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भारत के लिए ब्रेगाडीयर पद पर रहते हुए शहीद होने वाले एकलौते भारतीय थे  उस्मान….

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कश्मीर की हिफाज़त करते हुए आज ही के दिन देश के लिए शहीद हो गए थे ब्रिगेडियर मुहम्मद उस्मान,,,जनाज़ा नमाज़ मैं देश के राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री सहित अन्य हुए थे मौजूद,,,,देश के पहले शिक्षा मंत्री मौलाना अब्दुल कलाम आज़ाद ने पढ़ाई थी जनाज़े की नमाज़,,,

✍️आज ‘नौशेरा के शेर’ ब्रिगेडियर मुहम्मद उस्मान की यौम ए शहादत है, कशमीर की हिफ़ाज़त करते हुए 3 जुलाई 1948 को ब्रिगेडियर पद पर रहते हुए देश के लिए शहीद होने वाले इकलौते भारतीय थे। उनके जनाज़े की नमाज़ भारत के पहले शिक्षा मंत्री मौलाना अबुल कलाम आज़ाद ने पढ़ाई थी; वहीं जनाज़े में भारत के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरु, प्रथम राष्ट्रपति डॉक्टर राजेंद्र प्रासाद, प्रथम भारतीय गवर्नर जनरल चक्रवर्ती राजगोपालाचारी जैसे लोग शामिल हुए थे। इसके इलावा भारत की प्रथम महिला प्रधानमंत्री इन्द्रा गांधी भी मौजूद थी। ब्रिगेडियर उस्मान को जामिया मिल्लिया इस्लामिया के इतिहासिक क़ब्रिस्तान में सम्मान के साथ दफ़न किया गया।
[7/4, 5:18 PM] +91 98276 24289: ✍️ मुस्लिम होने की दुहाई देकर जब जिन्ना ने कहा, हमारे यहां आ जाओ,, हम आपको पाकिस्तान आर्मी चीफ बना देंगे,,,जिसपर उस्मान ने जवाब दिया इस मिट्टी (भारत) के लिए आम नागरिक बनकर मरना भी मेरे लिए गर्व की बात होगी,,,ओर मैं तो ब्रिगेडियर हु,,,जो मेरे लिए काफी है,,,मेरे मुल्क तरफ देखिएगा भी नही,,,नही तो मिलेंगे ज़रूर मगर जंग मैं……ऐसे थे 🌹ब्रिगेडियर उस्मान…🌹

यौमे शहादत ब्रिगेडियर मोहम्मद उस्मान …….

✍️आज भारतीय सेना की गौरवशाली परंपरा की बेहद मज़बूत कड़ियों में एक ब्रिगेडियर मोहम्मद उस्मान का शहादत दिवस है। दुर्भाग्य यह है कि उनकी कुर्बानियों को देश अब लगभग विस्मृत कर चुका है। उत्तर प्रदेश के आजमगढ़ जनपद के बीबीपुर में जन्मे उस्मान भारतीय सैन्य अधिकारियों के उस शुरुआती बैच में शामिल थे, जिनका प्रशिक्षण ब्रिटेन में हुआ। द्वितीय विश्व युद्ध में अपने नेतृत्व के लिए प्रशंसा और कई बार प्रोन्नति हासिल करने वाले ब्रिगेडियर उस्मान साल 1947 में भारत-पाक युद्ध के वक़्त उस 50 पैरा ब्रिगेड के कमांडर थे, जिसने नौशेरा में ऐतिहासिक जीत हासिल की थी। उन्हें ‘नौशेरा का शेर’ कहा जाता है।

✍️देश के बंटवारे के बाद अपनी बहादुरी और कुशल रणनीति के लिए चर्चित उस्मान को पाकिस्तानी राजनेताओं नेताओं मोहम्मद अली जिन्ना और लियाकत अली खान ने इस्लाम की दुहाई देकर सेना का चीफ बनाने का लालच देकर पाकिस्तानी सेना में शामिल होने का निमंत्रण दिया था। वतनपरस्त उस्मान ने प्रस्ताव ठुकरा दिया। बंटवारे के बाद उनका बलूच रेजीमेंट पाकिस्तानी सेना के हिस्से में चला गया और वे स्वयं डोगरा रेजीमेंट में आ गये। तब दोनों देशों में अघोषित लड़ाई में पाकिस्तान भारत में लगातार घुसपैठ करा रहा था। पैराशूट ब्रिगेड की कमान संभाल रहे उस्मान सामरिक महत्व के क्षेत्र झनगड़ में तैनात थे। 25 दिसंबर ,1947 को पाकिस्तानी सेना ने झनगड़ को कब्जे में ले लिया था। तब के वेस्टर्न आर्मी कमांडर लेफ्टिनेंट जनरल के.एम करिअप्पा ने झनगड़ और पुंछ पर कब्ज़े के उद्धेश्य से जम्मू को अपनी कमान का हेडक्वार्टर बनाया। मार्च, 1948 में ब्रिगेडियर उस्मान के नेतृत्व-कौशल और पराक्रम से झनगड़ भारत के कब्जे में आ गया। झनगड़ के इस अभियान में पाक की सेना के हजार जवान मरे थे और लगभग इतने ही घायल हुए थे। झनगड़ के छिन जाने और बड़ी संख्या में अपने सैनिकों के मारे जाने से परेशान और खस्ताहाल पाकिस्तानी सेना ने उस्मान का सिर कलम कर लाने वाले को 50 हजार रुपये का इनाम देने का ऐलान किया था। 3 जुलाई ,1948 की शाम उस्मान जैसे ही अपने टेंट से बाहर निकले, पाक सेना ने उनपर 25 पाउंड का गोला दाग दिया जिससे उनकी शहादत हो गई। मरने के पहले उनके अंतिम शब्द थे – ‘हम तो जा रहे हैं, पर जमीन के एक भी टुकड़े पर दुश्मन का कब्जा न हो पाए।’

✍️शहादत के बाद राजकीय सम्मान के साथ ब्रिगेडियर उस्मान को जामिया मिलिया इसलामिया क़ब्रगाह, नयी दिल्ली में दफनाया गया।उनकी अंतिम यात्रा में देश के तत्कालीन गवर्नर जनरल लार्ड माउंटबेटन, प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू, केंद्रीय मंत्री मौलाना अबुल कलाम आज़ाद और शेख अब्दुल्ला शामिल थे। किसी फौजी के लिए आज़ाद भारत का यह सबसे बड़ा सम्मान था। यह सम्मान उनके बाद किसी भारतीय फौजी को नहीं मिला। मरणोपरांत उन्हें ‘महावीर चक्र’ से सम्मानित किया गया। अपने फौजी जीवन में बेहद कड़क माने जाने वाले उस्मान अपने व्यक्तिगत जीवन में बेहद मानवीय और उदार थे, अपने वेतन का अधिकाँश हिस्सा गरीब बच्चों की पढ़ाई और जरूरतमंदों पर खर्च करते थे। वे नौशेरा में अनाथ पाए गए 158 बच्चों की अपनी संतानों की तरह देखभाल करते और उनको पढ़ाते-लिखाते थे।

✍️शहादत दिवस पर ‘नौशेरा के शेर’ ब्रिगेडियर मोहम्मद उस्मान को खिराज-ए-अक़ीदत !
[7/5, 12:10 AM] +91 98276 24289: ऐसे बहुत से शायर हैं, जिनके शेर का दूसरा मिसरा (line) इतना मशहूर हुआ कि लोग पहले मिसरे (line) को तो भूल ही गये।

ऐसे ही, चन्द उदाहरण यहाँ पेश हैं:
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“ऐ सनम वस्ल की तदबीरों से क्या होता है ?
वही होता है जो मंज़ूर-ए-ख़ुदा होता है।

मिर्ज़ा रज़ा बर्क़

“भाँप ही लेंगे इशारा सर-ए-महफ़िल जो किया,
ताड़ने वाले क़यामत की नज़र रखते हैं।”

– माधव राम जौहर

“चल साथ कि हसरत दिल-ए-मरहूम से निकले,
आशिक़ का जनाज़ा है, ज़रा धूम से निकले।”

मिर्ज़ा मोहम्मद अली फ़िदवी

“दिल के फफोले जल उठे सीने के दाग़ से,
इस घर को आग लग गई, घर के चराग़ से।”

महताब राय ताबां

“ईद का दिन है, गले आज तो मिल ले ज़ालिम,
रस्म-ए-दुनिया भी है,मौक़ा भी है, दस्तूर भी है।”

– क़मर बदायूंनी

“क़ैस जंगल में अकेला ही मुझे जाने दो,
ख़ूब गुज़रेगी, जो मिल बैठेंगे दीवाने दो।”

मियाँ दाद ख़ां सय्याह

‘मीर’ अमदन भी कोई मरता है?
जान है तो जहान है प्यारे।”

– मीर तक़ी मी

“शब को मय ख़ूब पी, सुबह को तौबा कर ली,
रिंद के रिंद रहे हाथ से जन्नत न गई।”

जलील मानिकपुरी

“शहर में अपने ये लैला ने मुनादी कर दी,
कोई पत्थर से न मारे मेंरे दीवाने को।”

ये जब्र भी देखा है तारीख़ की नज़रों ने,
लम्हों ने ख़ता की
थी, सदियों ने सज़ा पाई।

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