डॉ. विकास मानव
शक्ति धर्माय नमः
स्त्री हि ब्रह्मा बभूविथ।
~ऋग्वेद (८ । ३३ । १९)
बभूविथ= भू सत्तायाम् लिट् लकार मध्यम पुरुष एकवचन।=अभवः=हुई।
ब्रह्मा = बृंह् भ्वा तुदा. पर. बृंहति, चुरा. उभ. बृंहयति – ते बृह भ्वा तुदा .पर .बर्हति वृद्धौ भाषायाम् च-बढ़ना फैलना उगना शब्द करना + मनिन् + टापू = ब्रह्मा। = प्रकृति देवी, बढ़ने वाली, फैलने वाली, विस्तार को प्राप्त होने वाली, विस्तृत, व्यापक, शब्दयमान सशब्दा।
हि = निश्चयात्मक अव्यय।
स्त्री = स्त्य (स्त्यै) [ शब्द संघातयोः शब्द करना घेरना फैलना विकीर्ण होना इधर उधर फैलना एक जगह एकत्र होना भवा. उभ स्तायति ते] + ड्रप् + ङीप् ।स्त्यायेते शुक्रशोणित यस्याम् सा स्त्री जिसमें शुक्र और शोणित (रज) इकट्ठे होते हैं तथा पुनः जो फैलती (गर्भ के बढ़ने से) है, वह स्त्री है।
पुनः स्त्री = स्तै [भ्वा. पर. स्तायति आवरणे अलंकरणे च छिपाना अलंकृत करना सजाना] + ड्रप्+ ङीप् = भ्रूणको अपने भीतर छिपाने वाली तथा श्रृंगारप्रिय / अलंकरण प्रिय।
पुनरेव स्त्री =स्तृ [स्वा .उभ.स्तृणोति-स्तृपुते, क. स्वयंते प्रेस्तारयति ते, इच्छा. विस्तीर्णपति-ते क्रयादि. उभ. स्तृणाति स्तृणीते] क्विप् + ङीष्= स्त्री।
स्वा. पर में स्तृ धातु का अर्थ है प्रसन्न करना, तृप्त करना। स्वा. आत्मने तथा क्या. उभ में इसका अर्थ है-आच्छादित करना, ढकना, फैलाना, प्रसार करना, विखेरना, छितराना, तन ढकना कपड़े पहनना। जिसे देखकर पुरुष प्रसन्न हो, जो पुरुष को तृप्ति दे, वंश को विस्तार दे, अपने शरीर को ढके रहे, नंगी न रहे, गर्भ धारण के बाद जिसका पेट फैले छितराये, जो उभयकुल (पितृ एवं पति) की कीर्ति का विस्तार करे वह स्त्री है। यह व्यष्टि अर्थ है। समष्टि रूप में जिसके रहस्य को कोई समझ न पाये जो अव्यक्त हो मूल प्रकृति के रूप में तथा व्यक्त अर्थात् विस्तार को प्राप्त हो महत् तत्व, अहंकार, एकादश इन्द्रिय, पंच तन्मात्र तथा पंचभूत के रूप में। समष्टि रूप में स्त्री ब्रह्मा है। व्यष्टि रूप में स्त्री व्यक्ति मात्र है।
क्रिया का मूल रखी है। स्त्री-जनक, पालक तथा मारक (संहारक) ब्रह्म है। यह क्रियात्मक ब्रह्म है जबकि पुरुष निष्क्रिय ब्रह्म है।
प्रकृति = स्त्री ब्रह्म दृश्य है। पुरुष = चिद्ब्रह्म निष्क्रिय एवं अदृश्य है।
स्त्री ब्रह्म ही दृश्य होने से वर्णनीय है। पुरुष तत्व अनिर्वचनीय है।
स्त्री ब्रह्म = चतुरानन ब्रह्मा = चारों दिशाओं में फैली हुई प्रकृति। यह त्रिगुणात्मक है। यह नित्य स्तुत्य है। इसे सीता कहते हैं।
सीता तत्व का निर्वचन :
सूर्य की किरणों का नाम सीता है।
१. स्यै गतौ भ्वा. आ. स्यायते + क्त + टाप् सीता- गतिशीला।
२. सित् दीप्तौ भ्वा. आ. सीतते + अच् + टाप = सिता = सीता दीप्तिमयी चमकीली उज्ज्वल धवल सुन्दर मनोज्ञ रम्य रामा रमणी।
३. साध् (स्वा. पर. साध्नोति, दिवा. पर. साध्यति पूरा करना, जीतना, समाप्त करना, मारना, दमन करना, नष्ट करना, समझना, जानना, स्वस्थ करना, जाना, पाना, अलग होना, पूर्ण करना, सिद्ध करना, निष्पन्न करना) + तृच् = सीतृ> सीता, प्रथमा एक वचन । सीता= ज्योति प्रकाश आभा ज्वाला अग्नि।
सूर्य की किरणें चलती हैं, इसलिये सीता / गतिशीला है। इनमें चमक है, ये सुन्दर लगती हैं, उज्जवल हैं। इसलिये सोता है। ये आकाश को भर लेती हैं, अन्धकार को जीतती हैं। ये मारक पूरक सिद्धिदात्री हैं। इनसे देखा जाता सब कुछ जाना जाता है। ये प्रकाश/ ज्ञान हैं।
अतः सीता नाम से प्रसिद्ध हैं। सूर्य अपनी किरणों से ही जाना जाता है। किरणों के अभाव में सूर्य मृत अस्तित्वहीन है। इसलिये ये किरणें ही मुख्य हैं, पूज्य हैं। सूर्य हमसे दूर है किन्तु ये किरणें सूर्य और हमारे बीच की सेतु है- हमारे अत्यन्त निकट एवं अतिदूर भी हैं। इसलिये यह प्रकाश ब्रह्म है।
तदेजति तन्नेजति तद्दूरे तद्वन्तिके। तदन्तरस्य सर्वस्य तदु सर्वस्यास्य बाह्यतः॥
~यजुर्वेद (४०।५)
अन्वय : तद् एजति = वह (प्रकाश) चलता है (सूर्य से हम तक)।
तद् न एजति = वह (प्रकाश) नहीं चलता है (सूर्य में सतत रहता है)।
तद् दूरे (अस्ति)= यह (प्रकाश हमसे दूर है (सूर्यस्थ होने से)।
तद् उ अन्तिके (अस्ति) = वह (प्रकाश) निश्चय हो (हमारे) अत्यंत समीप है (किरण रूप में स्पर्श करने से)।
तद् अन्तः अस्य सर्वस्य (अस्ति) = वह (प्रकाश) इस सम्पूर्ण (ब्राह्माण्ड पिण्ड, शरीर) के भीतर है।
तद् उ सर्वस्य अस्य वाह्यतः (अस्ति) = वह (प्रकाश) इस सब के बाहर (परे) अर्थात् अज्ञेय है।
इस मंत्र में तद् = प्रकाश ज्ञान किरण ज्योति= सीता । प्रकाश से अन्धकार नष्ट होता है तो ज्ञान से अज्ञान का निरसन होता है। सीता से सब कुछ जाना जाता है किन्तु सीता को जानना शक्य नहीं है। जिससे सब कुछ जाना जाता है, उसको कैसे जाना जा सकता है ?
इसलिये वेद सीता ब्रह्म की स्तुति करता है :
सीते बन्दामहे त्वार्याची सुभगे भव।
यथा नः सुमना असो यथा नः सुफला भुवः॥
~अथर्ववेद (३ । १८ । ८)
अन्वय : सीते। त्वा वन्दामहे। सुभगे। अर्वाची भाव। यथा नः सुमनाः असः, यथा नः सुफलाः भुवः। सीते= सीता स्त्रीलिंग सम्बोधन एक वचन।
त्वा= युष्मद् द्वितीया विभवित एक वचन= त्वाम्।
वन्दामहे =वदि अभिवादनस्तुत्योः लट् आत्मने उपु. बहुवचन।
सुभगे= सुभगा शब्द सम्बोधन एकवचन। सु उपसर्ग + भा भाति क + गम् + ड + टाप् = सुभगा – अत्यधिक चमक/ प्रकाश एवं वेग/ गति वाली सूर्य रश्मि।
अर्वाची = ॠ अञ्च वा गतौ + क्विन + ङीप्। विशेषण इस ओर आती हुई, सम्मुख होती हुई, सामने की ओर अभिमुख।
अथवा, अर्व भ्या. पर, अर्थति की ओर जाना, वध करना, चोट मारना गतौ नाशे च + वच् अदा. पर वक्ति कथने + क्विप्= अर्वाच् ।+ ङीप् = अर्वांची। सम्मुख आती हुई तथा कथन करती (ज्ञान देती हुई।)
भव= भू सत्तायाम लोट् मध्यम पुरुष एक वचन।
न = अस्मान् अस्मभ्यम्, अस्माकम् वा अस्मद् शब्द।
द्वितीया, चतुर्थी पछी हमको हमारे लिये हमारी।
यथा = यद् + घालू तुलना द्योतक अव्यय।
सुमनाः = सु उपसर्ग + मन्यते अनेन मन् + करणे असुन् + अच् = सुमनस् – प्रत्यक्ष ज्ञान, निर्णय वा विवेचन की शक्ति।
=सुमनस् शब्द पुलिंग प्रथमा विभक्ति एकवचन> सुमनाः।
असः = एधि/ स्तात् लोट् म.पु. एक वचन, तुम होओ। अस् धातु।
भुवः = भव / भवतात् लोट् म.पु. एक वचन, तुम होओ। भू धातु।
सुफला = सु + फल (भ्वा पर. फलति फल आना, फल पैदा करना, परिणाम युक्त होना, सफल होना, पूरा होना, निष्पन्न होना, पटित करना, फल निकलना, परिणाम पैदा करना तथा बलपूर्वक तोड़ना खण्ड-खण्ड करना, फट जाना, दरार पड़ना, फाड़ना, तोड़ना एवं जाना) + असुन् + सु।सुफलस्- सुन्दर परिणाम वाला, अज्ञान/अन्धकार को खण्ड-खण्ड करने वाला, अविवेक की ग्रन्थ तोड़ने वाला, मन बुद्धि में जाने वाला समझ में आने वाला सुफलस् + सु सुफलाः पुंलिंग प्रथमा एक वचन।
सीते त्वा वन्दामहे = हे सूर्य रश्मि (हम) तुम्हारी स्तुति करते हैं।
सुभगे अर्थाची भव= हे प्रकाशित ज्योतिर्मयी गतिशीला रश्मि, तू हमारी ओर आओ।
यथा नः सुमनाः असः = भली प्रकार से हमें प्रत्यक्ष ज्ञान होवे | यहाँ यथा का अर्थ भली भाँति है क्योंकि यह अव्यय स्वतन्त्र रूप से प्रयुक्त हुआ है।
यथा नः सुफलाः भुवः = हम पूर्णतः सफल होवे, अज्ञानमन्थि टूट जावे, सब कुछ समझ में आ जाये।
घृतेन सीता मधुना समक्ता विश्वैर्देवैरनुमता मरुद्भिः।
सा नः सीते पयसाभ्याववृत्स्वोर्जस्वती घृतवत् पिन्वमाना।
~अथर्ववेद (३ । १८ । ९)
अन्वय : समक्ता मधुना घृतेन, अनुमता विश्वैर्देवैः मरुद्भिः सीता घृतवत् पिन्वमाना ऊर्जस्वती (च अस्ति। सा सीते । पयसा नः अभ्याववृत्त्व।
समवता = (i) सम् + अञ्जू व्यक्तिकर्षणकान्तिगतिषु रुधा. उभ. अनक्ति अंक्ते + क्त + टाप्।
(ii) सम् + अशुगति पूजनयोः ध्या. उभ. अशति-ते + क्त +टाप्।
(iii) सम् + अक कुटिलायागती वा पर. अकति + क्त + टापु।= सनी हुई, लिपी हुई, पुती हुई, रंगी हुई, सजी हुई, स्पष्ट, सम्मानित, पूजनीय, चमकती हुई चलता हुई, गतवती।
मधुना = मन् ज्ञाने अवबोधने भ्वा. पर मनति चुरा. आ. मानयते दिवा तना, आ. मन्यदे-मनुते + उ, नस्य धः + टा। = आनन्देन विज्ञानेन विचारेण सौन्दर्येण प्रसादेन।
घृतेन = घृण् दीप्ती बना. पर घृणोति + क्त + टा = दीप्त्या चमक से प्रकाश से ज्ञान से।
अनुमता= अनु + मन् ज्ञाने अवबोधने वा + क्त + टाप्। = अभिप्रेत अनुमोदिता स्वीकृता समानता पूजिता।
विश्वः देवः = विश्वदेव + भिस्।= सूर्य के द्वारा देव भ्वा. आ. देवते दीप्तौ क्रीडायाम् + अच्= देव 【 चमकीला एवं क्रीडाकुशल】। विश्व = व्यापक, समस्त, पूर्ण (विश् + व)। विश्व देव का अर्थ है- पूर्ण चमक से युक्त होकर आकाश में क्रोडा करता हुआ, अर्थात् सूर्य।
मरुद्भिः = म् प्राणत्यागे मरणे + उति + भिस्। प्रियते जीवः यस्याभावादिति। जिसके अभाव में जोब मर जाता है, उसे मरुतु कहते हैं। मस्तु का अर्थ है-प्राण अपान व्यान उदान समानादि वायु [इनके अभाव में जीवन सम्भव नहीं है।] के द्वारा।
घृतवत् = घृताढ्य घृतयुक्त स्निग्ध ।[वत् प्रत्यय संज्ञा शब्दों के उत्तर स्वामित्व की भावना को प्रकट करने के लिये लगाया जाता है।] घृ (भ्वा .पर भरति चुरा. उभ धारयति ते छिड़कना गीला करना तर करना) + क्त = घृत- उदक [निघण्टु १ । १२ घृतवत् का अर्थ हुआ जलापूरित, जलीय, घी की तरह सुन्दर सुगंधित चिकनी फिसलती इठलाती हुई।
पिन्यमाना= पिवि भ्वा पर. सेवने सेचने वा पौन्वति मतुप + सु + टापू जल का सेवन करने वाली, सींचने वाली, पृथ्वी के जल को पी वा सोख कर पुनः उससे (वर्षा कर) पृथ्वी को सींचने वाली। सेवापरायणा।
ऊर्जस्वती= ऊर्ज (चुरा, उभ. बल प्राणनयोः शक्तिमान होना पराक्रमी होना जीना जिलाना ऊर्जयति-वते) + असुन = ऊर्जस्। + मतुप् =ऊर्जस्वत् । + ङीप्= ऊर्जस्वती- शक्तिमती बलवती प्राणवती।
सा= तद् स्त्रीलिंग + सु= सूर्यरश्मि ज्योति आभा।
पायसा- (i) पय् गतौ भ्वा.आ. पयते + असुन + टा गति से।
(ii) पा पाने ध्वा. पर. पिबति असुन्दा पान से।
(iii) पा रक्षणे पालने अदा पर पाति असुन्+टा पालन से।
पयस् नपुंसकलिंग है। इसके तीन अर्थ हैं : पानी, दूध, वीर्य पानी से जीवन मिलता है।
दूध से आरोग्यता/स्वास्थ्य की प्राप्ति होती है। वीर्य का अर्थ है बल वा शक्ति। वीर्य से आनन्द मिलता है.
इन तीनों में गति होती है। आकाश से धरती पर गिरते समय जल में गति होती है, थन (गाय के स्तन) से दूध गारते/निकालते समय गति होती है। शिश्न से बाहर निकलते क्षरण स्खलन होते समय वीर्य में वेग होता है। वेगवान् गतिमान् होने से ये तीनों पथस् हैं। ये तीनों पानी (पानीय) हैं.
जल प्यास बुझाने के लिये पिया जाता है, दूध स्वस्थ होने के लिये पिया जाता है तथा वीर्य को स्त्री अपनी योनि द्वारा गर्भधारण / माता बनने के लिये पीती है। अतः ये तीनों पय संज्ञक है। सूर्य की किरणों में ये तीनों विद्यमान हैं। जल जीवन कारक, दूध आरोग्य कारक तथा वीर्य शक्तिकारक वा सुखकारक है। पयसा का अर्थ है- जीवनशक्ति के द्वारा।
अभ्याववृत्स्व = अभि + आ + अव + वृतु (अदा. आ. वृत्यते) + लोट् म. पु. एक वचन। चारों ओर से आओ, समीप पहुंचों, अच्छी तरह प्राप्त होओं [अभि-आ-अव वृत्स्वा ।]
नः =अस्मान् अस्मभ्यम् वा हमको हमारे लिये।
सीते= हे ज्ञान दात्री अज्ञानहर्त्री रश्मि।
अर्थात समता मथुना घृतेन= -आह्लादकारी दीप्ति से सनी हुई।
अनुमता विश्वौर्देवैः मरूदि्भः= सूर्य एवं भय से सम्मानित/युक्त।
सा सीते ! = तद् गुणाख्य सूर्य रश्मि।
पयसा नः अभ्यायवृत्स्व दीर्घायु आरोग्य एवं सुख के द्वारा हमारे शुभ की पुष्टि करो।
सूर्य की किरणों में मधु होती है। मधु= म+धु।म = मन। धू = धू =धूनोति-धूनुते (स्वादि), धुनाति-धुनीते क्रयादि), धूनयति-ते (चुरादि), ध्वति-ते (भ्वादि), ध्रुवति (तुदादि)।
जो मन की मैल को दूर करे, मन को शुद्ध करे पवित्र करे, वह मधु है। सूर्य की किरणों में घृत होता है। घृत में सुगन्ध होती है। सुगन्ध से वस्तु जानी जाती है, अर्थात् सुगन्ध कोर्ति। सूर्य रश्मियाँ विश्वदेव हैं। सम्पूर्ण आकाश में ये प्रवेश करती और चमकती हैं और अनन्त हैं।
सूर्य रश्मियाँ मरुत् हैं।
“मरीचिर्मरुतामस्मि।
~गीता 8१०।२१)
इस कृष्ण वचन से मरुतु = मरीचि (किरण) मरुद्रण किरणों का समूह विभिन्न रंगों की किरणों का समूह। प्रत्येक रंग का भिन्न-भिन्न गुण प्रभाव है। अतः मरुत् = अनन्त गुण प्रभाव वा शक्ति से युक्त।
सूर्य मरोधियों में पय होता है ये घृतवत् पिन्वमाना एवं ऊर्जस्ती है भूत में चिकनापन होता है। यह फिसलनयुक्त होता है। सूर्य किरणें भी फिसलती (परावर्तित होती हैं। चंद्र मंगल बुध गुरु शुक्र शनि एवं पृथ्वी के तल पर पड़कर परावर्तित होती हैं जिससे ये सब देखे जाते हैं। ये किरणें भूमि के जल / आर्द्रता का अवशोषण करती हैं।
तत्पश्चात् वही जल वर्षा कर भूमि का सिंचन करती हैं। इसलिये पिन्वमाना है। अपारशक्ति होने से ये ऊर्जायुक्त/ऊर्जस्ती है। आधुनिक युग में सौर ऊर्जा से क्या नहीं प्राप्त किया जा रहा है ? इन सब गुणधर्म प्रभावशक्ति से सम्पन्न होने के कारण ये रश्मियाँ सोता संज्ञक हैं। इस सीता को हम सब मा के रूप में वरण करें। वह सीता, माता स्वरूप में हमें मिले, चारों ओर से हमारे भीतर अन्तर में प्रवेश करे जिससे हम उसकी उपस्थिति से जगमगा उठे।
इस मंत्र में अभ्याववृत्स्व एक ऐसी पद क्रिया है जिसका अर्थ असीमित है। वृत् धातु आदादि गणीय आत्मनेपदी लोट् लकार मध्यम पुरुष एक वचन की यह क्रिया- वृत्स्व एक साथ तीन उपसर्गो अभि, आ एवं अय से संयुक्त है। इसलिये जिवकुम् पर्यन्त इस पद के अर्थ का विस्तार है। इसके अर्थ को सीमित शब्दों में अभिव्यक्त करना भी मेरे लिये सम्भव नहीं हो पा रहा है।
ज्ञान की देवी सीता नित्य प्रणम्य है, पूज्य है, पावनकारी है, प्रभू है, प्रमुख है। जितनी भी ज्योतियों हैं, ये सब सीता है। पूर्वान्ह की ज्योति बाला सीता है। मध्यान्द की ज्योति युवती सीता है। अपरान्ह की ज्याति वृद्धा सीता है। उपः कालीन ज्योति शैशवा सीता है। सायंकालीन ज्योति जरा सीता है। निशीथ पूर्व ज्योति सुप्त सीता है। निशीथ ज्योति तमः/कृष्ण सीता है। निशीथोत्तर ज्योति भ्रूण सीता है। आत्मज्योति अदृश्य/ अव्यक्त भी सीता है।
सारत : वैदिक दर्शन बाद के युग त्रेतायुग की कथित सीता, राजा दसरथ के पुत्र रामचंद्र की पत्नि सीता की बात नहीं करता. वैदिक दर्शन प्रथम युग सतयुग का सब्जेक्ट है.

