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उत्तराखंड त्रासदी……प्राकृतिक घटना या मानव दख़ल……

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*सुसंस्कृति परिहार

      उत्तराखंड के चमोली जिले में ग्लेशियर के तेज प्रवाह के फलस्वरूप जो त्रासदी सामने आई है वह धरती पर चलने वाली निरंतर प्रक्रिया है ।पर्वतीय क्षेत्रों में ग्लेशियर के ज़रिए अपरदन तो होता ही है साथ ही साथ ग्लेशियर के नीचे की प्रवाह से नदियों को अकूत जल मिलता है ।हिमालय के ग्लेशियर आस पास की घाटियों में रहने वाले 25 करोड़ लोगों और उन नदियों को पानी देते हैं जो आगे जा कर करीब 1.65 अरब लोगों के लिए भोजन, ऊर्जा और कमाई का जरिया बनती हैं गंगा के प्रवाहक्षेत्र और बह्मपुत्र प्रवाहक्षेत्र में बड़े बड़े ग्लेशियर हैं ।जो लोग गौमुख तक गए होंगे  उन्होंने ग्लेशियर खिसकने का धीमा प्रवाह तो देखा ही होगा पूरा हिमालयीन क्षेत्र उत्तर ,दक्षिण ,पूर्व में अनेकों ग्लेशियरों से आच्छादित है । उसकी मंद गति प्राकृतिक है लेकिन यदि वह तेज गति पकड़ रहा है तो उसे मानव दखल से उपजा क्रोध ही कहना उचित होगा ।.

पिछले दो-तीन दशकों में ग्लोबल वॉर्मिंग की वजह से पर्यावरण को पहुंचने वाली हानि के कारण इनके पिघलने की गति में जो तेज़ी आई है, जो बहुत ही ज़्यादा चिंताजनक है.बीते दो दशकों में हिमालय के ग्लेशियर का पिघलना बढ़ा है. ये बात साल 2019 में हुई एक स्टडी में सामने आया. … साल 1975 से 2000 तक हर साल औसतन 400 करोड़ टन बर्फ पिघलती रही, लेकिन इसके बाद के सालों में   ग्लेशियरों के पिघलने की रफ्तार दोगुनी हो चुकीहै. 

   उत्तराखंड मेंग्लेशियर टूटने से मची तबाही एक चेतावनी है कि यदि ग्लोबल वॉर्मिंग के बढ़ते खतरों को गंभीरता से नहीं लिया गया, तो परिणाम इससे भी भयानक होंगे. ग्लोबल वॉर्मिंग का खतरा लगातार बढ़ता जा रहा है. हिमालय से लेकर ग्रीनलैंड तक ग्लेशियर पिघलने  के खतरे से जूझ रहे हैं. इंटरगवर्नमेंटल पैनल ऑन क्लाइमेट चेंज (IPCC) की एक रिपोर्ट बताती है कि ग्रीनलैंड और अंटार्कटिक में बर्फ की परत लगभग 400 अरब टन कम हुई है. इससे न केवल समुद्र का जलस्तर बढ़ने की आशंका है, बल्कि, कई देशों के प्रमुख शहरों के डूबने का खतरा भी बढ़ गया है।भविष्य में ग्लेशियरों के पिघलने से समुद्र तल का बढ़ना 30-50 सेंटीमीटर तक सीमित रहेगा क्योंकि अब इन ग्लेशियरों के पास कम ही बर्फ बची है. इसकी तुलना अगर ग्रीनलैंड और अंटार्कटिक की बर्फ की चादर से करें तो इनके पिघलने से समुद्र का तल कई दर्जन मीटर तक बढ़ सकता है. 

      नरेंद्र मोदी नीत राजग-1 सरकार में भारती जल संसाधन, नदी विकास और गंगा संरक्षण मंत्री थीं. हिन्दी में किए गए सिलसिलेवार ट्वीट में उन्होंने कहा कि ग्लेशियर टूटने से पनबिजली परियोजना को नुकसान पहुंचा है और भीषण त्रासदी आयी है. उन्होंने कहा कि हिमालय के ऋषि गंगा में हुई यह त्रासदी चिंता का विषय होने के साथ-साथ चेतावनी भी है.आपने यह भी कहा कि जब वे मंत्री थी उन्होंने नदियों पर पनबिजली परियोजना का काम नहीं होने दिया ।ऐसी भी एक जानकारी सामने आई है कि जो हादसा चमौली तपोवन में हुआ है वर्तमान सत्ता की गलत नीतियों और भाई-भतीजावाद के कारण ही हुआ है जो काम बी आर ओ करता था।  वो काम किसी मंत्री के बेटे ने किया तथा इस क्षेत्र 10लाख के करीब पेड़ काट दिए गए ।फलत:जमीन की पकड़ ढीली हुई और उसने विकराल रूप ले लिया ।     नीदरलैंड्स की डेल्फ्ट यूनिवर्सिटी ऑफ टेक्नोलॉजी के हैरी जोकोलारी का कहना है कि ज्यादातर लोग इस बात का महत्व नहीं समझते कि बर्फ की विशाल संरचनाएं कितनी जरूरी हैं. उन्होंने कहा, “ग्लेशियर एक भंडार है. एक स्वस्थ ग्लेशियर गर्मी में थोड़ा पिघलता है और सर्दियों में और बड़ा बन जाता है. इसका मतलब है कि लोगों को जब पानी की ज्यादा जरूरत होती है तो उन्हें ग्लेशियर से पानी मिलता है.” 

              कुल मिलाकर हमें मानव दखल पर विमर्श करना होगा । नदियों के प्रवाह के साथ छेड़खानी प्रकृति को बर्दाश्त नहीं वह अपने अनुरूप प्राकृतिक ढाल का चयन करती है धरती पर उसकी रोक ,कार्ब़न उत्सर्जन, वृक्षों की कटाई ।बांध बनाना पर्वतीय क्षेत्रों में होने वाले ब्लास्ट या हलचल बस्तियों की सघनता ,रोड्स का निर्माण  कम करना होगा इनके अनुरुप हमको चलना होगा तभी हम प्रकृति के साथ चल पाएंगे । यहां एक बात और जाननी ज़रुर चाहिए कि परिवर्तन चक्र प्रकृति में भी चलता है लेकिन आहिस्ते आहिस्ते ।यदा कदा ही वह आग उगलती है,धरती हिल जाती है ।धरती के लिए ये सब जरूरी भी है ।उदा  टेथिस सागर से हिमालय का निकलना और फिर उत्तर और दक्षिण में उपजाऊ  मैंदानो का जन्मना ।प्रकृति से तादात्म्य बनाकर चलने का पूरा प्रयास करें वरना आपदाएं झेलने की तैयारी रखें । 

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