शशिकांत गुप्ते इंदौर
आज जब मै सीतारामजी से मिलने गया तब वे बहुत ही गंभीर सोच में डूबे थे।
मैने गंभीर सोच का कारण पूछा? सीतारामजी झल्ला कर कहने लगे,सवाल करोगे तो मैं तुम्हे अपनी मित्रता से निलंबित कर दूंगा।
मैने कहा मैने तो सहज ही पूछ लिया?
सीतारामजी ने कहा जानते नहीं हो इन दिनों सवाल पूछना अनैतिक आचरण की परिभाषा में आता है।
मैने कहा अपना देश विश्व का सबसे बड़ा लोकतांत्रिक देश है।
सीतारामजी ने कहा इसी बात का दुःख है।
सीतारामजी ने कहा सिर्फ लोकतंत्र का लिहाज़ कर रहा हूं, अन्यथा मै आपको सिर्फ निलंबित
Suspend ही नहीं करता बल्कि
बर्खास्त (Dismissed) भी कर देता।
सीतारामजी का वक्तव्य सुनकर मुझे सन 1944 में प्रदर्शित फिल्म
My Sister.(मेरी बहन) के गीत की कुछ पंक्तियों का स्मरण हुआ।
गीत के गीतकार हैं पंडित भूषण
ऐ क़ातिब-ए-तक़दीर मुझे इतना बता दे
क्यों मुझसे ख़फ़ा है तू, क्या मैंने किया है
वो चहचहाती बुलबुलें जाने गई कहाँ
जुगनू की चमक है न सितारों की रोशनी
इस घुप अंधेरे में है मेरी जान पर बनी
(क़ातिब =लिखने वाला)
सीतारामजी उक्त पंक्तियां सुनकर क्रोधित होकर कहने लगे व्यंग्य करना भी अनैतिक आचरण की परिभाषा में आ सकता है?
मैने कहा आप मुझे निलंबित कर दो,लेकिन मेरे कुछ लंबित प्रश्नों का जवाब देने का कष्ट करें।
सीतारामजी ने मुझ से कहा पुनः आप प्रश्न पर ही आ गए?
मैंने कहा लोकतंत्र में वाणी की स्वतंत्रता तो मूलभूत अधिकार है।
सीतारामजी ने कहा, वाणी की स्वतंत्रता है,प्रश्न पूछने की नहीं।
सीतारामजी का जवाब सुनकर मै अतीत में खो गया। मुझे स्वतंत्रता संग्राम का स्मरण हुआ।
संग्राम में जिन्होंने शहादत दी,जिन लोगों ने जेल की यातनाएं भोगी,जिन लोगों ने देश के लिए अपना सर्वस्व निछावर कर दिया।
स्वतंत्रता संग्राम में सक्रिय योगदान देने वालों ने स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद क्या क्या सपने संजोए होंगे।
शायर महेश जानिब ने निम्न शेर में वास्तविकता बयां की है।
झुकाना सीखना पड़ता है सर लोगों के क़दमों में
यूँही जम्हूरियत में हाथ सरदारी नहीं आती

