ज्योतिषाचार्य पवन कुमार
शक्ति अनन्त है, अनेक रूपों में है तथा युगानुरूप धर्म है।
तपः परं कृतयुगे त्रेतायां ज्ञानमुच्यते।
द्वापरे यज्ञमित्याहुः दानमेकं कलौयुगे।।
कृतयुग में तप, त्रेता में ज्ञान, द्वापर में यज्ञ तथा कलियुग में दान शक्ति की प्रधानता होती है। प्रत्येक प्राणी में चारों युगों का भाव होता है।
कालिः शयानो भवति, संजिजानस्तु द्वापरः।
उत्तिष्ठत्रेता भवति, कृतं सम्पद्यते चरन्॥”
सोता हुआ कलियुगावस्थास में होता है। जागा हुआ किन्तु आलस्य में पड़ा हुआ द्वापर युग में होता है। जो आलस्य छोड़ कर उठ बैठा हो उसकी त्रेतावस्था होती है। अच्छी तरह चलने फिरने लगे तो वह कृतयुग अवस्था में होता है। शक्ति चतुष्पाद है। कलियुग में एकपाद, द्वापर में द्विपाद = त्रेता में तीनपाद तथा सतयुग में पूर्णपाद रूप में शक्ति विद्यमान रहती है।
साधारण मनुष्यों में एक चौथाई शक्ति होती है। ये लोग शासित होते हैं। जिनमें यह शक्ति आधी होती है, वे लोग अधिकारी, पदवीधारी शासक होते है। जिन में यह शक्ति तीन चौथाई होती है, वे ही अपि, देव, सिद्धादि होते हैं।
जिन में यह शक्ति पूर्ण रूप से प्रतिष्ठित होती है, उन्हें ईश्वर परमदेव परमात्मादि कहा जाता है। शक्ति, जिन के भीतर सोती रहती है, वे दीन हीन मलीन कलियुगी हैं। शक्ति जब तन्द्रावस्था में होती है तो वे लोग अल्पचेती अल्पविकसित द्वापरयुगी होते हैं। शक्ति, जिन में जागृत होती है वे विचारशील विज्ञानी त्रेतायुगी कहलाते हैं।
जिन में शक्ति क्रियाशील होती है. ऐसे ऐश्वर्यवान धनवान्, विभूतिवान् सामर्थ्यशाली को कृतयुगी / सतयुगी कहा जाता है। पुरुष तो सभी हैं, कई हैं। इन में से जो विशेष है, वह ईश्वर है।
क्लेशकर्म विपाकाशयैरपरामृष्टः पुरुष विशेष ईश्वरः।
(योगसूत्र : १ । २४)
क्लेश (अविद्या, अस्तिमता, राग, द्वेष, अभिनिवेश), कर्मविपाक (कर्मफल) तथा आशय (कर्म संस्कारों के समूह) से असंबद्ध पुरुष विशेष को ईश्वर कहा जाता है।
अविद्यास्मितारागद्वेषाभिनिवेशा: क्लेशाः।
(पातञ्जल योग सूत्र : २ । ३)
इस क्लेश से छुटकारा कैसे मिले ? जीव यदि ईश्वर हो जाय तो उसे इस से छुटकारा पाना ध्रुवसत्य है। ईश्वर होने के लिये शक्ति के चारों पादों की प्राप्ति आवश्यक है। यह शक्ति सब में पूर्णरूप से रहती है। किन्तु रहने से क्या होता है ? विकसित नहीं है|
सो रही है, तंद्रा मस्त है, जागृत पर अक्रिय है। इस लिये जीव शासित है, शासक है, अपि है। वह ईश्वर नहीं है। ईश्वर होने के लिये मूलाधार से सहसार पर्यन्त ७ चक्रों की यात्रा करनी पड़ती है। सारा खेल शक्ति का है। पूरी शक्ति का प्राकट्य होते ही साधारण समझे जानेवाला जीव ईश्वर हो जाता है।
योगी ईश्वर होता है। योगी को मृत्यु का भय नहीं होता। वह कभी मरता नहीं। वह शरीर से असम्बद्ध होता है। अतः कर्मविपाकाशय होंगे ही नहीं। योग सब दुखों का नाशक है।
योगो भवति दुःखहा.
(गीता : ६।१७।)
भगवान कहते है- हे अर्जुन । इसलिये तू योगी बन.
‘तस्माद्योगी भवार्जुन।
(गीता : ६ । ४६ ।)
अष्टम भाव की रामबाण औषधि है, अष्टांगयोग– यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान, समाधि किन्तु यह कड़वी एवं तीती है। यह सब के लिये सेव्य नहीं है। यह औषधि अधिक मूल्य की है। मुझ जैसे लोगों की क्रय शक्ति से परे है।
अष्टम भाव की एक अमूल्य औषधि है, नामयोग-नाम जप यह सब के लिये साध्य है। मैं यही औषधि लेता हूँ। इस औषधि के सेवन से जीव कभी ईश्वर नहीं बनता। वह ईश्वर की सायुज्य प्राप्त करता, सान्निधि में होता है।
यही क्या कम है ? इस से मृत्यु भय क्षीण होता है। नाम सर्वोपरि है। तस्मै नाम्ने नमः।
शक्ति को प्रथमा सुषुप्तावस्था में व्यक्ति शूद्र होता है। शक्ति की द्वितीयावस्था तन्द्रा में व्यक्ति वैश्य होता है। शक्ति को तोपावस्था जागृति में व्यक्ति क्षत्रिय होता है। शक्ति की चतुर्थावस्था सक्रियता में व्यक्ति ब्राह्मण होता है।
ब्राह्मण पूर्ण शक्तिमान होता है, अभय होता है। विश्वमित्र तप से ब्राह्मण बने और अभय पद पर प्रतिष्ठित हुए। शक्ति की उपासना न करने वाला शूद्र मात्र ही रहता है। इस का उपासक द्विज होता है। शक्तिमान् ही द्विज है।
गायत्री शक्ति हो तो है। इस की उपासना प्रत्येक द्विज का धर्म है। सभी द्विज शाक्त होते हैं। इस शक्ति को जो पैरों में रखता है, वही शूद्र है। इसे नाभि में रखने वाला वैश्य है, स्कन्ध पर रखने वाला क्षत्रिय है, मस्तक पर रखने वाला ब्राह्मण है। शक्ति के प्रति जिस का जितना अधिक आदरभाव है, वह उतना ही ऊंचा/श्रेष्ठ है।
जो राष्ट्र, समाज, धर्म, देश, जाति, कुल, कुटुम्ब, व्यक्ति शक्ति की उपासना नहीं करते वे दुर्दशा को प्राप्त होते हैं। इस सत्य को कौन नकार सकता है ? शक्ति उपसना का अर्थ है शक्ति संग्रह शक्तिवत्त होना, शक्ति का आदर करना, शक्ति को प्राथमिक मानना शक्ति अनेक रूपिणी है।
इच्छाशक्ति, विचारशक्ति, क्रियाशक्ति, धनशक्ति जनशक्ति, सैन्यशक्ति, अस्वशक्ति, शस्त्र शक्ति, शास्त्र/मंत्रणाशक्ति व्यवस्था शक्ति।
शक्ति के ये विभिन्न रूप समान रूप से उपादेय एवं उत्कर्षकारक हैं। इन सभी शक्तिरूपों को मैं नमन करता हूँ, पूजता हूँ।
जो शक्ति की पूजा करता है, वह स्वयमेव पूज्य हो जाता है। ब्रह्मा जी इस शक्ति को अपने मुख में ससम्मान स्थान देते हैं। विष्णु जी इसे अपने वक्षस्थल पर आदरपूर्वक रखे रहते हैं। शिवजी इसे अपनी सम्पूर्ण काया के वामार्थ में स्वांगभूत किये रहते हैं। इसलिये ये तीनों देव शाक्त हैं और सर्वपूज्य हैं।
इन्हें नमस्कार करना ही शक्तिपूजा है। शक्ति की आराधना करना अथवा शक्ति के आराधक की आराधना करना ही शक्त/ शक्तिमान होना है। शक्तिमते नमः।
शक्तिहीन जीवन व्यर्थ है। शक्तिहीनता अपमान की जननी है। शक्तिदीन मानहीन मान कौन नहीं चाहता ? मान के लिये धन-धान्य होना आवश्यक है। शक्ति मा से धनादि की याचना की जाती है।.
एवा धनस्य मे स्फातिमा दधातु सरस्वती।
(अथर्व. १९ । ३१ । ९)
एवा सरस्वती में धनस्य स्फातिम् आ-दधातु।
एवा = एषा= यह ।मे =मुझे ।स्फातिम् = स्फाय भ्वा. आ. स्फायते + क्तिन्, यलोपः = वृद्धि, आधिक्य। आ + धा + लोट् प्र. पु. एक व= आ दधातु= देवे, पैदा करे, अर्पित करे।
अर्थ- यह सरस्वती मेरे लिये धनाधिक्य करे- प्रचुर धन दे।
आ मे धनं सरस्वती पयस्फाति च धान्यम् ।
सिनीवाल्युपा वहादयं चौदुम्बरो मणिः।।”
(अथर्व. १९ । ३१ । १०)
आ (म्) सरस्वती मे धनम्, धान्यम्, पयः स्फातिम्, अयम् च, औदुम्बरः मणिः सिनीवाली च उप आ वहात्।
आ = आम्, स्वीकृति सूचक निश्चयकारक अव्यय । धनम् = धन ।धान्यम् = अन्न। पयः स्फातिम्=दूधाधिक्यता=गोवर्धन।
अयम् = अय् गतौ आ अयते + अच्= उदय, उन्नति, समृद्धि ।
औदुम्बर = उत् + अम्ब् अम्बति गतौ अम्बते शब्दे + घञ् + रा अदा. पर राति दाने + क, अञ् जो गति के लिये स्थान दे जिस में शब्द वसे उसे अम्बर = आकाश कहते हैं। उत् = अम्बर + अञ्= औदुम्बर = विस्तारप्रद। विस्तार कीर्ति से प्राप्त होता है। क्यों कि देह धारी ससीम है। अतः औदुम्बर का अर्थ हुआ-सुयश ।
मणिः = मणु प्रसन्नतायाम् मणति +इन्। प्रसन्नता, हर्ष, आनन्द ।
सिनीवाली= देवपली( निरुक्त ११ । ३ । ३१ । ) सिनम्= अन्नम्( निघण्टु ७/ ७ )सिनम् सिनोति बघ्नाति आत्मानमिति । सिञ् बन्धने + नक् । शरीरम् ।सिनी= शुक्ल गुण विशिष्टा श्वेता सिता सिनी श्येनी इति व्याडिः। वल संवरणे वयलति दुर्गादासः । वल् गतौ वलते। वल् + घञ् + ङीष्= वाली-वरणकर्त्री। वर वरणे+ घञ् + ङीष्= वारी = वाली रलयोरभेदः । सा दृष्टेन्दुः सिनीवाली (अमरकोष । ) अमावस्था में चन्द्रकला दृष्टिगोचर हो तो उसे सिनीवाली कहते हैं।
सिनी श्वेतां चन्द्रकलां वलति धारयति सिनीवल् + अण् + ङीष् । श्वेतकला वाले चन्द्रमा के समान स्त्री प्रसन्नमना गृहपत्नी, हँसमुख एवं सुन्दरी भार्या, गौर वर्ण एवं पाककला में निष्णात जाया।
उप + आ + वह् प्रापणे पर. आशीर्लिङ् प्र. पु. एक व.= उपावहात्= कृपया प्राप्त करार, अनुग्रहपूर्वक प्रदान करे।
मन्त्रार्थ- हाँ, सरस्वती देवी मुझे कृपा कर के सम्पत्ति दे, अन्न दे, प्रचुर गोधन/दुग्धवती गौवें दे। वह मेरी उन्नति करे। वह मुझे सुयश दे, आनन्द दे तथा सुन्दरी दक्ष पत्नी दे।
गृहस्थ जीवन में सम्पूर्ण सुख पत्नी सन्नद्ध होते हैं। पत्नी सिनीवाली हो तो कहना क्या है?
साध्वी शीलवती दयावसुमती दाक्षिण्य लज्जावती.
तन्वी पापपराङ्मुखी स्मितवती मुग्धा प्रिया भासति।
देवब्राह्मणबन्धुसज्जनरता यस्यास्तिभार्या गृहे
तस्यार्थागम काममोक्षफलदा कुर्वति पुण्यप्रियाः।।
गृहिणी कैसी हो ?
१. साध्वी = सीधी सादी, सरल स्वभाव वाली।
२. दयामती = दयालु ।
३. वसुमती=पृथ्वी के समान क्षमाशील।
४. दाक्षिण्यवती नम्र, शिष्ट ।
५. लज्जावती संकोचशील, लजाने वाली ।
६. दन्त्री = हल्की देह वाली ।
७. पापपराङ्मुखी = पाप न करने वाली, धर्मी ।
८. स्मितवती= हँसमुख ।
९. मुग्धा = भोली भाली आकर्षक तरुणी ।
१०. प्रिया =पति को प्रिय ।
११. देव-ब्राह्मण-बन्धु-सज्जन-रता= देवता, ब्राह्मण बन्धु एवं सद् पुरुषों के प्रति आदर भाव रखने वाली।
१२. पुण्यप्रियाः= पुण्यशीला ।ऐसी भार्या जिस के घर में होती है, वहाँ धन अपने आप आता है, इच्छा-फलीभूत होती है तथा आनन्द छाया रहता है।
अनुकूलां विमलाङ्गी कुलजां कुशलां सुशीलसम्पन्नाम्।
पञ्च लकारां भार्यां पुरुषः पुण्योदयाल्लभते॥
१. पत्नी मनोनुकूल हो।
२. वह सुन्दर अवयवों वाली हो।
३. अच्छे कुल में उत्पन्न हुई हो।
४. गृहकार्य में दक्ष हो।
५. सुन्दर स्वभाव एवं आचरण से युक्त हो। जब पूर्व जन्मों के पुण्य का उदय होता है तो पुरुष को ऐसी पञ्चलक्षणा भार्या मिलती है।
पत्नी अनुकूल नहीं हुई तो वह घर मल्लशाला बन जाता है। वहीं रात दिन दंगल लगता है। पति-पत्नी दो मल्ल बन कर अपनी समस्त कलाओं का प्रदर्शन करते हैं। लोग दर्शक बनते हैं। हा हा, छिः छिः का उच्चार होता है। ऐसी अद्भुत लीला सरस्वस्त्यै नमः।
शक्ति से धन माँगा जाता है। धन कितना आवश्यक है, यह कहने की आवश्यकता नहीं। स पत्नी की आवश्यकता केवल गृहस्थ को है, परन्तु धन तो सब को चाहिये ब्रह्मचारी, वानप्रस्थी, संन्यासी, सज्जन-दुर्जन, बाल-वृद्ध, दानी भिक्षु धन से हीन व्यक्ति दरिद्र कहलाता है। जीवित रहते हुए पांच लोग मृत सम वा मृणि है। इन पाँचों में दरिद्र का स्थान प्रथम है।
जीवन्तोऽपि मृताः पञ्च व्यासेन परिकीर्तिताः।
दरिद्रो व्याधितो मूर्खः प्रवासी नित्यसेवक॥
१. दरिद्र ।
२. व्याधिमस्त (रोगी)।
३. मूख (ज्ञानहीन)।
४. प्रवासी (रिवार जनों से दूर रहने वाला)।
५. नित्यसेवक (प्रतिदिन दूसरे की सेवा कर जीविका चलाने वाला)। ये पाँच साँस लेते हुए भी मृतक हैं।
“वरं वनं व्याघ्रगजेन्द्रसेवितं द्रुमालयः पत्रफलाम्बु भोजनम्।
तृणानि शय्या वसनं च वल्कल न बन्धुमध्ये धनहीनजीवनम्॥
व्याघ्र एवं मनोन्मत्त हाथी से भरे जंगल में रहना पड़े, वृक्ष के पत्ते एवं फल खा कर रहना पड़े, घास पर सोना पड़े, वृक्ष की छाल पहनना पड़े वस्त्र के स्थान पर, यह सब मान्य है। बन्धुजनों के बीच में धन के बिना जीना पड़े, यह मान्य नहीं है।
जीवन में धन होना ही चाहिये। किन्तु भीख लेकर, चन्दा माँग कर चोरी से, ठगी से इकट्ठा किया हुआ धन सम्मानप्रद नहीं होता। ऐसे धन से तो निर्धन रहना अच्छा है। धन के लिये स्वाभिमान गँवाना अनुचित एवं श्रेष्ठ व्यक्ति के लिये अपमानजनक है। आदरपूर्ण दान लेना ब्राह्मण के लिये उचित है।
जो धनी हैं, धनवृद्ध हैं, उन के द्वार पर पण्डित विद्वान यती मुनी संन्यासी साधू महात्मा पीठेश्वर मण्डलेश्वर महामण्डलेश्वर योगवेत्ता आचार्यदि सभी धन के लिये खड़े होते हैं, जाते हैं।
ते सर्वे धनवृद्धानां द्वारि तिष्ठन्ति किंकराः।
ये लोग धन के दास हैं। जो धन के दास हैं वे ठाट बाट का जीवन जीते हुए गेरुवा वस्त्र धारी कलियुगी संन्यासी महात्मा महन्थ कैसे आदरणीय हो सकते हैं ? जो राम के दास हैं, मैं उन्हें प्रणाम करता हूँ।
धन सब के लिये आश्रय है। इसलिये धन का महत्व है और आवश्यक है। धन नहीं है तो पण्डित (कर्मकाण्डी) नहीं आयेगा, स्त्री नहीं टिगेगी, विवाह होना कठिन है।
विनाश्रयाः न शोभन्ते, पण्डिताः वनिता लताः।
पण्डितों स्त्रियों एवं लताओं को आश्रय चाहिये। यह लोक सत्य है।
पण्डित (विद्वान राज्याश्रयड़ता है बनिता (सुन्दरी नायिका) धनी उद्योगपति पुरुष को पाने के लिये लालायित रहती है। लता (कोमल दुर्बल वनस्पति) वृक्ष के सहारे बढ़ती है। इस के लिये ये सब आश्रयदाता के दास हो जाते हैं, उन की मिथ्या प्रशंसा करते हैं।
धन के लिये असत्य आचरण ठीक नहीं है। जिस से ये सब धनी बने हैं, हम उस शक्तिको स्तुति करें, उसका आश्रय लें, उस की शरण में जायें, उस के दास बनें। इस के लिये देवी सूक्त पढ़ने की आवश्यकता नहीं, मात्र ज्योति जलाना है क्योंकि वह शक्ति ज्योतिर्मयी है तथा दुग्धयुक्तकँटीले वृद्ध वनस्पति लगाना और उस के नीचे रहना है।
अश्वत्थवटनिम्बाम्रकपित्थवदरीगते। पनसार्ककरीरादिक्षीरवृक्षस्वरूपिणी॥ दुग्धवल्लीनिवासार्ह दयनीये दयाधिके । दाक्षिण्यकरुणारूपे जय सर्वज्ञवल्लभे।।
(श्रीमद्देवीभागवत : ८ । २४ । ५४,५५॥)
पीपल, बरगद, नीम, आम, कैथ, बेर, कटहल, मदार, करीर, महुवा के वृक्ष देवी स्वरूप हैं। दुग्धवल्ली दूधवाली वनस्पति देवी का निवासस्थान है। त्रिधारा, मन्दार, वट, अश्वत्थ पनस के पेड़ धनदायक हैं तथा देवी के विग्रह हैं। श्री महारज जी के पार्श्व में त्रिधारा (दुग्धयुक्त कंटीली वनस्पति) है तथा ऊपर से वट वृक्ष की सघन छाया है, सामने ज्योति जल रही है शक्ति से घिरे हुए, शक्ति से ओतप्रोत शक्ति देनेवाले श्री महाराज जी धन्य हैं।.
जिसे यह सब उपलब्ध नहीं है, उस के लिये रामध्वनि ही धन है। राम नाम शक्ति है। इस शक्ति को सन्तों ने जाना, भक्तों ने अपनाया, व्यास बाल्मीकि ने गाया नाम शक्ति अद्भुत एवं अनिर्वचनीय है।
मैं इस शक्ति की शरण में हूँ. ज्योतिष संबंधी वैदिक- वैज्ञानिक यानी यथार्थसम्मत जानकारी औऱ प्रयोगात्मक परिणाम के लिए व्हाट्सप्प/कॉल 63918 87311पर संपर्क किया जा सकता है. (चेतना विकास मिशन).

