दिव्यांशी मिश्रा
_जैसे बछड़े को देखकर गाय के स्तन मे वात्सल्यभाव से दूध टपकने लगता है,उसी प्रकार शिष्य से मिलकर गुरू के अंतःकरण से भी ज्ञानरूपी दूध टपकने लगता है। आपको कौन सा वाला दूध चाहिए उसके अनुरूप निष्कपट,अभिमानरहित होकर गुरू के प्रति समर्पित होना है। वह कैसे प्रसन्न होगा यह भी आपके और गुरू के Interaction से ही पता चलेगा।_
तत्वज्ञान के जिज्ञासु के बारे मे वैदिक श्रुति उपदेश करती है :*तद्विज्ञानार्थं स गुरूमेवाभिगच्छेत्**समित्पाणिः श्रोत्रियं ब्रह्मनिष्ठम्।* (मुण्डकोपनिषद/१/२/१२)
तो गुरू कौन है, यह परखना होगा। एक गुरूजी कथा सुना रहे थे और पूजा कराते समय यजमान से भगवान् को स्थान कराते हुए बोल रहू थे :*गङ्गेयमुनेश्चैव गोदावरी, नर्मदे सिन्धु, कावेरी जलस्नानं समर्पणम।* _हमारा बचपना था, हमने कड़कदार आवाज मे कहा ठहरिए गुरूजी। वे पढ़ना बंद किए और पूछे क्या बात है बच्चा? तो हमने कहा कि यह कुआँ का पानी है, इसमे गङ्गाजल मिलाया है आपने, यमुना, सिन्धू,कावेरी का जल बताकर आप भगवान् से झूठ बोल रहे है। क्या आप जानते हैं कि भगवान् ने जल की रचना की और वह नीचे की ओर बहने लगा तब नदियाँ बनी, यानी नदी का भी कारण जल है?_
*तो अन्नाद्भवतिभूतानां पर्जन्याद्न्न संभवः।* हम सभी अन्न से पैदा हुए और अन्न जल से पैदा हुआ। अर्थात् जल(पर्जन्य) हमारे बाप का भी बाप है, तो हमारे बाबा को आप कैसे चढ़ा सकते है? वह तो स्वयम्भू का दिया हुआ पृथिवीवासी सभी स्थावर-जङ्गंम् के लिए अनुपम भेट है, इसे चढाने से भगवान् खुश नही होगा। _चढ़ाना है अपने काम, क्रोध, लोभ, मोह, अहंकार और विद्वेश को चढ़ाएं, भगवान् प्रसन्न हो जाएंगे। यह जल तो परमात्मा का है, अपने स्वत्व का तो है नही जो झूठा मंतर पढ़कर आप चढ़वा रहे हैं।_
समित्पाणि का अर्थ यानी हाँथ जोड़कर समर्पित होना है। तथा श्रोत्रिय ब्रह्मनिष्ठ होना ही पर्याप्त है। _अगर निष्ठा नही है तो यह तरह-तरह का प्रपञ्च वृथा है।_ (चेतना विकास मिशन)
अंधविश्वास विरोधी है वैदिक दर्शन

