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वैदिक दर्शन : आत्यंतिक नियम’*

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      पुष्पा गुप्ता

जीवन में जो भी घटना घटती है, वह एक ‘आत्यंतिक नियम’ के कारण घटती है। इस ‘आत्यन्तिक नियम का ही नाम धर्म है।’ 

      आपकी पूजा, प्रार्थना, याचना आदि के कारण आपके भीतर और बाहर कुछ भी नहीं घटता। यदि पूजा, प्रार्थना, याचना, उपासना आदि आपको आतंरिक रूप से परिवर्तित कर देती है तो आप जीवन के अनुकूल प्रवाह में प्रवाहित होने लगते हैं। उस नियम के अनुकूल प्रवाहित होने से यह घटना घटती है।

    आप जीवन में लगभग वे ही भूलें बराबर करते हैं जिन्हें आप पिछले जन्मों में कर् चुके हैं। बार-बार उन ग़लतियों को ही दोहराते रहते हैं। सबसे बड़ी भूल तो यह है कि आप अंतरस्थ भावों को भी बिना वस्तु में रूपांतरित किये स्वीकार नहीं कर पाते। भाव तो आपके भीतर है, लेकिन उसको व्यक्त करने के लिए आपको किसी बाहरी सहारे की आवश्यकता पड़ती है। 

     कोई कारण खोजते हैं आप। बिना सहारे और बिना कारण के आप अपने भाव को व्यक्त ही नहीं कर पाते। आप प्रसन्न हैं।

किसलिए प्रसन्न हैं? 

  आप कहेंगे–मित्र से भेंट हुई थी, इसलिए प्रसन्न हूँ। धन मिला, इसलिए प्रसन्न हूँ, नौकरी मिल गयी, इसलिए प्रसन्न हूँ आदि आदि। आपमें इतना साहस नहीं कि यह कह सकें कि मैं प्रसन्न हूँ क्योंकि प्रसन्न होने में ही आनन्द है।

    जो व्यक्ति कारण खोजते हैं और कारण से प्रसन्न होते हैं और कारण समाप्त होने पर उदास हो जाते हैं, ऐसे व्यक्ति को मूढ़ कहते हैं। क्योंकि प्रसन्नता के लिए कारण खोजने वाला व्यक्ति अधिक समय तक प्रसन्न नहीं रह सकता। 

   आप प्रसन्न होने के लिए कितने कारण खोजेंगे? 

    रोज़-रोज़ तो कारण मिल नहीं सकेगा और रोज-रोज प्रसन्नता भी उपलब्ध् नहीं होगी। यदि किसी सहारे से प्रसन्नता उपलब्ध् होगी तो वह स्थायी भी नहीं होगी। उसकी अवधि भी अधिक नहीं होगी और यही एकमात्र कारण है कि आपके जीवन में सुख कम है और दुःख अधिक। जब कारण से सुख प्राप्त होने वाला है तो सुख नहीं, दुःख ही दुःख है। आप दुःख को तो बिना कारण के ही स्वीकार कर लेते हैं लेकिन सुख के लिए कारण खोजते हैं।

    आपको यही तो डर है कि यदि बिना किसी कारण के आप प्रसन्न हैं तो लोग आपको पागल समझेंगे। मार्ग में कोई व्यक्ति जोर-जोर से हँसता हुआ जा रहा है, आनंद से विह्वल होकर चला जा रहा है और कोई कारण भी दिखाई नहीं दे रहा है तो राह चलते लोग उसे देखकर भौंचक्के हो जाते हैं और कहने लगते हैं-बेचारा ! पागल हो गया ! पता नहीं इसके जीवन में ऐसा क्या घटित हुआ कि जिस कारण इसकी यह दशा हो गयी। बेवजह ही हँसता जा रहा है। वजह अवश्य होना चाहिए, कारण अवश्य होना चाहिए प्रसन्न होने के लिए। 

    ध्यानयोगतंत्र साधक के जीवन का यही रहस्य है कि उन्होंने बिना कारण के ही प्रसन्न होने का मार्ग खोज लिया है। वे बिना किसी कारण के सदैव प्रसन्न रहते हैं। सदैव मुस्कराते रहते हैं। सदैव खिले हुए गुलाब के फूल की तरह प्रफुल्ल रहते हैं। सच्चे योगतंत्र के साधक को आप कभी भी उदास नहीं देखेंगे। बस, यही योगतंत्र के साधक और संसारी में भेद है।

    संसारी पहले कारण खोजता है फिर प्रसन्न होता है और उसका खोजता है प्रमाण। प्रमाण प्राप्त हो जाने पर वह प्रसन्न होता है। योगतंत्र के साधक बिना प्रमाण के प्रसन्न होता है। वास्तव में योगतंत्र के सन्यासी अंतरस्थ भाव में जीता है, बाहरी किसी वस्तु के सहारे नहीं। बाहरी वस्तु, बाहरी रूप में कोई प्रमाण नहीं चाहता प्रसन्न होने के लिए। योगतंत्र के साधक का कहना है कि प्रार्थना ही काफी है, परमात्मा का अस्तित्व हो, न हो। यदि परमात्मा है तो ठीक। यदि नही भी है तो भी ठीक। उससे साधक की प्रार्थना, पूजा, उपासना, साधना आदि में कोई अन्तर नहीं पड़ता।

     ध्यानयोगतंत्र का साधक प्रेम करता है, वह प्रेम के गहनतम स्थिति में उतरता है। प्रेमी की खोज नहीं करता। उसके प्रेम में ही इतना आनंद है कि किसी कारण के खोजने की आवश्यकता नहीं। साधना के लिए वह किसी विषय की बाहर खोज नहीं करता। विषय से मुक्ति हो, वस्तु से मुक्ति हो, पदार्थ से मुक्ति हो और अंतर्भाव में रमण हो। यदि  ऐसा होता है तो जीवन की समाधि अपने आप सध जाती है।

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