं होतीं। किसी व्यक्ति या लेखक के मूल्यांकन का मुख्य आधार उसका सामाजिक-बौद्धिक अवदान होना चाहिए कि उसने अपने समाज को बेहतर, सुंदर, समतामूलक और सहिष्णु बनानें में कितना योगदान दिया! इस नजरिये से देखें तो राजेंद्र यादव हिंदी के न सिर्फ बडे लेखक-संपादक साबित होते हैं अपितु ईमानदार पब्लिक इंटेलेक्चुअल भी!
मेरा उनका नाता निजी कम वैचारिक ज्यादा था। उनके वैचारिक लेखों और टिप्पणियों का मैं नियमित पाठक था, इसलिए उनके वैचारिक लेखन और संपादन से मेरी निकटता क्रमशः बढ़ती रही। कभी-कभी हम लोग समकालीन सामाजिक-राजनीतिक सवालों पर फोन पर बातचीत भी कर लेते थे। दुख है कि अपनी प्रोफेशनल व्यस्तता के चलते उनसे मिलना-जुलना ज्यादा नही होता था। उनको मालूम था कि कहानी-कविता लिखने या पढ़ने में मेरी रुचि नहीं है। तब भी नहीं थी, आज भी ज्यादा नहीं है। लेकिन फिक्शन मैं बिल्कुल नहीं पढ़ता, ऐसा भी नहीं।
संभवत: अपने इलाहाबाद के छात्र दिनों में ही मैने ‘सारा आकाश’ जैसी उनकी मशहूर रचना पढ़ी थी। पर उन्होंने ‘हंस’ में लिखे अपने संपादकीय आलेखों और अलग-अलग विशेषांकों से मुझे ज्यादा प्रभावित किया।
शायद यही कारण है कि राजेंद्र जी और मेरे बीच जब कभी कोई संवाद हुआ, वह अक़्सर किसी साहित्येतर विषय पर ही होता था। इस तरह के जो कुछ विषय याद हैं: कश्मीर, सोशल जस्टिस से सम्बद्ध विषय, यूपी बिहार की राजनीति, मुलायम सिंह/अमर सिंह, लालू/नीतीश की राजनीति, माकपा/माले राजनीति, कोई तत्कालीन मीडिया प्रसंग या फिर राहुल सांकृत्यायन की घुमक्कड़ी आदि!
जम्मू-कश्मीर पर केंद्रित मेरे यात्रा-वृत्तांत ‘झेलम किनारे दहकते चिनार'(2003) के लोकार्पण में वह हमारे आमंत्रण पर आये तो उन्हें संभवतः पहली बार लगा कि मैं राजनीतिक विषयों के अलावा भी कुछ लिखता हूँ या लिख सकता हूं! अच्छी तरह याद है, उस समारोह मे वह अनवर जमाल के साथ आये थे। मेरी तरफ से अनवर जमाल ने ही उनको आमंत्रित किया था। समारोह के बाद चाय-पान के दौरान कश्मीर से लेकर राहुल सांकृत्यायन के जीवन पर विचारोत्तेजक चर्चा भी करते रहे।
जहां तक याद आ रहा है, 28 अक्टूबर, 2013 को राजेंद्र जी के निधन की सूचना किसी करीबी मित्र ने मुझे फोन पर दी। मैं उनके मयूर विहार स्थित उस घर में कभी नहीं गया था जबकि वह मेरे निवास से बहुत दूर नहीं था। बहुत पहले अनवर के साथ सिर्फ एक बार उनके हौज खास वाले घर में गया था। निधन की सूचना पाते ही मैं फौरन उनके निवास पहुंचा। उस समय बामुश्किल वहां दसेक लोग पहुंचे थे। उनकी पत्नी मन्नू भंडारी जी या बेटी रचना यादव से मेरा न परिचय था और न कभी निजी मुलाकात थी। दोनों के प्रति शोक संवेदना प्रकट कर हम कमरे से बाहर जाकर खड़े हो गये। कुछ समय बाद वहां परिचितों का आना-जाना बढ़ता गया। सभी लोग उनके बारे में अपनी-अपनी यादें सुनाते रहे!
राजेन्द्र जी, आपको सलाम और श्रद्धांजलि।
(उर्मिलेश वरिष्ठ पत्रकार हैं।)

