डॉ. विकास मानव
समुद्रमन्थन की पौराणिक कथा का वेदों से कुछ भी सम्बन्ध नहीं है फिर भी उसके कुछ विषय वेदों से लिये गये हैं जैसे वर्ष, अयन, ऋतु, मास, पक्ष, नक्षत्र, तिथि, पुरूरवा, उर्वशी, ब्रह्मा, विष्णु, शिव, इन्द्र, अग्नि, अगस्त्य, वसिष्ठ, भरद्वाज आदि की कथाएँ पुराणों में वेदों से विपरीत दिशा में चली गयी हैं, ठीक उसी प्रकार समुद्रमन्थन भी अनेक मूल से च्युत होकर बहुत दूर जा चुका है।
वेद और पुराण, दोनों में जल के देवता वरुण हैं। वेदों में वरुण के अनेक सूक्त (अध्याय) हैं पर उनका अधिकांश वर्णन मित्रदेव के साथ है। वरुणदेव जल के स्वामी हैं, जल में रहते हैं, जल बरसाते हैं, जल उनकी माता है और कई मन्त्रों में पत्नी है। जल के समुद्र दो हैं।
एक पृथ्वी पर और दूसरा आकाश में अथर्ववेद ने इन दोनों को वरुण की कुक्षि (कोख) कहा है। मन्त्र में लिखा है कि यह भूमि राजा वरुण की है, आकाश वरुण का है और वरुण घोड़े जल में भी रहते हैं।
उतेयं भूमिर्वरुणस्य राज्ञा दूरे अन्ता।
उतो समुद्रौ वरुणस्य कुक्षी उतास्मिनल्प उदके निलीनः॥
(४ । ४ । ३)
परन्तु ऋग्वेद में मुख्य समुद्र आकाश ही है। वह घृत समुद्र है, मधु समुद्र है, और समुद्र है और अमृतादि का समुद्र है। वेद के पञ्चम मण्डल के ६२ से ७२ तक ११ सूक्त मित्रवरुण के हैं। उनमें लिखा है कि हे मित्रावरुणदेव! आप राजा है, आकाश पृथ्वी को धारण करते हैं, अपने तेज से हमें जीवन देते हैं, औषधियों का संवर्धन करते हैं, पृथ्वी के पोषक हैं अतः कृपया जलवृष्टि करें।
आपके पास घृत के समुद्र हैं, आप आकाश से मधु की वर्षा करते हैं, भुवनों के सम्राट् है अतः हम धन और वृष्टि की याचना कर रहे हैं। आप चित्र विचित्र मेघों के साथ आकाश में रहते हैं, वे मायावी असुर हैं, घोष करते है और बरसते हैं। आपकी माया आकाश में स्थित है।
ज्योतिषमान् सूर्य अपने आयुध के साथ उसमें घूम रहा है। आप उसे वृष्टि और मेघों से घेरते हैं। आकाश में मधुमान और मोहक मेघ घूम रहे हैं। वे विचित्र, जलवती और तेजस्वी सुवाणी बोलते हैं। आप कृपया वर्षा करें। आपकी गायें और समुद्र जलमय और मधुमय हैं, आप क्षत्रिय हैं, भूप हैं, गोप हैं, समुद्रस्वामी हैं, कृपया हमें मृत और मधु से नहलायें, सींचें।
अधारयतं पृथिवीमु॒त द्यां मित्रराजाना वरुणा महोभिः।
वर्धयतमोषधीः पिन्वतं गा इव वृष्टिं सृजतंII
(५। ६२ । ३)
वेदों में ऐसे अनेक मन्त्र हैं जिनसे यह सिद्ध हो जाता है कि आकाश ही मुख्य समुद्र है और जल ही मधु, मृत, दूध, अमृत मंदिरा और दधि आदि है।
ज्योतिष के पाश्चात्य विद्वान् हमारी आकाशगंगा को ‘मिल्की वे’ अर्थात् क्षौरपथ कहते हैं अत: आकाश ही क्षीरसमुद्र है। पृथ्वी पर कहीं भी दूध दही, घी आदि के सागर नहीं हैं। आकाश का वर्ण स्वभावतः श्वेत है और वह तारों तथा सूर्यादि के प्रकाश से और भी श्वेत हो जाता है अतः क्षीरसमुद्र है।
निघण्टु में जल के क्षीर, मधु, अमृत् घृत, वन, विष, क्षेम, रस, भेषज, सुख, शुभ, व्योम, अन्न, सत्य, सर्पि, पवित्र, हेम, शम्बर, शुक्र, तेज आदि सौ नाम हैं। इसलिए आकाश अनेक पदार्थों का समुद्र है और उसका ऊपर वाला नीला भाग शिव की जटा है।
आकाश एक कुंभ है और ब्रह्मा का कमण्डल है। अमरकोश में उसका नाम विष्णुपद है। इसका अर्थ विष्णु का चरण नहीं बल्कि विशाल स्थान है। आकाशगंगा यहाँ से प्रतिवर्ष निकलती है। जैसे धनवान् को धनी और बलवान् को बली कहा जाता है उसी प्रकार भगवान् भगी हैं।
वेद में सुरेश इन्द्र ही भगवान् या भगी हैं और मेघ ही उनका रथ है इसलिए मेघ भगीरथ है। इन्द्र का एक नाम मेघवाहन है। यह भगीरथ (मेघ) आकाशगंगा को लेकर चलता है और मेघनाद हो भागीरथ का शंखनाद है। समुद्र का मन्थन अमृत के लिए हुआ था और वेद में जल को अमृतोपस्तरण, अमृतापिधान: शिवतमरस, आनन्दभू, तेजोबलद, स्नेहमयी माता, ज्योति, महौषध और मधु आदि कहा है।
अमृतोपस्तरणमसि, अमृतपिधानमसि न कर्जे दधातन, महेरणाय चक्षसे, यो वः शिवतमो रसः, उशतीरिव मातरः।
~यजुर्वेद (११।५०)
आपो ज्योती रसोऽमृतम् ।”
~ऋग्वेद (१। ४। १)
अस्वन्तरमृतमप्सु भेषजम्।”
( ऋ० १।४।४)
“अपो याचामि भेषजं समुद्रो मूलं वीरुधाम्।”
( ऋ० ३।२४।६ )
ऋग्वेद का कथन है कि जल प्राण है। शतपथ ब्राह्मण में जल को अनेक बार अमृत शान्ति और अन्नप्रद आदि कहा है। यजुर्वेद १६ । ७३ आदि में जल को स्पष्ट रूप से क्षीर कहा है-अदृभ्यः क्षीरं व्यपिवत्। इदं पयोऽमृतं मधु अमरकोश ने जल को जीवन और अमृत इसलिए कहा है कि वह कभी भी मरता नहीं है, जलाने पर वाष्प में परिणत हो जाता है।
आकाश इस अमृत का और क्षीर का सागर है। वेदों में सूर्य ही विष्णु है और वह अपनी श्री और लक्ष्मी नाम्नी दो पत्नियों के साथ इसी में रहता है और अमृत को वर्षा करता है।
श्रीश्च ते लक्ष्मीश्च ते पत्न्यौ ॥ निवेशयन्नमृतम्॥
सूर्यरूपी विष्णु सूर्योदय, मध्य और सूर्यास्त रूपी तीन पर्गों में पूरे आकाश को नाप लेते हैं। उस समय अन्धकाररूपी राजा बलि पाताल लोक में चला जाता है।
वामनावतार की कथा का बीज इसी में है; ये सूर्यरूपी विष्णु प्रारम्भ (उदय काल ) में वामन रहते हैं पर मध्याह में विराट् हो जाते हैं। उनके पैर लम्बे हो जाते हैं और मस्तक ऊपर चला जाता है।
इदं विष्णुर्विचक्रमे त्रेधानिदधे पदम्।
~यजुर्वेद (५।१५ ॥)
सूर्य की सहस्रों किरणें ही शेषनाग के सहस्रों फण हैं और वे उन्हीं के शरीर पर सोते हैं। यही है विष्णु का शेषशय्या पर शयन पुराणों का कथन है कि देवों और दैत्यों ने मिलकर विष्णु की आज्ञा से समुद्र मन्थन किया। इनकी अदिति और दिति नाम की दो माताएँ हैं पर पिता एक कश्यप हैं।
इस कथा का विवरण आगे गोत्रप्रकरण में पढ़ें। अभी इतना समझ लें कि कश्यप, दिति और अदिति नर-नारी नहीं हैं। जगत् का पिता और द्रष्ट्रा (पश्यक) ही कश्यप है। वेद में लिखा है कि दक्ष से अदिति का और आदिति से दक्ष का जन्म हुआ। यह बात नर-नारी रूप में असम्भव है।
इसका भावार्थ यह है कि उषा के बाद या उषा से सूर्य का जन्म होता है तथा सायंकाल में सूर्यास्त के बाद सूर्य से उषा (सन्ध्या) पैदा होती है देव और असुर एक ही कश्यप (सूर्य) के पुत्र हैं। वेद में बारंबार सूर्य की तेजोमयी किरणों का देव या सुर तथा अति वली काले-काले मेघों के शम्बर, नमुचि और वृत्र आदि असुर कहा है।
इन दोनों के संघर्ष से आकाशरूपी क्षीर सागर का मन्थन होता है और हमें अमृतरूपी जल की प्राप्ति होती है।
“ईडेऽन्यं वो असुर ।”(७।२।३ )
“असुरो मयोभुः ।”( ४।४२।१)
” वृत्रघ्ना ।”(१।१७५। ५)
“. वृत्रघ्नी।”( ६। ६१। ७),
“न ज्यायानस्ति वृत्रहन्।”( ४ ।३०। १)
, “उत दास कौलितरं बृहतः पर्वतादधि अवाहनिन्द्र शम्बरम्।”( ४ । ३० । १४), “शम्बराणि पर्वतं ।”(२।२४।२), “यमश्विना नमुचेरासुरात्।”( १९ । २४)
, “शिरोदासस्य नमुचेर्मथायन् ।”(५। ३०|८||)
ऋग्वेद और युजवेंद के उक्त मन्त्रों में तथा अन्य अनेक मन्त्रों में मेघों को ही असुर, वृत्र, शम्बर और नमुचि कहा है। निघण्टु में मेष के असुर, शम्बर, नमुचि, वृत्र, गोत्र, अद्रि, ग्रावा, गिरि, वराह, रैवत, सर्प और व्रज आदि तोस नाम है, पुराणों में समुद्र के मन्धन द्वारा जिन १४ रत्नों की जल से उत्पत्ति का वर्णन है वह सर्वथा असम्भव है।
लक्ष्मी, चन्द्रमा, वारुणी देवी धन्वन्तरि वैद्य, रंभादि कई करोड़ अप्सरा, ऐरावत, उच्चैःश्रवा, कामधेनु, कल्पवृक्ष आदि का पानी के भीतर जीवित रहना और मन्थन के बाद उनके शरीर का क्षत-विक्षत न होना अशक्य है पर आकाश रूपी क्षीरसागर में सम्भव है।
सूर्य की किरणों की शोभा और सम्पत्ति ही लक्ष्मी और श्री हैं, वरुणदेव द्वारा बरसाया जल ही वारुणी है और आकाश के तारे ही मणियों, शंख, गन्धर्व एवं अप्सराएँ हैं। इस विषय में वेदों का कथन है कि आकाश के सूक्ष्म और स्थूल अप (जल) में जो सरकती हैं ये अप्सराएँ हैं। तारों के साथ-साथ उषा, सन्ध्या और बिजली भी अप्सराएँ हैं।
यजुर्वेदसंहिता (अध्याय १८) में कई प्रकार के गन्धवों और अप्सराओं का वर्णन है-
“ऋताषाद् ऋतधामाग्निर्गन्धर्वस्तस्याषधयोऽप्सरसः।” (३८ )
“संहितो विश्वसामासूर्यो गन्धर्वस्तस्य मरीचयोऽप्सरसः।”( ३६)
सुषुम्णः सूर्यरश्मिश्चन्द्रमा गन्धर्वस्तस्य नक्षत्राण्यप्सरसः।”( ४० )
“इषिरो विश्वव्यचा वातो गन्धर्वस्तस्यापो अप्सरसः ।”(४१)
” भुज्युः सुपर्णीों यज्ञो गन्धर्वस्तस्य दक्षिणा अप्सरसः ।”(४२ )
“प्रजापतिर्विश्वकर्मा मनो गन्धर्वस्तस्य ऋक्सामान्यप्सरसः।”( ४३)
इन मन्त्रों का भावार्थ यह है कि अग्नि गन्धवों है, औषधियाँ अप्सराएँ है। सूर्य गन्धर्व है और उनको सुन्दर किरणें अप्सराएं हैं। चन्द्रमा गन्धर्व है और तारे उसकी अप्सराएँ हैं। वायु गन्धर्व है और पानी अप्सराएँ हैं। यह गन्धर्व है और भाँति भाँति की दक्षिणाएँ उसकी अप्सराएँ हैं तथा मन एक गन्धर्व है और वेदों की ऋचाएँ (मन्त्र) उसकी अप्सराएँ हैं।
हम लोग आजकल गन्धर्वो और अप्सराओं (वादकों और वेश्याओं) को आदर की दृष्टि से नहीं देखते। अमरकोश ने भी अप्सराओं को स्वर्ग की वेश्या कहा है किन्तु वेद में परमेश्वर और महान् देव गन्धर्व हैं तथा अप्सराएँ अनवद्या (अनिन्दिता) कही गयी हैं। वैदिक ज्योतिष के अनुसार सब देव और सब ग्रह सदा सब तारों में घूमते रहते हैं अर्थात् तारकाएँ सबकी भोग्या हैं अतः यह आलंकारिक वर्णन है और ऋग्वेद (१।१६४। १६) में इसका स्पष्ट रहस्य बता दिया गया है।
सारांश यह कि न तो तारे स्त्रियाँ हैं न ग्रह पुरुष हैं। अथर्ववेद (२।२) का कथन है कि विश्वावसु विश्वनाथ है, सब भुवनों का पति है, उसका नाम मूड (सुखदाता) है और ये मनमोहिनी अप्सराएँ उसकी पत्नियाँ हैं, अनिन्दिता है और पूज्या हैं। उन्हें नमस्कार है।
“मृडाद् गन्धर्वो भुवनस्य यस्यतिरेक एवं नमस्यः सुशेवाः ॥ २ ॥”
“अनवद्या मनोमुहः। ताभ्योऽप्सराभ्योऽकरं नमः ॥ ५॥”
यह वर्णन शंकर का है। वे विश्व के वसु और मूड हैं, तारे उनकी जटा में स्थित हैं, चन्द्रमा उनका मुकुट मणि है, आकाशगंगा उनके कपर्द में है और मेषरूपी अहि उनके शरीर में लिपटे हैं। वे आकाश में स्थित अनेक विषों को पीते हैं और हमें अमृत देते हैं।
वेद कहते हैं कि सूर्य, चन्द्र, वायु, वाणी, अन्न, फल आदि में अमृत है। अमरकोश में गोदुग्ध, घृत, इक्षुरस और बिना माँगे मिले पदार्थ को अमृत तथा त्रिफल, गुरुच आदि को अमृता कहा है। वैद्यक शास्त्र में हित आहार अमृत है और गीता में यज्ञ से बचे अन्न को अमृत कहा है। अमृत को देव पीते हैं इसलिए वे अमृतांध कहे जाते हैं।
इन अमृतों की प्राप्ति का प्रयास ही समुन्द्र मन्थन है और उसे वैधराज धन्वन्तरि देते हैं। वे समुद्र से अमृत कलश लेकर आते हैं, विष्णु के अवतार हैं और साक्षात् शंकर हैं। उनके विषय में ऋग्वेद का कथन है कि हे अर्हन्। आप दया के सागर हैं, हमारे विषों को पीते हैं और वैद्यनाथ हैं।
“अर्हनिदं दयसे विश्वम् भिषक्तमं त्वां भिषजां शृणोमि।”
संस्कृत में जल का एक नाम इरा है। इस से बना मेघ ही ऐरावत हाथी है। उसकी ध्वनि ऊँची होती है। अतः वही उच्चैःश्रवा अश्व है। मेघ जलरूपी अमृत देता है अतः कल्पवृक्ष और कामधेनु है। बिजली और जलस्रोत ही वेद में उर्वशी हैं और सूर्य ही पुरूरवा है।
निघण्टु (१।१०) में मेघ सर्प हैं, सूर्य किरणें गरुड़ हैं और गरुड़ को देखकर मेघसर्प द्रवित हो जाता है, पानी बरसता है। ऋग्वेद का कथन है कि मेघ वे घोंसले है जिनमें गरुड़ पक्षी रहते हैं। वे जल (अमृत) को लेकर भागते हैं। सूर्य की किरणें ही सुनहले पंखों वाले गरुड़ हैं।
“एकः सुपर्णः समुद्रमाविवेश स इदं विश्वं भुवनं विचष्टे ॥”
(ऋग्वेद १०। ११४|४)
“सहस्त्रशृंगोवृषभो यः समुद्रादुदाचरत्॥ अथर्ववेद ॥ ४।५।६ ॥”
यहाँ आकाशरूपी सागर से पक्षी या अश्वरूपी सूर्य के निकलने का वर्णन है। सायणाचार्य ने आकाश को ही सागर कहा है। समुद्र के मन्धन में विष्णु के मोहिनी रूप का वर्णन है। वेद में बिजली ही मोहिनी है, उसे देख कर विश्वावसु मृड का अर्थात् शिव का वीर्यपात हो जाता है। वहीं वर्षा है और उसी से वृषाकपि उत्पन्न होता है।
समुद्रमन्थन की कथा में कहीं असुरों का और कहाँ गरुड़ का अमृत को लेकर भागने का वर्णन है। उसका भाव वैदिक भाषा में यह है कि काले मेघ और सूर्यकिरण जलरूपी अमृत को लेकर भागा करते हैं। समुद्र मन्चन में सर्वप्रथम विष उत्पन्न होता है। वर्षा का न होना, वर्षा के पूर्व को उष्णता और रोगोत्पत्ति हो वह विष है। इसी क्षीरसागर में अनेक उल्काएँ हैं, धूमकेतु हैं, बमों, पटाखों, वाहनों और यन्त्रालयों के धूम हैं, दूषित गैसें हैं, पापियों के मनोभाव हैं और सूर्य के वे काले धब्बे हैं जिनसे विस्फोट होते हैं। वैद्यनाथ धन्वन्तरि इन सारे विषों का रहस्य जानते हैं और उनके मस्तिष्क में अमृत का कुंभ है।
उनके अनेक नाम और अनेक रूप हैं। उन वैद्यनाथ विश्वनाथ की पत्नी का नाम आर्द्रा है। उनका हृदय स्नेह से सदा आर्द्र रहता है। उन्हें अन्नपूर्णा और लक्ष्मी भी कहते हैं। आर्द्रा में प्रथम वर्षा होने के बाद पुनर्वसु (अन्नपूर्णा और लक्ष्मी) का आगमन होता है और तब पुष्य आता है पर खेद है कि आज का ज्योतिष पुष्प विशिष्ट पौष को तथा भाद्रपदा और रेवती (धनवतो) विशिष्ट मास को खलमास कहता है।
पद्मपुराण (अध्याय १६) में लिखा है कि रुद्र ने अपने भालाग्नि को समुद्र में फेंका तो उससे जलन्धर पैदा हुआ। बाद में रुद्र ने उसे युद्ध में मार डाला। कहीं-कहीं जलन्धर को विष्णु ने मारा है.
वस्तुतः सूर्य के शरीर से उत्पन्न अग्नि (ताप) समुद्र में पहुँचता है, उससे जलन्धर (मेघ) बनता है और उसे पुनः सूर्य हो धरती पर गिराता है, मारता है जहाँ विष्णु द्वारा वृन्दा के सतीत्व भंग का वर्णन है वहाँ मेघवृन्द ही वृन्दा है और सूर्य ही विष्णु है।

