(स्वयं से मुक्ति के बाद, पांचवें शरीर से नवजीवन का आरंभ)
डॉ. विकास मानव
मैं ही ब्रह्म हूँ : मूर्खो, धूर्तों, डपोरशंखों का भी आजकल यह एक ऐसा चलता फिरता शब्द बन गया है जिसका उपयोग कहीं भी करके अपने Ego को संतुष्ट कर लिया जाता है.
वस्तुतः “हम ही ब्रह्म/सर्वेश्वर” : यह गलत नहीं है. लेकिन क्या हमें बोध हो चुका है की सचमुच हम ब्रह्म हैं? हमारा उत्तर है बिल्कुल नही।
यह जो हम कह रहे हैं यह जानते ही नही कि क्या कह रहे हैं। जैसे भीड़ जयश्रीराम, जयश्रीराम का नारा लगाते अपनी गठरी जूता चप्पल संभालते हुए चली जा रही है पर राम को नही जानती। जानती होती तो राम को शाल, कोट पहनाकर रजाई ओढ़ाकर ब्लोवर नही चलाती।
इसी प्रकार एक दृष्टान्त का अंश सुनकर अहं ब्रह्मास्मि का नारा लगाकर आप इंटरनली संतुष्ट नही हो सकते ते। इसलिए कि हम तो अभी तम से ही बाहर नही निकल पाए, सत्व -रज के गुणों मे भ्रमण हो रहा है. दैवीसम्पदा तक अभी पहुँचना नही हो पाया तो परम कहाँ से हो गये?
जब परम तुरीय अवस्था मे होंगे तब कौन बताएगा कि अहंब्रह्मास्मि और कौन सुनेगा? निश्चय ही हम अज्ञानेनाSवृतं ज्ञानं तेन मुह्यत जन्तवः की स्थिति मे हैं।
अभी तो ज्ञानविज्ञान ही नही समझे तो कूटस्थो विजितेन्द्रियः कैसे हो जाएंगे? वह निहाई कहाँ है जिसमे कूटकर इन्द्रियों पर विजय पा लेंगे और प्रशांतमनस हो जाएंगे? तो यह तो हमारा मिथ्या प्रलाप और स्वयं को धोखा देना कहलाया।
आप इस मंत्र के आइने मे तुलनात्मक अध्ययन करके तो देखें तो समझ आएगा कि हम कहाँ हैं :
ऋग्वेदं भगवोSध्येमि यजुर्वेदँसामवेदमाथर्वणं चतुर्थमितिहासपुराणं पञ्चमं वेदानां वेद पित्र्यँराशिं दैवं निधिं वाकोवाक्यमेकायनं देवविद्यां ब्रह्मविद्यां भूतविद्यां,क्षत्रविद्यां,नक्षत्रविद्याँसर्पदेवजनविद्यामेतद्भगवोsध्येमि।।
यह छान्दोग्य उपनिषद के पहले अध्याय का का दूसरा मंत्र है। इसमे नारद सनत्कुमार से कहते हैं :
भगवन्! मै चारो वेद, इतिहास, पुराण,व्याकरण, श्राद्धकल्प, गणित, उत्पातज्ञान, निधिशास्त्र, तर्कशास्त्र, नीति, देवविद्या, ब्रह्मविद्या, भूतविद्या, क्षत्रविद्या, नक्षत्रविद्या, सर्पविद्या, देवजनविद्या, नृत्य संगीत सब जानता हूँ।
आगे वे कहते हैं :
हे भगवन्! मञ्त्रविदेवास्मि नात्मविच्छुतँह्येव मे। मै मञ्त्रवेत्ता हूँ आत्मवेत्ता नही।
क्या आप नारद जी से अधिक जान लिए? ऐसी कसौटीपूर्ण दर्पण में जब हम अपने को देखते हैं तो पाते हैं कि अभी तो हम पृथ्वी को ही तत्वत: नही जानते. ऐसे में आत्मतत्व तो ऐसे ही है जैसे :
बहुनामजन्मनान्ते ज्ञानवान्मां प्रपद्यते।
वासुदेवः सर्वमिति स महात्मा सुदुर्लभः।।
तो भैया बाबा लोगों, महाराजों, धर्म और ईश्वर के दलालों! तुम तो अहंब्रह्मास्मि हो नही. बस सड़कछाप आदमी हो.
उस साधु को ब्रह्मप्राप्ति हो गई है : कानोकान फैली इस बात का शोर सुनकर राजा ने उसे आमंत्रित किया। राजा ने पूछा : धर्मशास्त्र क्या है?
साधु ने कहा : तुम्हारे और मेरे सारे आचरण में ब्रह्म परिपूर्ण है. यही परम सत्य है।
राजा ने सिपाहियों से कहा : इसे पकड़कर महल के मुख्य चौराहे पर ले जाओ और इसके शरीर पर मतवाले हाथी को छोड़ दो।
सैनिकों ने तुरंत राजा के आदेश का पालन किया.
साधु चौराहे पर खड़ा था. राजा बगल से देख रहा था. मतवाला हाथी महावत की लगाम की कद्र न करते हुए उसकी की ओर बढ़ रहा था. साधु वी डर के मारे पीछे हटने लगा.
राजा ने अपने स्थान से चिल्लाकर कहा : अरे, मवेशियों में भी तो ब्रह्म है ही. उस हाथी में भी तो ब्रह्म है. तुम पीछे क्यों हट रहे हो.
आख़िरकार हाथी ने साधु को सूंड से उठाया और दूर घास में फेक दिया. हाथी को काबू में कर लिया गया और दूर भेज दिया गया. राजा और महावत साधु की खबर लेने गए.
दर्द से कराह रहे साधु से राजा ने कहा, क्या तुमने हाथी में ब्रह्मा को देखा?
उसने ने सिर हिलाया : नहीं.
तभी महावत ने कहा :
भूल हो रही है। हाथी में भी ब्रह्म था, लेकिन वह शराब पीकर मतवाला ब्रह्म था. राजा के पास भी ब्रह्म था. उन्होंने आपको चेतावनी दी. आप भूल गए कि मुझमें भी ब्रह्म था जो मैंने तुम्हें सावधान किया. बाकी सबको छोड़ दो, क्या तुम्हारे अंदर ब्रह्म नहीं था? क्या वह तुम्हें अपना जीवन बचाने के लिए नहीं प्रवर्त कर रहा था?
साधु ने महावत के पैर पकड़ लिए और कहा, अब आप ही मेरे गुरु हुए।
*शाश्वत जीवन के लिए ब्रह्म या मोक्ष क्या, स्वयं से भी मुक्ति जरूरी :*
आमतौर से साधक जब शाश्वत सत्य खोज पर निकलता है तो उसकी खोज सत्य की नहीं, आनंद की होती है। वह कहता है सत्य की खोज पर निकला हूं लेकिन खोज उसकी आनंद की होती है।
दुख से परेशान है, अशांति से परेशान है, वह आनंद खोज रहा है। इसलिए जो आनंद खोजने निकला है, वह तो निश्चित ही इस पांचवें शरीर पर रुक जाएगा। इसलिए खोज आनंद की नहीं, सत्य की करना। तब फिर रुकना नहीं होगा।
तब नया सवाल उठेगा : आनंद है, यह ठीक, मैं अपने को जान रहा हूं यह भी ठीक; लेकिन ये वृक्ष के फूल हैं, वृक्ष के पत्ते हैं, जड़ें कहां हैं? मैं अपने को जान रहा हूं यह भी ठीक; मैं आनंदित हूं यह भी ठीक, लेकिन मैं कहां से हूं? फ्रॉम व्हेयर? मेरी जड़ें कहां हैं? मैं आया कहां से? मेरे अस्तित्व की गहराई कहां है? कहां से मैं आ रहा हूं। यह जो मेरी लहर है, यह किस सागर से उठी है?
सत्य की अगर जिज्ञासा है, तो पांचवें शरीर से आगे जा सकोगे। इसलिए बहुत प्राथमिक रूप से ही, प्रारंभ से ही जिज्ञासा सत्य की चाहिए, आनंद की नहीं। नहीं तो पांचवें तक तो बड़ी अच्छी यात्रा होगी, पांचवें पर एकदम रुक जाएगी बात। सत्य की अगर खोज है तो यहां रुकने का सवाल नहीं है।
पांचवें शरीर में जो सबसे बड़ी बाधा है, वह उसका अपूर्व आनंद है। हम एक ऐसी दुनिया से आते हैं, जहां दुख और पीड़ा और चिंता और तनाव के सिवाय कुछ भी नहीं जाना। जब इस आनंद के मंदिर में प्रविष्ट होते हैं तो मन होता है कि अब बिलकुल डूब जाओ, अब खो ही जाओ, इस आनंद में नाचो और खो जाओ।
खो जाने की यह जगह नहीं है। खो जाने की जगह भी आएगी, लेकिन तब खोना न पड़ेगा, खो ही जाओगे। वह बहुत और है—खोना और खो ही जाना। यानी वह जगह आएगी जहां बचाना भी चाहोगे तो नहीं बच सकोगे। देखोगे खोते हुए अपने को, कोई उपाय न रह जाएगा।
लेकिन यहां खोना हो सकता है, यहां भी खो सकते हैं हम। लेकिन वह उसमें भी हमारा प्रयास, हमारी चेष्टा… और बहुत गहरे में— अहंकार तो मिट जाएगा पांचवें शरीर में— अस्मिता नहीं मिटेगी। इसलिए अहंकार और अस्मिता का थोड़ा सा फर्क समझ लेना जरूरी है।
_आत्मशरीर में अहंकार नहीं, अस्मिता रह जाएगी :_
अहंकार तो मिट जाएगा, ‘ मैं ‘ का भाव तो मिट जाएगा। लेकिन ‘ हूं? का भाव नहीं मिटेगा। मैं हूं इसमें दो चीजें हैं— ‘ मैं’ तो अहंकार है, और ‘ हूं अस्मिता है—होने का बोध। ‘ मैं’ तो मिट जाएगा पांचवें शरीर में, सिर्फ होना रह जाएगा, ‘ हूं’ रह जाएगा; अस्मिता रह जाएगी।
इसलिए इस जगह पर खड़े होकर अगर कोई दुनिया के बाबत कुछ कहेगा तो वह कहेगा, अनंत आत्माएं हैं, सबकी आत्माएं अलग हैं; आत्मा एक नहीं है, प्रत्येक की आत्मा अलग है। इस जगह से आत्मवादी अनेक आत्माओं को अनुभव करेगा; क्योंकि अपने को वह अस्मिता में देख रहा है, अभी भी अलग है।
अगर सत्य की खोज मन में हो और आनंद में डूबने की बाधा से बचा जा सके.. .बचा जा सकता है; क्योंकि जब सतत आनंद रहता है तो उबानेवाला हो जाता है। आनंद भी उबानेवाला हो जाता है; एक ही स्वर बजता रहे आनंद का तो वह भी उबानेवाला हो जाता है।
बर्ट्रेड रसेल ने कहा कि मैं मोक्ष जाना पसंद नहीं करूंगा, क्योंकि मैं सुनता हूं कि वहां सिर्फ आनंद है, और कुछ भी नहीं। तो वह तो बहुत मोनोटोनस होगा, कि आनंद ही आनंद है, उसमें एक दुख की रेखा भी बीच में न होगी, उसमें कोई चिंता और तनाव न होगा। तो कितनी देर तक ऐसे आनंद को झेल पाएंगे?
आनंद की लीनता बाधा है पांचवें शरीर में। फिर, अगर आनंद की लीनता से बच सकते हो— जो कि कठिन है, और कई बार जन्म—जन्म लग जाते हैं। पहली चार सीढ़ियां पार करना इतना कठिन नहीं, पांचवीं सीढ़ी पार करना बहुत कठिन हो जाता है; बहुत जन्म लग सकते हैं— आनंद से ऊबने के लिए, और स्वयं से ऊबने के लिए, आत्म से ऊबने के लिए, वह जो सेल्फ है उससे ऊबने के लिए।
तो अभी पांचवें शरीर तक जो खोज है, वह दुख से छूटने की हैं—घृणा से छूटने की, हिंसा से छूटने की, वासना से छूटने की। पांचवें के बाद जो खोज है, वह स्वयं से छूटने की है। तो दो बातें हैं। फ्रीडम फ्रॉम समथिंग—किसी चीज से मुक्ति, यह एक बात है; यह पांचवें तक पूरी होगी। फिर दूसरी बात है—किसी से मुक्ति नहीं, अपने से ही मुक्ति। इसलिए पांचवें शरीर से एक नया ही जीवन शुरू होता है।

