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वैदिक दर्शन : पोथी-पुराण, मंदिर-मस्जिद की दीवार के पार का सच 

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     डॉ. विकास मानव 

सनातन शब्द तो तुम प्रयोग करते हो लेकिन तुम्हारी परिभाषा सनातन से नहीं जन्मती है। तुम्हारी सनातन की परिभाषा भी वर्तमान से जन्मी है। पहले पूरे होश में तो आ जाओ तब किसी योगतंत्र के संन्यासी से बात करना। अन्यथा सारे टांके खुल जाएंगे। सारा पाखंड नंगा हो जाएगा।

      हम नास्तिक नहीं हैं, वास्तविक हैं।सनातन से वर्तमान जन्मता है। तुम लगे हो वर्तमान से सनातन को पैदा करने में, ये संभव नहीं हो पाएगा। तुम्हारा सनातन अभी जन्मा है। विपश्यना करते हो और सनातन की बात करते हो। बुद्ध और महावीर की अहिंसा में आस्था है और सनातन की बात करते हो। 

     चादरें चढ़ाते हो और सनातनी होने कि बात करते हो। जो सनातनी है उसकी आस्था बँटी हुई नहीं हो सकती है। योग किसी का करते हो, ध्यान कहीं से, मंत्र, तंत्र किसी का और अहिंसा किसी की। 

     तुम्हारा सनातन पाखंड है। सनातन है शाश्वत, हमेशा विद्यमान, जिसका न कोई आदि है और न ही अंत है।  पहले खुद ही अपनी समीक्षा करके देखो तुम्हारी आस्था किस सनातन में है? कौन से वाले चौराहे में तुम्हारी आस्था है? 

      तुम्हारे तो सभी सनातन पाँच हजार साल के भीतर ही जन्में हैं।हमारा सनातन न जन्मता है और नहीं मरता है। हमारी आस्था सनातन में है तो सिर्फ सनातन में है अन्य किसी में भी मेरी कोई आस्था नहीं है। आज तक हमारे इस सनातन को कोई विचलित नहीं कर पाया है। विपरीत से विपरीत परिस्थितियों में भी हम नहीं बदले हैं.

     सीधी बात हमारी सनातन सरकार बदलने के बाद आज नहीं पैदा हुआ | हमने उन हालात में भी सनातन के बीज बोए हैं जब कोई हमारा नहीं था।

      सनातन परंपरा में किसी धर्मग्रंथ का कोई प्रावधान नहीं है। वेद उपनिषद आदि जिसे तुम धर्म ग्रन्थ कहते हो वो सब सनातन पाठशाला के पाठ्य पुस्तक हैं। 

   घर के कई पर्यायवाची शब्द भवन, प्रासाद, शाला, अलय आदि में एक पर्यायवाची मन्दिर भी है। पाठशालाओं को अक्सर विद्या मन्दिर ही कहा जाता था। 

तुलसी दास लिखते हैं :

    मन्दिर मन्दिर प्रतिकर शोद्धा, देखे जहां तहां अगणित योद्धा। —- गयउ दशानन मन्दिर माही — मन्दिर मही न दिखी वैदेही। 

बार बार मन्दिर शब्द का प्रयोग घर के लिए हुआ है।  गुरुकुल के शिष्यों को साधना विज्ञान पढ़ाने के लिए हमारे ऋषियों ने पद्मासन में बैठे बाल साधक के देह का एक प्रतिरूप मिट्टी से बना के,(एक छोटा मन्दिरनुमा घर बना के) शिक्षा देते थे।

वेद की उपयुक्त ऋचा :
बीलु चिदारुजत्नभिर्गुहा चिदिन्द्र वह्निभी:। अविंद उस्रीया अनु:।
(ऋग वेद 1/6/5)

बीलु – दसों इन्द्रियों को उत्पन्न करने वाला,
चिदारूज – चित्त को ज्योतिर्मय बनाने वाला,
तनुभिर्गुहा – देह रूपी गुहा
वह्निभी – अग्नियां ज्योतियां
चिदिन्द्र – चित्त और मन को आनंद, ज्योतिर्मय बनाने वाला,
अविंद जी जीव
उस्रीया – आत्मा रूपी सूर्य का
अनु – अनुशरण करे।
दसों इन्द्रियां, मन, चित्त सब को उत्पन्न करने वाले, शरीर को प्राणों से ज्योतिमय बनाने वाला शरीर के गुहा में स्थित उस आनन्द स्वरूप परम तेजमय सविता समान आत्मा का अनुसरण करें।
इस पाठ को समझाने के लिए हमारे आचार्य पाठशाला में मिट्टी का एक अति छोटा सा मंदिरनुमा घर बनाते थे। पाल्थी सा चबूतरा, कमर से कंधे तक मन्दिर का भवन, सिर का गुम्बद और ऊपर ब्रह्मचारी के सिर पर बालों को गांठों में बांधे रूप का प्रतीक कलश और त्रिशूल। पद्मासन में बैठे मनुष्य के शरीर को ही मन्दिर का आकार दिया था उन्होंने।
फिर उस मे कुछ मूर्ति के तरह की आकृति रख के बोला जाता था कि जैसे इस मिट्टी के घर के अंदर में यह मूर्ति रखा है वैसे ही इस शरीर के गुहा के भीतर आत्मा अवस्थित है। वही ईश्वर है। उस पर ही ध्यान केन्द्रित करना है।
यह योग शिक्षा के बहुत ही प्रारंभिक स्तर पर छात्रों को बताया जाता था..उस मन्दिर में कोई धूप दीप नहीं जलाया जाता था। कोई आरती भजन कीर्तन नृत्य आदि का प्रपंच नहीं रचा जाता था। वह शिक्षा सम्पादन का एक माध्यम और लघु उपकरण मात्र था। सनातन परंपरा में वास्तविक मन्दिर अपने ही शरीर को माना गया है और आत्मा को ही ईश्वर।
इसकी अगले ऋचा में साधना और सिद्धि का निचोड़ बताया गया है। साधना में बाह्य को अभ्यंतर से, अभ्यंतर को मन से और मन को आत्मा से अद्वैत किया जाता है।
यथांमतिमच्छाविद्वंविदसुंगिर:।
महामनुखत श्रुतम।
~(ऋगवेद 1/6/6).
देवयंतो – आत्मवत
यथा – हो गया जो
मतिमच्छा – आत्मा में व्याप्त होकर
विद्वंविदसुंगिर: – विद्वान जिसकी वाणी इंद्रिय सभी मे आत्मवत भाव समा चुका हो
महामनुखत – परमेश्वर मे लीन
श्रुतम – श्रीतियां वेद
आत्मस्थ होकर मन कर्म वचन से निर्मल होकर आत्मा मे ही रम गया जो और सब मे उसी सर्वव्याप्त आत्मा से एकाकार कर लिया उसी ने वेदों के मत में परमेश्वर को पाया।

केबल उसी ने महामनुखत:; महाकाल आत्मा (मनु=काल) के दर्शन किए। खुद को जान पाया। सचाराचार में व्याप्त उस सनातन (आत्मा) से अद्वैत होकर ब्रह्माण्ड व्यापी बन सका। मोक्ष के लिए यही श्रुति अर्थात् वेद का मार्ग है।
सनातन में पाठशाला को विद्या मन्दिर भी कहा जाता था। इसलिए पाठशाला के मुख्य साधना भवन का निमार्ण वास्तु विज्ञान से किया जाता था। प्रवेश द्वार से लेकर गर्भगृह तक भवन का निर्माण एक सीधे लेटे हुए व्यक्ति के रूप में किया जाता था जिसमे गर्भगृह सिर के स्थान पर होता था। गर्भगृह साधकों के सिद्धि का परीक्षा कक्ष होता था। वहां कोई मूर्ति नहीं होती थी।
किसी मूर्ति की कोई प्राणप्रतिष्ठा नहीं होती थी। सारे भवन में ही द्वार पूजा से लेकर गर्भ गृह तक वास्तु ऊर्जा को विविध अज्ञात विधि से जागृत किया जाता था। उसके बाद छात्र और (संन्यासी) आचार्य उस मे प्रवेश करते थे। आज वह विज्ञान विलुप्त है।
ब्रम्ह ज्ञानियों को शास्त्रार्थ करने की जरूरत नहीं पड़ती थीं। सब कुछ प्रत्यक्ष अनुभूति पर आधारित होता था।
आधुनिक काल के मठ महंत और धर्माचार्यों ने उन पाठशाला भवन सब पर कब्जा कर के उसमे मूर्ति बैठाया और साधना स्थल को दर्शन स्थल में बदल दिया। फिर चढ़ावे और दान का पाखण्ड पूर्ण धन कमाने का व्यवसाय शुरू कर दिया।
अगर मन्दिर में भगवान होते तो पुजारी को कभी कोई कष्ट चिन्ता नहीं होती और गेरुआधारी मठाधीश सब संसद, विधान सभा और विधान परिषद के तरफ नहीं भागते।
साफ है कि इनके भगवान मन्दिरों में नहीं सत्ता सुख और भोग विलास मे बसते हैं। मन्दिर, मूर्ति लोगों को मूर्ख बनाने के लिए एक माध्यम है। मठ महंतों पंडा पुजारियों का धर्म एक ढोंग है जिसमें साधना और अध्यात्म नगण्य है।

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