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*योनि की आत्म~कथा*

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      (साइंस्टिफिक रियलिटी पर आधारित स्टोरी)

  ~>सोनी कुमारी, वाराणसी

मैं नारी की योनि हूँ. उस का सबसे छुपा हुआ अंग. मुझे बहुत कम लोगों ने देखा है. प्रकृति ने मुझे ऐसी जगह स्थित किया है कि किसी भी के लिए मुझे ठीक से देखना लगभग नामुमकिन है.  यह सही भी है क्योंकि मैं नारी का सबसे अनमोल अंग हूँ. मुझे उस की इज्ज़त समझा जाता है।

     बाकी लोगों की बात छोड़ो, मुझे तो उस नारी ने भी ठीक से नहीं देखा है, जिसकी मैं योनि हूँ. जब वह छोटी थी तब उसे मुझमें कोई दिलचस्पी ही नहीं थी. बस उस की माँ उसे नहलाते समय मुझमें पानी डालकर अपनी उँगलियों से मुझे साफ़ कर देती थी. मुझे बहुत अच्छा लगता था। मुझे तभी से अपने ऊपर पानी की बौछार और उँगलियों का स्पर्श अच्छा लगता चला आ रहा है।

    जब लड़की थोड़ी बड़ी हुई तो कभी-कभार अपनी उँगलियों से मुझे छूने लगी थी पर उसने कभी मुझे देखने की कोशिश नहीं की। शायद उसको मुझे देखना मुश्किल भी था क्योंकि अपने पेट के ऊपर से मुझे देख नहीं सकती थी. बाद में जब उसने  जवानी की दहलीज़ पर कदम रखा तो मैंने अपने आप को रेशमी बालों के घूँघट  छुपा लिया था जिससे मेरे दर्शन उसके लिए और भी दूभर हो गए थे।

   मुझे उस से ज्यादा तो उसके पति और डॉक्टर ने देखा होगा। वह इस मामले में अकेली नहीं है. बहुत सी लड़कियाँ और महिलाएँ अपनी योनि को ठीक से नहीं देखतीं या यूं कहिये कि देख नहीं पातीं।

   चलो मैं अपने बारे में खुद ही तुम्हें बता दूं क्योंकि जिसकी मैं हूँ, उस को मेरे बारे में तो कोई खास जानकारी है नहीं।

मेरी बनावट : मैं एक 3.5 से 4 इंच लंबी और करीब 3 इंच परिधि की एक पिचकी हुई ट्यूब-नुमा नाली हूँ जिसका एक सिरा प्रगति की नारी जांघो के बीच खुलता है और दूसरा सिरा उसके के गर्भाशय से जुड़ा हुआ होता है। यह अंदर वाला सिरा लगभग बंद रहता है और सिर्फ बहुत सूक्ष्म तत्व या पदार्थ ही इसके पार गर्भाशय में जा सकता है। मेरे आकार को तुम एक पिचके हुए कंडोम की तरह समझ सकते हो। मेरे अंदर की दीवारें लचीली होती हैं जिससे नारी की यौन उत्तेजना के समय मेरा आकार बढ़कर 5 से 6 इंच का हो जाता है। मेरी दीवारों में ऐसी ग्रंथियाँ होती हैं जो नारी की उत्तेजना के समय तरल द्रव्यों का प्रवाह करती हैं जिनसे मैं अंदर से नम या गीली हो जाती हूँ। ऐसा होने से मेरे अंदर पुरुष के लिंग का प्रवेश आसान हो जाता है और मुझे तकलीफ नहीं होती।

    मेरे द्वार से लेकर करीब दो से ढाई इंच अंदर तक मेरी दीवारों में अनेक तंत्रिकाएँ होती हैं जिनसे नारी को स्पर्श, घर्षण, दर्द या सुख की अनुभूति होती है। मेरे बाकी के अंदर के इलाके में ये तंत्रिकाएं नहीं होतीं हैं. इसलिए संभोग सुख का अनुभव नारी को मेरे ढाई इंच का हिस्सा ही देता है. इसके बाद अंदर कुछ महसूस नहीं होता। यह बात सबको पता नहीं है. इसलिए फालतू में नारी मोटा, लम्बा लिंग खोजती है. नर भी अपने 3 इंच के उत्तेजित लिंग को छोटा समझता है। सच में, मुझे तो केवल दो-तीन इंच का लिंग ही आनंद देने के लिए पर्याप्त है। सच पूछो इससे लंबे लिंग तो मेरे उत्तेजित आकार से बड़े होते हैं. सो मुझे तकलीफ दे सकते हैं और नारी के गर्भाशय को चोट भी पहुंचा सकते हैं। लम्बे मोटे नहीं, मुझे कड़क लिंग  पसंद हैं जो मेरी तंत्रिकाओं को प्रबलता से तब तक ऊर्जा दे पाए जब तक मैं निचुड़ नहीं जाऊं, और जब तक सारी बस बस बोलती हुई बेसुध नहीं हो जाए.

      जब लड़की पैदा हुई थी तो मेरा आकार करीब डेढ़ इंच लंबा था और मेरा मुंह काफी छोटा था। करीब पांच साल की उम्र तक मेरा आकार लगभग उतना ही रहा। उन दिनों जब वह नंगी खड़ी होती थी तो कोई भी मुझे देख सकता था क्योंकि मैं सीधी और खड़ी दिशा में, लगभग लम्बवत, (vertical) थी. सबके सामने मुझे कोई शर्म नहीं थी. पर जबसे लड़की ने यौवनावस्था में क़दम रखा है तबसे मेरे ठीक ऊपर स्थित शुक्र-टीला (Mound of Venus) धीरे-धीरे पनपने लगा और उसके उभार के कारण मैं नीचे की तरफ होने लगी।

    सोलहवें साल के आस-पास तक मैं लगभग ज़मीन के समानांतर दिशा में, लगभग दंडवत (horizontal) हो गयी थी। इसी दौरान जब लड़की बारह साल की हुई थी तब मेरे होठों के आस-पास बाल आने शुरू हो गए थे. शुरू में बहुत ही मुलायम, काले रेशम जैसे इक्का-दुक्का बाल आये जो कि मेरे होंठों के इर्द-गिर्द उगे थे. धीरे-धीरे 3-4 साल में ये बाल घने होते चले गए और मेरे होठों को तथा मेरे आस-पास के इलाके को एक तिकोने आकार से ढक दिया। 

     कहने का मतलब यह कि जहाँ लड़की के बचपन में मैं बड़ी शान से अपने आप को दिखा सकती थी, उसकी जवानी के आते-आते मैं उसकी जाँघों के बीच, ज़मीन के समानांतर हो गई, मेरे ऊपर बालों का घूंघट सा भी आ गया। इसके फलस्वरूप औरों की बात तो दूर, खुद युवती भी नंगी होकर मुझे ठीक से देख नहीं सकती थी। उसे मेरे दर्शन करने के लिए किसी रोशन इलाके में आगे झुक कर, टांगें खोल कर, बालों का झुरमुट हटा कर एक दर्पण की ज़रूरत होती है। शायद इसीलिए उसने मुझे ठीक से देखा नहीं है।

आओ, अब मैं तुम्हें अपने अंगों और पड़ोसियों के बारे में बताऊँ :

     देखा जाये तो मैं नारी के जननांगों का बाहरी प्रारूप हूँ. जननांग मतलब प्रसव अथवा प्रसूति अंग या जन्म देने वाले अंग। मैं उस के गर्भाशय तक पुरुष शुक्राणु पहुँचाने का मार्ग हूँ.  मेरी भूमिका इतनी महत्वपूर्ण है कि प्रकृति ने मेरी सुरक्षा के लिए दो-दो द्वार (double-door) लगाये हुए हैं : बड़े भगोष्ठ और छोटे भगोष्ठ। ये दोनों प्रायः बंद ही रहते है और बाहरी गंदगी और कीटाणुओं से मेरा बचाव करते हैं। इन दोनों होठों के बंद होने के बावजूद भी अंदर मैं पिचकी हुई ही रहती हूँ। मेरा यह पिचका रहना ना केवल बाहर के प्रदूषण से एक अतिरिक्त बचाव है बल्कि यौन संसर्ग के दौरान यह घर्षण पैदा करने का निराला तरीका है।

     मेरे दो मुख्य कार्य हैं. प्रजनन तथा यौन-सुख का आदान-प्रदान। मैं यौन सुख देती भी हूँ और लेती भी हूँ। नारी समझती है कि उसके मूत्र का निर्गम भी मैं ही करती हूँ पर यह गलत है। मेरे समीप, ऊपरी भाग में और भगनासा के नीचे मूत्राशय का छेद है जहाँ से नारी पेशाब करती है।

    नाम से तो लघु भगोष्ठ (Labia Minora) छोटे होने चाहिये पर अक्सर ये काफी बड़े होते हैं और कई बार ये भगोष्ठ (Labia Majora) के अंदर नहीं समा पाते और बाहर दिखाई देते हैं। मेरा आकार और रूप लघु भगोष्ठों के कारण ही भिन्न-भिन्न होता है।

    कुछ लोग समझते हैं कि मैं एक छेद हूँ जिसके पीछे कोई सुरंग या गुफा नुमा ट्यूब है जिसमें सम्भोग के समय पुरुष का लिंग जाता है। मैं कोई खोखली सुरंग नहीं हूँ. मैं हमेशा पिचकी हुई और बंद रहती हूँ। सम्भोग के दौरान लिंग का प्रवेश मुझे खोलता हुआ अंदर जाता है और जब वह बाहर आता है तो मैं अपने आप फिर से बंद हो जाती हूँ। इस कारण पुरुष को हर बार लिंग प्रवेश करने में घर्षण का आनंद मिलता है. अगर मुझमें कई का लिंग, कोई बाहरी सामान डाला जाता है तो मैं फैल जाती हूँ. मेरी कोशिकाएँ मर जाती हैं. मैं शून्य हो जाती हूँ. नारी को कुछ अहसास नहीं होता, चाहे कितनों को भी लेती रहे. नर को भी लगता है कि किसी गुफा में डाला है. उसे भी आनंद नहीं आता.

    अगर मैं स्वस्थ हूँ तो मेरे अंदर की दीवारें लिंग की पूरी लम्बाई पर संपर्क बनाये रखती हैं जिससे पूरे लिंग को अंदर-बाहर होते समय घर्षण का अहसास होता है। अगर मैं ऐसी नहीं होती तो मर्दों को यौन सुख का मज़ा नहीं मिलता और शायद नारी भी मैथुन-सुख से वंचित रह जाती।

एक बार फिर बता दूँ : नारी के पैदा होने से लेकर उसकी पांचवीं सालगिरह तक मेरे रूप और आकार में ज्यादा बदलाव नहीं आया। फिर अगले दो-तीन साल तक मेरा आकार थोडा बड़ा हुआ। इसके बाद तो जब उसने किशोर अवस्था में क़दम रखा (11-12 वर्ष की उम्र) तभी मेरे आकार और रूप में बदलाव आने शुरू हुए। ऊपर उसके स्तनों का विकास शुरू हुआ और नीचे मेरे द्वार के इर्द-गिर्द बाल आने शुरू हो गए। मेरे ऊपर स्थित शुक्र-टीला (Mound of Venus) बढ़ने लगा. मेरे लघु भगोष्ठ बड़े होकर हल्के-हल्के बाहर प्रकट होने लगे. उनका रंग गुलाबी से बदल कर कत्थई सा होने लगा. उनकी अंदरूनी दीवारों का गीलापन बढ़ने लगा। नारी के गर्भाशय (Uterus) और अंडाशय (Ovaries) के विकास के साथ-साथ उसके शरीर में और कई बदलाव आने लगे। उसके स्तनों, कमर, कूल्हों, जांघों, ऊपरी बाजू और जघन हिस्से (Pubic Area) में चर्बी की मात्रा बढ़ने लगी जिससे उसके अंगों में गोलाई बढ़ने लगी। अगले दो-तीन सालों तक यह उन्नति होती रही. नारी का शरीर सुडौल होता गया. उसके स्तन उभर आये तथा चूचक बड़े हो गए। अब वह पहले की तरह फ्रॉक नहीं पहन सकती थी. उसे चोली और दुपट्टे की ज़रूरत होने लगी।

    उसके कूल्हे पीछे की ओर उभर कर अपना अस्तित्व दर्शाने लगे। उसके लघु भगोष्ठ और बड़े हो गए और भगनासा उभर कर दिखने लगी.  चेहरे पर मुहांसे आने लगे और उसके पसीने की गन्ध वयस्क हो गई।

    अचानक एक दिन, जब वह 13 साल की थी, तब उसको पहली बार माहवारी का रिसाव हुआ। मुझे याद है वह कितना डर गई थी और रोती-रोती अपनी माँ के पास गई थी जिसने उसको इस बारे में समझाया और दिलासा दिया था।

    माहवारी शुरू होना नारी के प्रजनन-योग्य होने का प्रतीक है। हालांकि, अभी 4-5 वर्ष तक उसके प्रजनन के बाकी अंग परिपक्व नहीं होंगे और तब तक उसके लिए प्रसव जोखिम दायक हो सकता है। 

    मैं माहवारी चक्र के बारे में बता दूँ। मेरा माहवारी चक्र सामान्यतः 28 दिन का होता है। क्योंकि प्रकृति ने गर्भाशय को प्रजनन के लिए बनाया है, हर 28 दिन के क्रम में, दोनों अंडाशयों में से एक अंडाशय, एक अंडा गर्भाशय में भेजता है। यह अंडा ग्रीवा के समीप पुरुष के शुक्राणु से मिलने का इंतज़ार करता रहता है। साथ ही गर्भाशय की अंदरूनी परत गर्भधारण की तैयारी में लग जाती है। 

    अगर इस अंडे का पुरुष के वीर्योपात के करोड़ों में से किसी एक भी शुक्राणु से सफल मिलन हो जाता है तो गर्भ बैठ जाता है और गर्भाशय में अगले 9 महीनों तक भ्रूण पनपता है और फिर शिशु का जन्म होता है।

    अगर किसी कारण अंडे और शुक्राणु का मिलन नहीं होता तो गर्भाशय हर 28 दिन अपनी अंदरूनी परत को त्याग देता है। यह परत मेरे मार्ग से होती हुई बाहर आती है जिसे माहवारी कहते हैं। माहवारी में रिसने वाले तरल पदार्थ मात्रा में करीब दो से ढाई चम्मच के होते हैं। प्रगति समझती है कि यह केवल रक्त होता है पर ऐसा नहीं है। इसमें गर्भाशय की अंदरूनी परत के अंश, मेरे रिसाव वाले तरल पदार्थ तथा परत के छूटने से निकले रक्त के अंश होते हैं। इसका रंग गहरा कत्थई-लाल होता है और यह आम खून की तरह जल्दी से जमता नहीं है। ना ही इसके रिसाव से रक्त में लोहे की मात्रा (Hb) कम होती है।

     इतना ज़रूर है कि माहवारी का प्रजनन क्रिया और गर्भधारण से गहरा सम्बन्ध है। इस सम्बन्ध का गर्भधारण के लिए तथा गर्भ-निरोधन, दोनों के लिए उपयोग किया जा सकता है।

     माहवारी चक्र सामान्यतः 28 दिन का होता है पर यह 2-4 दिन इधर-उधर हो सकता है। माहवारी का बंद हो जाना गर्भ-धारण का सबसे ठोस सबूत माना जाता है। यह चक्र गर्भ-धारण से लेकर शिशु-जन्म तथा उसके उपरान्त शिशु के स्तन-सेवन की अवधि तक बंद रहता है। जब तक यह चक्र दोबारा शुरू नहीं हो जाता आगामी गर्भधारण नहीं हो सकता।

   नारी के शारीरिक उत्थान का क्रम करीब 3-4 साल तक और चला जिसमें उसके स्तन और यौनांगों के विकास के अलावा उसके जघन बाल काफी घने हो गए और उन्होंने मुझे तो मानो आँखों से ओझल ही कर दिया। तब से लेकर अब तक इतने साल हो गए हैं परन्तु मेरे आकार और रूप में और कोई बदलाव नहीं आया है।

    पहले तो लड़की सिर्फ अपनी उँगलियों को मेरे मुँह के ऊपर और बाहर चलाती थी पर बाद में, जब में अंदर से गीली होने लगी, तब वह अपनी ऊँगली का सिरा मेरे अंदर भी डालने लगी थी। मुझे बहुत अच्छा लगने लगा था।

    जब वह 18 साल की हो गई तब मैं पूर्ण-रूप से अपने दोनों निर्धारित दायित्व निभाने के लिए तैयार हो गई थी. ये दायित्व थे सम्भोग-सुख और प्रजनन! 

    सुहागरात में मुझे भी दर्द हुआ था. खास तौर से उस समय जब पुरुष ने अपने लिंग से मेरे अंदर की कौमार्य-झिल्ली को भेदा था। नारी सिहर सी गई थी और झिल्ली के पतन से जो खून बहा था उसे देख कर डर भी गई थी। 

    सुहागरात के बाद से तो समझो मेरा बुरा हाल हो गया था। फिर मुझे आनंद आने लगा था, बिना दर्द के. मैं खुद सम्भोग चाहती थी.

    मैं बहुत खुश थी. मैं अपने आप को सम्भोग के लिए तैयार कर लेती थी. इसके लिए मैं अपने आप को कामुक-रसों से ओत-प्रोत करके अपनी अंदरूनी दीवारों को चिकना कर लेती थी जिससे लिंग प्रवेश में आसानी हो. 

   मेरे भगोष्ठ सपाट होकर मेरे बंद कपाट को थोड़ा खोल देते जिससे मेरे लघु-भगोष्ठ प्रकट हो जाते और लिंग के स्वागत के लिए तत्पर हो जाते.  मेरी भगनासा अपने घूंघट-रूपी मुकुट से बाहर आ जाती. मेरे भगोष्ठ की लालिमा गहरा जाती.

     इसके अलावा नारी के स्तन उभर जाते, चूचियाँ कड़क हो जाती, आँखों की पुतली बढ़ जाती और उसकी साँसें तेज होने लगती.  ये सब संकेत नारी की उत्तेजना दर्शाते थे और उसे सम्भोग के लिए तैयार करते थे।

    उत्तेजित हालत में मेरा मुंह करीब 30% छोटा हो जाता है, भगोष्ठ सपाट होकर समतल हो जाते हैं, और लघु भगोष्ठ रक्त से भर कर करीब दो से छः गुना बड़े हो जाते हैं जिससे मेरा द्वार कुछ खुल सा जाता है। भगनासा उभर जाती है। मेरा मुँह छोटा हो जाने से सम्भोग क्रिया में घर्षण आनंद स्त्री-पुरुष, दोनों के लिए बढ़ जाता है।

     जब सम्भोग के फलस्वरूप प्रगति चरमोत्कर्ष को प्राप्त होती है तो मेरी बाहरी दो-तिहाई (2/3) हिस्से में तथा गर्भाशय और गुदा में एक साथ तालबद्ध संकुचन शुरू होते हैं। शुरू में ये संकुचन तेज़ होते हैं ( हर 0.8 सेकंड में एक) और धीरे-धीरे इनकी रफ़्तार कम होती जाती है। ये संकुचन कभी तो एक-दो ही होते हैं तो कभी 15-20 तक हो सकते हैं.

   इनकी तीव्रता एवं अवधि नारी की मनःस्थिति, उत्तेजना और संतुष्टि पर निर्भर होती है। इस दौरान भगनासा अत्यंत मर्मशील हो जाती है और उसको किसी तरह का स्पर्श वेदना दे सकता है इसलिए वह अपने घूंघट में दुबक जाती है। वह अभी भी सिकुड़ती नहीं, बस संकुचन क्रम समाप्त होने तक आश्रय में चली जाती है। अगर नारी की उत्तेजना कुछ ज्यादा अधिक हो तो चरमोत्कर्ष के समय मेरी स्कीन-ग्रंथि (Skene’s Glands) या मूत्राशय से तरल द्रव्य का फव्वारा-नुमा निष्कासन हो सकता है. जैसे मरदाना वीर्योत्पात होता है।

    चरमोत्कर्ष के बाद अंगों में जो अतिरिक्त रक्त आ गया था वह धीरे-धीरे वापस चला जाता है। अगर प्रगति को चरमोत्कर्ष की प्राप्ति नहीं हुई हो तो रक्त की वापसी में ज्यादा समय लगता है मानो वह संतुष्ट नहीं है। भगोष्ठ, लघु भगोष्ठ और भगनासा अपने सामान्य आकार, रंग और रूप में आ जाते हैं। कुछ अंतराल के बाद भगनासा की मर्मशीलता कम हो जाती है और उसको स्पर्श दोबारा से आनंददायक लगने लगता है। 

    जब ऐसा होता है तो एक बार फिर सम्भोग करने का सामर्थ्य मुझ में आ जाता है। किसी भी पुरुष के मुक़ाबले मुझ में यह सामर्थ्य काफी जल्दी आ जाता है।

     पहले मुझे लगता था कि जो सम्भोग सुख मैं पाती हूँ, कोई और योनि नहीं पाती. लेकिन मैं गलत थी. चेतना मिशन की पोस्ट ने मेरी आंखे खोल दी. मिशन से मिले हज़ारों स्त्रियों के अनुभव ने मुझे जगा दिया. योग-ध्यान-तंत्रसिद्ध मिशन के डायरेक्टर डॉ. मानवश्री से इंटिमेट होने के लिए मेरी आग ने मुझे मज़बूर किया. उनसे जो चरम सुख मिला उसका कोई जबाब नहीं. इसके पहले तो मैं  वास्तविक सम्भोग-सुख का करोणवाँ हिस्सा भी नहीं पाती थी. अद्वितीय क्षमता है उनकी. एक-एक घंटे का सात राउंड दे सकते हैं. पहले तो मैं 45 मिनट में ही बेसुध हो गई थी. फिर इतना ज्यादा आनंद दिए कि बार-बार उनको लेने लगी. अब तो सातों राउंड लेती हूँ– पूरा का पूरा. मेरा बस चले तो बारह राउंड लूँ. वे कमजोरी भी नहीं आने देते. एक योनि के रूप में मैं धन्य हुई. वे मुझे फैलने भी नहीं देते. जब जरूरत हुई, मुझे वर्जिन जैसी बना देते हैं. इसलिए मेरे आनंद का कोई पारावार नहीं. कई देशों की नारियां उनसे चरम सुख लेती हैं. वर्जिन गर्ल्स अपनी वर्जिनिटी उनसे धन्य करती हैं. तमाम पति अपनी पत्नी को और माताएँ अपनी पुत्री को उनसे इंटिमेट कराती हैं, जिससे वे बदचलन या रोगी नहीं बनें. मैं तो कहती हूँ हर फीमेल को कम से कम एक बार उनका स्वाद लेकर खुद को धन्य करना चाहिए. वर्ना वो यह अहसास तक नहीं कर पायेगी कि सच्चा संभोगसुख क्या होता है. मर जाएगी बिना तृप्त हुए ही.

   एक आम योनि के शब्दों में कहूं तो जब नारी संतान को जन्म देती है तब मैं अपने विराट-रूप का प्रदर्शन करती हूँ। योनि मार्ग और मुख इतने बड़े हो जाते हैं कि एक शिशु का सिर, जो कि करीब 10 cm (4 इंच) व्यास का होता है, इस मार्ग द्वारा दुनिया में आता है। आँख की पुतली के अलावा शरीर को कोई और अंग इतना ज्यादा लोचदार नहीं होता।

    नारी जब 50 साल के लगभग होती है तब मेरे में एक स्थायी परिवर्तन आता है जिससे मेरी प्रजनन क्षमता बंद हो जाती है। इसको रजोनिवृत्ति (Menopause) कहते हैं। यह भी प्रकृति की नेमत है जिससे वृद्धावस्था में गर्भ-धारण जैसे अत्यंत महत्वपूर्ण दायित्व से निजात मिल जाती है। जैसे–जैसे नारी की आयु बढ़ती है मेरी प्रजनन और यौन-आनंद देने वाली प्राथमिक भूमिकाएं खत्म होने लगती हैं।

    मैं नारी का एक बहुत ही महत्त्वपूर्ण अंग हूँ जो कि बहुत चमत्कारिक भूमिका निभाती हूँ। प्रकृति ने मुझे इतनी सुरक्षित जगह स्थान दिया है कि जीवन की आम चर्या से मुझे चोट या क्षति नहीं पहुँच सकती। आम दुर्घटनाओं से भी मैं बच जाती हूँ। मुझे शारीरिक नुकसान तभी होता है जब कोई जानबूझ कर मुझे तकलीफ देना चाहे। जैसे कि दैहिक शोषण, प्रतिशोध या कोई असामान्य घटना।

    हाँ, मुझे कई तरह की तकलीफें और रोग हो सकते हैं जो इतने महत्वपूर्ण हैं कि चिकित्सा विज्ञान ने मेरी सेवा-शुश्रुषा के लिए एक अलग ही विभाग बनाया है – प्रसूतिशास्त्र (Gynaecology)।

    मुझे कुछ विकार हो सकते हैं जैसे असामान्य रिसाव, जलन, खुजली इत्यादि जो कि अक्सर साफ़-सफाई की कमी से होते हैं। वैसे अंदर से तो मैं अपने आप को स्वतः ही साफ़ रखती हूँ पर भगोष्ठ और जघन बालों में अगर मूत्र, मल, वीर्य या कोई बाहरी गंदगी रह जाये तो यह रोग पैदा कर सकती है। इसके अलावा, मुझे माहवारी सम्बंधित अनियमितताएँ या फिर यौन संचारित रोग हो सकते हैं। इनसे बचने के लिए सम्भोग का सुरक्षात्मक होना ज़रूरी है यानि या तो भरोसेमंद एवं स्वस्थ पुरुष के साथ सम्भोग या फिर मुझे रोग देने वाली प्रक्रियाओं से उपयुक्त बचाव। 

   नारी के बाकी अंगों की तरह सेहतमंद खुराक, पर्याप्त मात्रा में पानी और नियमित व्यायाम करने से मैं हमेशा भली-चंगी रहूंगी।

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