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मनुष्यता-मात्र का दर्शन है वैदिक वाङ्मय*

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           ~ डॉ. विकास मानव

    हिन्दू बनो, ब्राह्मण-क्षत्रिय-वैश्य-सूद्र बनो या फिर मुस्लिम-ईसाई- बौद्ध- जैन- सिख आदि बनो : वैदिक साहित्य में कहीं भी ऐसा कोई स्वर नहीं है. ऐसा कोई शब्द तक वेदों में नहीं है. वेदों का एक ही आधारभूत सूत्र है : मनुर्भव. अर्थात मनुष्य बनो. सभी के सुखी होने की मंसा व्यक्त की गई है — सर्वेंभवन्तु सुखिन: सर्वेसंतु निरामयाI

 *मानवता क्या ?*

     मानवता वह दिव्य गुण है, जो मनुष्य को मनन-चिन्तन की शक्ति देता है, उसे कर्तव्य- अकर्तव्य का बोध कराता है, उसमें नैतिक गुणों का आधान करता है तथा उसे मानवेतर जीव-जगत् से पृथक् करता है।

      ऋग्वेद में मानवता का गुण बताया गया है- मननशीलता, चिन्तन-शक्ति और विवेक । इस गुण के द्वारा ही यह जीवन में दिव्यता और देवत्व लाता है। इसका ही मंत्र में उल्लेख किया गया है। मनुष्य स्वयं मननशील हो और अन्य लोगों में भी दिव्य गुणों का प्रसार करे। 

मनुर्भव जनया दैव्यं जनम्।
(ऋ० १०.५३.६)
मानव जीवन का लक्ष्य वैशेषिक दर्शन में मानव जीवन का लक्ष्य बताया है- अभ्युदय (भौतिक उन्नति) तथा निःश्रेयस (मोक्ष प्राप्ति) । इन दोनों लक्ष्यों की प्राप्ति का साधन धर्म बताया गया है। धर्म शब्द चारित्रिक गुणों के लिए है। इसी बात को योगदर्शन में कहा गया है कि यह संसार मानव के अभ्युदय एवं उपभोग के लिए है तथा मोक्षरूपी लक्ष्य की प्राप्ति के लिए है।
यतोऽभ्युदय – निःश्रेयससिद्धिः स धर्मः।
(वैशेषिक दर्शन)
भोगापवर्गार्थं दृश्यम्।
(योगदर्शन : २.१८)

जीवन का लक्ष्य :
पुरुषार्थ-चतुष्टय अर्थात् धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष की प्राप्ति बताया गया है। धर्म का अर्थ है- सात्त्विक गुणों की प्राप्ति, अर्थ- ऐश्वर्य या अभ्युदय, काम-भौतिक विषयों का उपभोग, मोक्ष-मुक्ति की प्राप्ति।
इस विषय में महाभारत में चेतावनी दी गई है कि इन चारों को समान महत्त्व दें। जो इनमें से एक में आसक्त हो जाता है, वह लक्ष्य से च्युत हो जाता है।
धर्मार्थकामाः सममेव सेव्याः, यो हयेकसक्तः स नरो जघन्यः।

व्यक्तित्व का विकास :
व्यक्तित्व के विकास के लिए वेदों में इन गुणों की आवश्यकता बताई गई है। अथर्ववेद का कथन है कि व्यक्तित्व के विकास, समाज और राष्ट्र के विकास के लिए तप और दीक्षा ये गुण आवश्यक हैं।
तप और दीक्षा को दूसरे शब्दों में अनुशासन (Descipline) और समर्पण (Dedication) कह सकते हैं। जिस व्यक्ति, समाज या राष्ट्र में ये गुण होंगे, वह निरन्तर उन्नति करता रहेगा।
भद्रमिच्छन्त ऋषयः स्वर्विदः, तपो दीक्षाम् उपनिषेदुरग्रे।
ततो राष्ट्रं बलमोजश्च जातं, तदस्मै देवा उपसंनमन्तु।।
(अथर्ववेद : १९.४१.१)

यजुर्वेद में सत्य को उन्नति और प्रगति का आधार माना गया है। अतएव कहा है :
इदम् अहम् अनृतात् सत्यमुपैमि।
(यजु० १.५)

अथर्ववेद में संयम, अनुशासित जीवन या ब्रह्मचर्य को उन्नति या विकास का आधार बताया गया है।
ब्रह्मचर्येण तपसा राजा राष्ट्रं वि रक्षति। आचार्यो ब्रह्मचर्येण ब्रह्मचारिणमिच्छते।
(अथर्व० ११.५.१७)

मानव जीवन की सफलता :
यजुर्वेद में मानव-जीवन की सफलता के लिए व्रत या अनुशासन को आवश्यक बताते हुए कहा गया है कि व्रत से निष्ठा, निष्ठा से विशेष योग्यता, विशेष योग्यता से श्रद्धा और श्रद्धा से सत्यस्वरूप ब्रह्म की प्राप्ति होती है।
व्रतेन दीक्षामाप्नोति, दीक्षयाऽऽप्नोति दक्षिणाम्।
दक्षिणा श्रद्धामाप्नोति, श्रद्धया सत्यमाप्यते।।
(यजु० १९.३०)

मानवजीवन की सफलता के लिए सतत जागरूकता या कर्तव्यनिष्ठा अनिवार्य है। इसका ही निर्देश ऋग्वेद में किया गया है कि सतत जागरूक को ही सारे ज्ञान एवं विद्याएं प्राप्त होती हैं।
उदाहरण के रूप में अग्नि को उपस्थित किया गया है कि अग्नि सतत जागरूक रहता है, अतः उसे सारे वेद चाहते हैं तथा सोमस्वरूप परमात्मा भी उससे मित्रता करता है।
यो जागार तमृचः कामयन्ते, यो जागार तमु सामानि यन्ति।
यो जागार तमयं सोम आह, तवाहमस्मि सख्ये न्योकाः।।
अग्निर्जागार तमृचः कामयन्ते, अग्निर्जागार तमु सामानि यन्ति।
अग्निर्जागार तमयं सोम आह, तवाहमस्मि सख्ये न्योकाः।।
(ऋग्वेद : ५.४४, १४-१५)

मानवजीवन की सफलता में सत्य का भी प्रमुख स्थान है। सत्य, सत्यनिष्ठा, सच्चरित्रता, सत्यात्मकता जीवन को प्रगतिशील बनाते हैं। ऋग्वेद का कथन है कि सत्य जीवन में जागृति देता है। महाभारत शान्तिपर्व में भी कहा गया है कि सत्य ही राजाओं को भी सर्वत्र सफलता प्रदान करता है।
तेज सत्येन जागृतम्।
( ऋग्० १.२१.६)

नहि सत्याद् ऋते किंचिद् राज्ञां वै सिद्धिकारकम्।
( महाभारत : शान्तिपर्व, ५६.१७)

मानवीय सफलता हेतु दृष्टिकोण :
वेद विभिन्न मार्गों, सिद्धान्तों और वादों के प्रति समन्वयात्मक दृष्टिकोण अपनाने का निर्देश देते हैं। यथा- ज्ञानमार्ग और कर्ममार्ग, अध्यात्मवाद और भौतिकवाद, प्रवृत्तिमार्ग और निवृत्तिमार्ग आदि।.
यजुर्वेद का कथन है कि विद्या और अविद्या, संभूति और असंभूति, ज्ञानमार्ग और कर्ममार्ग, अध्यात्मवाद और भौतिकवाद, इनमें से एक मार्ग व्यावहारिक जगत् में सफलता प्रदान करता है तो दूसरा अध्यात्म मार्ग में। इसलिए दोनों का समन्वय अभीष्ट है।
अविद्यया मृत्युं तीर्त्वा, विद्ययाऽमृतश्नुते।
( यजु० ४०.१४)
विनाशेन मृत्युं तीर्त्वा, संभूत्याऽमृतमश्नुते।
(यजु० ४०. ११)

भारतीय और पाश्चात्त्य विचारधारा में यही मौलिक अन्तर है। भारतीय विचारधारा अध्यात्मप्रवण है और पाश्चात्त्य विचारधारा विशेषरूप से भौतिकवादी है।
अतएव दोनों के लक्ष्य में अन्तर हो जाता है। एक भौतिक सुखों को प्रधानता देता है, तो दूसरा मुक्ति, मोक्ष या निर्वाण को ही जीवन का सर्वस्व समझता है। वेद समन्वयवादी दृष्टिकोण अपनाने का निर्देश देता है। अतएव कणाद ऋषि ने वैशेषिक दर्शन में अभ्युदय (लौकिक उन्नति) और निःश्रेयस (मोक्ष) दोनों को लक्ष्य के रूप में उपस्थित किया है।
यतोऽभ्युदय-निःश्रेयस-सिद्धिः स धर्मः।
(वैशेषिक दर्शन)

मानवीय व्यवहार :
वेदों में मानवीय व्यवहारों के लिए भी कुछ उपयोगी निर्देश दिए गए हैं, जिससे उसका नैतिक जीवन उच्च और आदर्श हो सके। वेदों में चरित्र की उच्चता एवं पवित्रता पर बहुत बल दिया गया है।
यदि मानव की इच्छाशक्ति (Will- power) दृढ है तो वह जीवन में कठिन से कठिन कार्यों को कर सकता है। ऋग्वेद का कथन है कि इस दृढ संकल्प-शक्ति के कारण मनुष्य जीवन में सदा विजयी होता है, उसे कभी असफलता का मुँह नहीं देखना पड़ता।
इस प्रकार के दृढ संकल्प वाले व्यक्ति के सामने पर्वत जैसे बड़े विघ्न भी धराशायी हो जाते हैं।
(क) अहमिन्द्रो न परा जिग्ये।
(ऋ० १०.४८.५)
(ख) न पर्वतासो यदहं मनस्ये।
(ऋग्० १०.२७.५)

सतत क्रियाशीलता ही जीवन है। कर्तव्य की भावना से किया हुआ निष्काम कर्म मनुष्य । को बन्धन में नहीं डालता। अतः कहा गया है कि सौ वर्ष तक निष्काम भाव से निरन्तर कर्म करते रहो। ऐसा करने से मनुष्य कर्म के बन्धन में नहीं पड़ता।
इसी सिद्धान्त को अपनाकर भगवद्गीता में निष्काम कर्मयोग का विशद विवेचन किया गया है।
कुर्वन्नेवेह कर्माणि जिजीविषेत् शतं समाः।
एवं त्वयि नान्यथेतोऽस्ति न कर्म लिप्यते नरे।।
(यजु० ४०.२)
श्रीकृष्ण का कथन है :
कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।
मा कर्मफलहेतुर्भूः मा ते संगोऽस्त्वकर्मणि।।
( गीता : २.४०)

परोपकार, दान, दीन-दुःखितों की सहायता, धन के परोपकारार्थ उपयोग का वेदों के अनेक मंत्रों में उपदेश दिया गया है। ऋग्वेद का कथन है कि जो धनवान् अपना धन मित्र एवं पीड़ितों आदि को नहीं देता है, उसका धन उसके लिए मृत्यु का कारण है।
अकेला खाने वाला अकेला ही पापी होता है, दूसरी ओर दानदाता और निर्धनों को सहायता करने वाला संसार में अमर हो जाता है।
मोघमन्नं विन्दते अप्रचेताः सत्यं ब्रवीमि वध इत् स तस्य।
नार्यमणं पुष्यति नो सखायं, केवलाघो भवति केवलादी।।
(ऋग्० १०.११७.६)
न भोजा मधुन न्यर्थमीयुः।
(ऋ० १०.१०७.८)

वेद का महत्त्वपूर्ण उपदेश है कि स्वयं निर्भय रहो और दूसरों को अभय प्रदान करो। मनुष्य ही नहीं, अपितु पशु-पक्षियों तक को अभय प्रदान करो। इसके साथ ही उपदेश है कि जीवमात्र की हिंसा न करो और अहिंसा की प्रतिष्ठा करो।
अभयं पश्चाद् अभयं पुरस्ताद्।
(अथर्व० १९.१५.५)
अभयं मित्राद् अभयम् अमित्रात्,
सर्वा आशा मम मित्रं भवन्तु।
(अथर्व० १९.१५.६)
यतो यतः समीहसे ततो नो अभयं कुरु।
शं नः कुरु प्रजाभ्यो- अभयं नः पशुभ्यः।
(यजु० ३६.२२)

मानव और समाज :
वेदों में मानव और समाज के सम्बन्धों पर भी विचार हुआ है। व्यक्तियों की समष्टि ही समाज है। व्यक्ति समाज का अभिन्न अंग है।
समाज का अस्तित्व व्यक्ति के क्रियाकलाप और व्यवहार पर निर्भर है। इसके लिए वेदों में कुछ उपयोगी निर्देश दिए गए हैं।

संगठन की भावना :
वेदों में संगठन की भावना पर बहुत बल दिया गया है। संगठन समाज को सुदृढ़ करता है।
ऋग्वेद के अन्तिम सूक्त में संगठन का उपदेश देते हुए कहा गया है कि मिलकर चलो, मिलकर बोलो, तुम्हारे मन, चित्त, विचार और लक्ष्य एक हों।
संगच्छध्वं सं वदध्वम् सं वो मनांसि जानताम्।
(ऋ०१०.१९१.२)
समानो मंत्र: समितिः समानी, समानं मनः सह चित्तमेषाम्।
( ऋ० १०.१९१.३)

सह-अस्तित्व की भावना :
समाज में जब तक सह-अस्तित्व की भावना नहीं होगी, तब तक उसका विकास नहीं हो सकता है। अतएव ऋग्वेद ने सह-अस्तित्व की भावना जागृत करने का उपदेश दिया है।
हमारे विचार, हृदय और लक्ष्य एक होंगे, तभी यह सह-अस्तित्व की भावना आएगी। मंत्र में ‘सुसहासति’ सु-सह-असति के द्वारा सह- अस्तित्व का उपदेश है।
समानी व आकृतिः समाना हृदयानि वः।
समानमस्तु वो मनो यथा वः सुसहासति।।
(ऋ० १०.१९१.४)

अथर्ववेद ने इसका एक सुन्दर उदाहरण दिया है कि जिस प्रकार यह पृथिवी भाषाभेद, धर्मभेद आदि के होते हुए सभी भू-निवासियों को एक परिवार की तरह पालती है, उसी प्रकार कुटुम्ब की भावना उत्पन्न करो और उन्नति करो।
जनं विभ्रती बहुधा विवाचसं, नानाधर्माणं पृथिवी यथौकसम्।
सहस्त्र धारा द्रविणस्य मे दुहां, ध्रुवेव धेनुरनपस्फुरन्ती।।
(अथर्व० १२.१.४५)

पारस्परिक सहयोग :.
सामाजिक सामंजस्य के लिए आवश्यक है कि प्रत्येक व्यक्ति दूसरे का ध्यान रखे, उसे सहयोग दे और संकट में उसकी रक्षा के लिए तत्पर रहे।
ऋग्वेद का कथन है कि प्रत्येक मनुष्य दूसरे की रक्षा करे।
पुमान् पुमांसं परि पातु विश्वतः।
(ऋग्०६.७५.१४)

ऊँच-नीच शून्यता :
ऋग्वेद का कथन है कि ऊँच-नीच, छोटे- बड़े का भेदभाव मिटाने पर ही उन्नति और समृद्धि होती है।
अज्येष्ठासो अकनिष्ठास एते।
सं भ्रातरो वावृधुः सौभगाय।।
(ऋग्०५.६०.५)

समानता का अधिकार :
ऋग्वेद में समानता के अधिकार को प्रतिष्ठित करते हुए छोटे-बड़े, युवा वृद्ध सभी को नमस्कार प्रस्तुत किया गया है।
नमो महद्भ्यो नमो अर्धकेभ्यो
नमो युवभ्यो नम आशिनेभ्यः।
(ऋग्० १.२७.१३)
सामाजिक समरसता के लिए आवश्यक बताया गया है कि सामूहिक खान-पान की व्यवस्था की जाय सग्धि का अर्थ है एक भोजनालय और सपीति का अर्थ है- एक जलपान गृह वेदों में सामूहिक भोजन और जलपान का निर्देश है।
सग्धिक्ष में सपीतिश्च मे।
(यजु० १८.९)
समानी प्रपा स वो अन्नभागः।
(अथर्व० ३.३०.६)

अथर्ववेद में दो महत्त्वपूर्ण बातों की ओर ध्यान आकृष्ट किया गया है कि सामाजिक समरसता के लिए आवश्यक है कि समाज में कोई भूखा प्यासा न रहे और बलवान् निर्बलों को न सता सकें।
अक्षुध्या अतृष्या स्त।
(अथर्व० ७.६०.४ )
यत्र शुल्को न क्रियते अवलेनबलीयसे।
(अथर्व० ३.२९.३)

जन-कल्याण :
वेदों में जन-कल्याण और समाजसेवा को बहुत महत्त्व दिया गया है। समाजसेवक को पूज्य बताया गया है। जनसेवक को लोककृत् लोककृनु. लोकसान आदि कहा गया है।
लोकं पृण।
(यजु० १५.५९)
लोककृतः पथिकृतो यजामहे।
(अथर्व० १८.३.२५)
लोककृलुमीमहे।
(ऋ० ९.२.८)
जनकल्याण को सामाजिक और राष्ट्रीय कर्तव्य बताया गया है। राजा के लिए आदेश है कि वह जन-कल्याण के कार्य करे। कोई रोगी और कुपोषण का शिकार न हो।
जनभृत स्थ।
(यजु० १०.४)
विश्वं पुष्टं ग्रामे अस्मिन् अनातुरम्।
(यजु० १६.४८)

मानव और राष्ट्र :
मानव के राष्ट्रीय कर्तव्यों में विशेष रूप से उल्लेख है कि वह अपने देश को स्वतंत्र रखे।
राष्ट्र की रक्षा के लिए सदा जागरूक रहे। देशहित के लिए बलिदान होने को उद्यत रहे।
स्वराज स्थ राष्ट्रदा राष्ट्रममुष्मै दत्त।
(यजु० १०.४ )
वयं राष्ट्रे जागृयाम पुरोहिताः।
( यजु० ९.२३)
वयं तुभ्यं बलिहृतः स्याम।
(अथर्व० १२.१.६२)

मानव और विश्व कल्याण :
वेद मानव के लिए समाज और राष्ट्र ही नहीं, अपितु ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ की शिक्षा देता है। वेद का कथन है कि ‘विश्वभृत स्थ’ विश्व का कल्याण करो। संसार का प्रत्येक व्यक्ति नीरोग रहे और उसमें सद्भावनायें हों। सब परस्पर मित्र की दृष्टि से देखें। संसार के सभी मनुष्यों एवं पशु-पक्षियों का कल्याण हो। संसार में कोई भूखा प्यासा न रहे। सभी नीरोग एवं हृष्ट-पुष्ट हों।
विश्वभृत स्थ।
(यजु० १०.४)
यथा नः सर्वमिज्जगद् अयक्ष्मं सुमना असत्।
(यजु० १६.४)
मित्रस्याहं चक्षुषा सर्वाणि भूतानि समीक्षे।
मित्रस्य चक्षुषा समीक्षामहे।
(यजु० ३६.१८)
स्वस्ति गोभ्यो जगते पुरुषेभ्यः।
(अथर्व० १.३१.४)
एष वां द्यावापृथिवी उपस्थे, मा क्षुधत् मा तृषत्।
(अथर्व० २.२९.४)

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