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वनमाली कथा सम्मान:क्या साहित्यिक सम्मान अब केवल प्रचार सामग्री बन गए हैं?

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शैलेंद्र चौहान

भोपाल में आयोजित किए जा रहे कथा सम्मान समारोह में वरिष्ठ कथाकार जितेन्द्र भाटिया द्वारा तथाकथित वनमाली कथा सम्मान को अस्वीकार करने और उसके बावजूद उसके प्रचारित किए जाने की घटना केवल एक व्यक्तिगत असहमति नहीं है। यह हिंदी साहित्य की उस प्रवृत्ति का खुला उदाहरण है जिसमें सम्मान, उत्सव और सांस्कृतिक आयोजन धीरे-धीरे अपने मूल उद्देश्य से भटककर प्रचार, प्रतिष्ठा और सत्ता-समीपता के उपकरण बनते जा रहे हैं।

समाचारों में यह घोषणा की गई कि मृदुला गर्ग सहित कई साहित्यकारों को सम्मानित किया जाएगा। यह आयोजन विश्व रंग के अंतर्गत बताया गया। लेकिन स्वयं जितेन्द्र भाटिया ने स्पष्ट कर दिया कि उन्होंने न केवल इस सम्मान को स्वीकार नहीं किया, बल्कि आयोजकों को कई बार लिखकर मना भी कर दिया था। इसके बावजूद उनका नाम प्रचारित किया जाना एक गंभीर प्रश्न खड़ा करता है—क्या साहित्यिक सम्मान अब केवल प्रचार सामग्री बन गए हैं?

‘विश्व रंग’ और उसके उत्सवों की कार्यशैली

वनमाली कथा सम्मान जिस मंच के अंतर्गत दिया जा रहा है, वह विश्व रंग नामक साहित्यिक आयोजन का हिस्सा बताया जाता है। यह आयोजन प्रायः बड़े पैमाने पर आयोजित किए जाते हैं और इनमें देश-विदेश के अनेक लेखकों को बुलाने और सम्मानित करने का दावा किया जाता है।

इन आयोजनों की कुछ विशिष्ट कार्यशैलियाँ पिछले वर्षों में चर्चा में रही हैं—बड़ी संख्या में सम्मान और अलंकरण घोषित करना, प्रचार-प्रसार को अत्यधिक महत्व देना, सोशल मीडिया और समाचारपत्रों में पहले से नाम प्रसारित करना और चयन प्रक्रिया और मानदंडों की अस्पष्टता। साहित्यिक दुनिया में यह धारणा धीरे-धीरे बन रही है कि इन आयोजनों का केंद्र साहित्यिक मूल्यांकन से अधिक उत्सवधर्मिता और प्रचार बनता जा रहा है।

सम्मान का उत्सवधर्मी बाज़ार

पिछले वर्षों में हिंदी में अनेक ऐसे साहित्यिक उत्सव उभरे हैं जिनमें दर्जनों सम्मान एक साथ बाँटे जाते हैं। मंच भव्य होते हैं, अतिथियों की सूची लंबी होती है, सोशल मीडिया पर प्रचार व्यापक होता है—लेकिन चयन प्रक्रिया, मानदंड और पारदर्शिता अक्सर अस्पष्ट रहते हैं।

ऐसे आयोजनों में कई बार यह अनुभव होता है कि सम्मान साहित्यिक मूल्यांकन का परिणाम कम और आयोजन की चमक बढ़ाने का साधन अधिक बन जाते हैं। जितने अधिक नाम, उतनी अधिक चर्चा—और जितनी अधिक चर्चा, उतना अधिक प्रभाव।

लेकिन इस पूरी प्रक्रिया में लेखक की स्वीकृति, उसकी गरिमा और उसके वास्तविक योगदान का मूल्यांकन अक्सर गौण हो जाता है।

सत्ता-समीपता का सांस्कृतिक खेल

इन आयोजनों का एक और छुपा हुआ आयाम भी है—सत्ता के साथ सांस्कृतिक समीकरण।

साहित्यिक समारोहों के मंच पर अक्सर मंत्री, मुख्यमंत्री, राज्यपाल या सत्ता से जुड़े प्रभावशाली लोग मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित होते हैं। आयोजनों की भव्यता, सरकारी सहयोग और मीडिया कवरेज का एक उद्देश्य यह भी होता है कि आयोजक स्वयं को सत्ता-समीप सांस्कृतिक शक्ति के रूप में स्थापित कर सकें।

इस प्रक्रिया में साहित्य कई बार सांस्कृतिक पूंजी में बदल जाता है—जिसका उपयोग राजनीतिक प्रभाव, संस्थागत लाभ या प्रतिष्ठा अर्जित करने के लिए किया जाता है।

सम्मान की सूची जितनी लंबी होगी, मंच उतना बड़ा दिखाई देगा; मंच जितना बड़ा होगा, सत्ता के लिए वह उतना ही आकर्षक होगा।

लेखक का आत्मसम्मान बनाम आयोजनों की रणनीति

जितेन्द्र भाटिया का विरोध इसलिए महत्वपूर्ण है कि उन्होंने इस पूरे खेल को चुपचाप स्वीकार करने के बजाय सार्वजनिक रूप से अस्वीकार किया। उन्होंने यह भी कहा कि उनके लगभग साठ वर्षों के लेखन को केवल “अनुवादक” के रूप में प्रचारित करना उनके रचनात्मक अवदान का अपमान है।

यह केवल एक लेखक का आक्रोश नहीं, बल्कि उस मानसिकता का प्रतिरोध है जिसमें लेखक को सम्मान की सूची का एक नाम भर मान लिया जाता है।

सम्मान की असली प्रतिष्ठा :

साहित्यिक इतिहास बताता है कि सम्मान लेखक को महान नहीं बनाते। बल्कि महान लेखक ही सम्मान को प्रतिष्ठा देते हैं।

यदि सम्मान बिना सहमति के घोषित होने लगें, यदि उनका उद्देश्य साहित्य से अधिक प्रचार और सत्ता-समीपता हो जाए, तो वे धीरे-धीरे अपनी नैतिक विश्वसनीयता खो देते हैं।

जितेन्द्र भाटिया का यह विरोध हमें याद दिलाता है कि साहित्य की असली शक्ति मंचों और अलंकरणों में नहीं, बल्कि लेखक के आत्मसम्मान और उसकी स्वतंत्रता में होती है।

(शैलेंद्र चौहान लेखक-कवि हैं और अनियतकालिक पत्रिका धरती के संपादक हैं।)

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